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संदेश

टूलकिट बन गया पॉलिटिकल टूल, AGE VS CRIME को लेकर सरकार और विपक्ष आमने-सामने

/> ग्रेटा थनबर्ग टूलकिट केस को लेकर राजनितिक तूफ़ान उठ खड़ा हुआ है. टूलकिट केस में पर्यावरण एक्टिविस्ट दिशा रवि की गिरफ़्तारी के बाद जहाँ सरकार और बीजेपी दिल्ली पुलिस की पीठ थपथपा रही है, वहीं विपक्ष इस मामलेमें अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमले का हवाला देते हुए इसे कायराना हरकत बता रहा है. कांग्रेस, सपा, राजद, एनसीपी आदि दल दिशा रवि की उम्र का हवाला देते हुए गिरफ़्तारी को गलत मान रहे हैं तो सरकार और बीजेपी कसाब और बुरहान बानी की उम्र की दुहाई देकर गिरफ़्तारी को जायज़ ठहरा रही है. विपक्ष की ओर से राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी ने सरकार पर करारा वार किया है. उधर, दिल्ली पुलिस का आरोप है कि दिशा रवि, निकिता जैकब और शांतनु ने खालिस्तानी मूवमेंट की और से की गई ज़ूम मीटिंग में हिस्सा लिया था और दिशा रवि ने टूलकट को एडिट भी किया था. शांतनु और निकिता जैकब को कोर्ट से तात्कालिक राहत मिल गई है. उधर, कानून अपना काम कर रहा है, वही सरकार और विपक्ष में तलवारें खिंच गई हैं. विपक्ष का कहना है कि दिशा रवि ने केवल टूलकिट को एडिट किया था और इस बिना पर उसे गिरफ्तार कर सरकार ने फासीवादी होने का परिचय द...

दिल्ली में हिंसा का 'सालाना जलसा'

दिल्‍ली में हिंसा अब सालाना जलसे की तरह हो गई है. पिछले साल नागरिकता कानून के नाम पर दिल्‍ली को भड़काया गया तो इस बार किसान आंदोलन के नाम पर दिल्‍ली को दहलाया गया. संभव है कि अगले साल कोई और बहाने से किसी और को आगे कर अपना उल्‍लू सीधा किया जाए. कुल मिलाकर सरकार को नवंबर के बाद सचेत हो जाना चाहिए, क्‍योंकि इसकी क्रोनोलॉजी समझना बेहद जरूरी है. वो तो खैर मनाइए कोरोना महामारी का कि दिल्‍ली का दंगा कंट्रोल हो गया, नहीं तो हम वो देखने वाले थे, जो कभी सोच भी नहीं सकते थे. ये जो तस्‍वीरें आप देख रहे हैं, वो आपको विचलित करने के लिए काफी हैं. गणतंत्र दिवस जैसे गौरवशाली दिन, जब हमें दुनिया को अपना गौरव दिखाना होता है, उस दिन को आंदोलन के नाम पर राष्‍ट्रीय शर्म बना दिया गया. एक तरफ जवान दुनिया के सामने अपना फौलादी इरादा जाहिर कर रहे थे तो दूसरी ओर, दिल्‍ली को दहलाने के लिए कुछ साजिशें कुछ कर गुजरने के लिए बेकरार हो रही थीं. तभी तो तय समय से पहले कई जगहों पर दिल्‍ली पुलिस की बैरिकेडिंग तोड़ने की खबरें आने लगीं. यह पहले से तय था कि आज का दिन भारी साबित होने वाला है, फिर भी सरकार और दिल्‍ली पुलि...

कान की आत्मकथा

मैं कान हूँ. हम दो हैं. दोनों जुड़वां भाई लेकिन हमारी किस्मत ही ऐसी है कि आज तक हमने एक दूसरे को देखा तक नहीं पता नहीं..  कौन से श्राप के कारण हमें विपरित दिशा में चिपका कर भेजा गया है . दु:ख सिर्फ इतना ही नहीं है...   हमें जिम्मेदारी सिर्फ सुनने की मिली है गालियाँ हों या तालियाँ. अच्छा हो या बुरा. सब  हम ही सुनते हैं. धीरे धीरे हमें खूंटी समझा जाने लगा. चश्मे का बोझ डाला गया, फ्रेम की डण्डी को हम पर फँसाया गया... ये दर्द सहा हमने... क्यों भाई..??? चश्मे का मामला आंखो का है तो हमें बीच में घसीटने का मतलब क्या है...??? हम बोलते नहीं  तो क्या हुआ,  सुनते तो हैं ना... हर जगह बोलने वाले ही क्यों आगे रहते है....??? बचपन में पढ़ाई में  किसी का दिमाग काम न करे तो मास्टर जी हमें ही मरोड़ते हैं. जवान हुए तो आदमी, औरतें सबने सुन्दर सुन्दर लौंग, बालियाँ, झुमके आदि बनवाकर हम पर ही लटकाये...!!  छेदन हमारा हुआ, और तारीफ चेहरे की. और तो और... श्रृंगार देखो...  आँखों के लिए काजल. मुँह के लिए क्रीमें. होठों के लिए लिपस्टिक. हमने आज तक कुछ माँगा हो तो बताओ. कभी कि...

राम मंदिर निर्माण के लिए बरस रहा पैसा

  इस समय पूरा देश राममय हो गया है. राम भक्‍ति में सराबोर देशवासियों ने मात्र 72 घंटों में 246 करोड़ रुपये दान के रूप में दिया है. छोटा हो गया बड़ा, इस दान के कार्य में अधिकांश देशवासी अपना योगदान दे रहा है. राम मंदिर के लिए हर घंटे 3.41 करोड़ रुपये जमा हो रहे हैं. अगर इसे मिनट में बांटे तो एक मिनट में 57 लाख रुपये जमा हो रहे हैं.  42 दिन तक चंदा इकट्ठा करने का काम. चलेगा और इसकी रकम एसबीआई, पीएनबी और बैंक ऑफ बड़ौदा में जमा की जा रही है. बैंकों के कुल 46000 ब्रांचों से पूरे देश को कवर किया जाएगा. 15 से 31 जनवरी तक रशीद काटकर चंदा जुटाया जाएगा. एक से 27 फरवरी तक कूपन के जरिए चंदा जुटाया जाएगा. चंदे के लिए 10, 100 और 1000 रुपये के कूपन जारी किए जाएंगे. 100 रुपये के 8 करोड़ कूपन छापे जाएंगे तो 10 रुपये के 4 करोड़ और 1000 रुपये के चंदे के लिए 12 लाख कूपन छापे जाएंगे.  विहिप और आरएसएस से जुड़े 40,00,000 कार्यकर्ताओं को दी गई है. इसके लिए 10 लाख टोली बनाई गई है, हर चार टोली पर एक कलेक्‍टर बनाया गया है, जिसकी जिम्‍मेदारी बैंक में पैसा जमा कराने की होगी. अब तक का सबसे बड़ा 11 कर...

आरोही क्रम में बढ़ती रही BJP तो अवरोही क्रम में घटती रही कांग्रेस

थोड़ा-बहुत भी गणित जानने वाले हेडिंग में दिए गए आरोही और अवरोही शब्‍दों से परिचित होंगे. आरोही क्रम यानी बढ़ते क्रम में और अवरोही यानी घटते क्रम में. 2020 में बीजेपी लगातार बढ़ती रही, वहां भी बढ़ी, जहां वह थी ही नहीं लेकिन कांग्रेस का दायरा और सिकुड़ गया. मध्‍य प्रदेश उसके हाथ से निकल गया राजस्‍थान निकलते-निकलते बचा. पीएम नरेंद्र मोदी ने कोरोना काल में 'आपदा में अवसर' का आह्वान किया था. इस आह्वान का सबसे अधिक किसी ने पालन किया तो वह बीजेपी है. बीजेपी ने पीएम नरेंद्र मोदी के इस आह्वान को सूत्र वाक्‍य बना लिया और वो कर दिखाया, जो कभी बीजेपी सोचने की भी हिम्‍मत नहीं कर पाती थी.  कोरोना महामारी के चलते जहां दुनिया के बड़े से बड़े धुरंधर राजनीतिज्ञों की साख को बड़ा धक्‍का लगा, वहीं पीएम नरेंद्र मोदी और प्रभावी होते चले गए. पीएम नरेंद्र मोदी की अपील पर देश भर के लोगों ने कोरोना के खिलाफ प्रतीकात्‍मक ऊर्जा से लैस होने के लिए थाली बजाई, दीप जलाए. कांग्रेस ने इन सब बातों का मजाक उड़ाया और खुद ही मजाक बन गई.  हालांकि बीजेपी अध्‍यक्ष जेपी नड्डा के लिए 2020 की शुरुआत अच्छी नहीं रही, क्‍य...

पीएम नरेंद्र मोदी का शत्रुहंता योग

क्‍या आपने गौर किया है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जो भी टकराया, वो चूर-चूर हो गया. सबसे पहले भाजपा नेता संजय जोशी ने गुजरात के तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी से लोहा लिया था और आज वे कहां हैं, शायद ही किसी को पता हो. बीजेपी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्‍मीदवार बनने और प्रधानमंत्री बनने के बाद भी पार्टी के कई नेताओं ने नरेंद्र मोदी से टक्‍कर ली थी, उनका भी हश्र आप देख लीजिए. ऐसे नेताओं की फेहरिस्‍त लंबी है. चाहे यशवंत सिन्‍हा हों, शत्रुघ्‍न सिन्‍हा हों, अरुण शौरी  या फिर नवजोत सिंह सिद्धू, जिसने भी नरेंद्र मोदी के वर्चस्‍व को चुनौती दी, वे आज राजनीतिक रूप से हाशिए पर हैं. ऐसा इसलिए है, क्‍योंकि पीएम नरेंद्र मोदी की कुंडली में शत्रुहंता योग बहुत प्रबल है. उनके सामने कोई विरोधी नहीं टिक सकता, भले ही वह कितना ही मजबूत क्‍यों न हो.  पिछले 6 साल में ऐसी 10 से अधिक घटनाएं हो चुकी हैं, जिसमें पीएम नरेंद्र मोदी का पुतला जलाने वाले खुद जल गए. कहने में यह भले ही अतिश्‍योक्‍ति लगेगी, लेकिन अगर ऐसी एक-दो घटनाएं होतीं तो यह सामान्‍य बात होती. कहने का मतलब यह है कि पीएम मोदी का पु...

होश उड़ाने वाला खुलासा- कश्‍मीर में एर्दोगन के 'किलिंग मशीन' से कैसे निपटेगी मोदी सरकार?

इस्‍लामिक देशों का मसीहा बनने की सनक में तुर्की का राष्‍ट्रपति रेचप तैयप एर्दोगन (Recep Tayyip Erdogan) अब भारत खासकर कश्‍मीर को तबाह करने के प्‍लान के साथ दक्षिण एशिया की शांति और सुरक्षा भंग करने पर तुला हुआ है. एर्दोगन कश्‍मीर को लेकर ऐसा प्‍लान बना रहा है, जिसे सुनकर भारतीय एजेंसियों के कान खड़े हो गए हैं. दरअसल, अजरबैजान-आर्मीनिया के बीच लड़ाई में तुर्की ने अजरबैजान का साथ दिया था और आर्मीनिया को बुरी तरह शिकस्‍त का सामना करना पड़ा. ऐसे में तुर्की के हौसले बुलंद हैं और अब एर्दोगन अपनी सनक को कश्‍मीर पर फोकस करने के मूड में है. अनुच्‍छेद 370 को हटाने के मसले पर भी तुर्की ने पाकिस्‍तान का साथ दिया था और वह आगे भी पाकिस्‍तान के लिए कश्‍मीर को तबाह करने की व्‍यूह रचना के साथ आगे बढ़ सकता है. दरअसल, ग्रीस (Greece) के जाने-माने पत्रकार एंड्रियास माउंटजौरौली ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि पाकिस्तान की सहायता के लिए एर्दोगन सीरिया के विद्रोही आतंकियों को कश्मीर में भेजने की योजना पर काम कर रहा है. तुर्की के अफसरों ने इसके लिए कई आतंकी गुटों से बात भी की है. न्यूज वेबसाइट Pentapostag...

Nagrota Encounter : चूहे की तरह बिल से निकले और कुत्‍ते की तरह मार गिराये गए आतंकी

सुरक्षाबलों ने जम्‍मू-कश्‍मीर के सांबा सेक्‍टर में टेरर टनल (सुरंग) का खुलासा किया है. माना जा रहा है कि नगरोटा में मारे गए आतंकी इसी टनल के रास्‍ते भारत में घुसे थे. ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि आतंकी घुसे तो थे चूहे के रूप में और मारे गए कुत्‍ते की तरह. यह टनल 150 मीटर लंबा बताया जा रहा है और इसका दूसरा पाकिस्‍तान में खुल रहा है. नगरोटा एनकाउंटर के 72 घंटे के अंदर ही सुरक्षाबलों ने आतंकियों की एंट्री प्‍वाइंट ढूंढ निकाली है, जिसे बड़ी कामयाबी माना जा रहा है. बताया जा रहा है कि अनुच्‍छे 370 के समाप्‍त होने के बाद पाकिस्‍तान अब आतंकियों को हथियार सप्‍लाई नहीं कर पा रहा है और सुरक्षाबलों ने पाकिस्‍तान और आतंकियों के बीच के चेन पर कड़ा प्रहार कर उसे नष्‍ट कर दिया है. कोई और रास्‍ता न देख पाकिस्‍तान ने सुरंग वाली साजिश रची है. इससे पहले भी बीएसएफ के जवानों ने कई सुरंग का पर्दाफाश किया था. नगरोटा एनकाउंटर को लेकर पीएम नरेंद्र मोदी ने हाई लेवल मीटिंग की थी, जिसमें गृह मंत्री अमित शाह, राष्‍ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल, विदेश सचिव और खुफिया एजेंसियों के शीर्ष अधिकारी शामिल हुए थे. प...

तेजस्‍वी यादव का PK कौन? जिसने उड़ा दी है नीतीश कुमार की नींद

पीएम नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) और नीतीश कुमार (Nitish Kumar) जैसे दिग्‍गज राजनेताओं से लोहा लेते हुए राजद नेता और महागठबंधन से मुख्‍यमंत्री पद के दावेदार तेजस्‍वी यादव (Tejaswi Yadav) जिस तरह सधी हुई राजनीति कर रहे हैं, उससे लग रहा है कि उन्‍हें उनका PK मिल गया है. PK यानी प्रशांत किशोर (Prashant Kishor), जो पिछले चुनाव में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) की चुनावी रणनीति बना रहे थे. इस बार बिहार चुनाव से PK नदारद हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि तेजस्‍वी यादव का PK कौन है? कौन है जो चुनावी राजनीति की बिसात पर तेजस्‍वी से सधी हुई चाल चलने को कह रहा है. कहीं यह खुद PK तो नहीं, PK नहीं तो मनोज झा (Manoj Jha) तो नहीं. मनोज झा इसलिए कि तेजस्‍वी यादव मनोज झा का बहुत सम्‍मान करते हैं और तेजस्‍वी यादव ने जब 10 लाख नौकरियां देने की बात कही थी तो मनोज झा की उसमें प्रमुख भूमिका बताई जाती है. 10 लाख नौकरियां देने के वादे के साथ ही तेजस्‍वी यादव ने रोजगार को बिहार में चुनाव का प्रमुख मुद्दा बना दिया है, जिस पर NDA के नेता बगलें झांकने को मजबूर हो रहे हैं. बिहार चुनाव में पीए...

बिहार के CM तो नीतीश कुमार ही होंगे!

1995 में जॉर्ज फर्नांडिस और नीतीश की समता पार्टी चुनाव लड़ती हैऔर लगभग पूरा सफाया हो जाता है . फिर भाजपा से गठबंधन करते हैं और सीनियर पार्टनर और मुख्यमंत्री के दावेदार बनते हैं. नीतीश की जदयू 2014 का लोकसभा चुनाव अकेले लड़ती है. पूरी तरह खारिज हो जाती है. फिर लालू से गंठबंधन करते हैं. सीनियर पार्टनर और मुख्यमंत्री पद के दावेदार बनते हैं. महागठबंधन में सरकार चलाने से उनकी छवि पर छींटें पड़ते हैं और वे इन छींटों से बचने के लिए धुर विरोधी नरेंद्र मोदी की भाजपा की गोद में जा बैठते हैं. बिहार में चुनाव की दो धुरी भाजपा और लालू ही हैं लेकिन सरदार नीतीश बनते हैं. बिना जनाधार वाला सरदार. लोग रामविलास को मौकापरस्ती से जोड़ते हैं. सफल मौकपरस्ती के लिए दो बातों का होना जरूरी है. समय देखकर आप किसी से भी जुड़ जायें और आपको हर कोई खुद से जोड़ ले. नीतीश समय-समय पर सबसे जुड़े और समय-समय पर हर कोई उन्हें खुद से जोड़ने को तैयार रहता है लेकिन उन पर मौकापरस्त का टैग नहीं लगा. इसे घाघ राजनीतिज्ञ होना कहते हैं. बिना जनाधार वाला घाघ सरदार. बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Election 2020) में बीजेपी और रा...

चिंता जताने के साथ संयुक्‍त राष्‍ट्र को चेतावनी दे रहे थे पीएम नरेंद्र मोदी

'भारत के लोग संयुक्त राष्ट्र (United Nations) के रिफॉर्म्स को लेकर लंबे समय से इंतजार कर रहे हैं. आज भारत के लोग चिंतित हैं कि क्या यह प्रोसेस लॉजिकल एंड पर पहुंच पाएगा. आखिर कब तक भारत को संयुक्त राष्ट्र के डिसिजन मेकिंग स्ट्रक्चर (Decision Making Structure) से अलग रखा जाएगा? एक ऐसा देश जो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहां विश्व की 18% से ज्यादा जनसंख्या रहती है, जहां सैकड़ों भाषाएं हैं, सैकड़ों बोलियां हैं, अनेकों पंथ हैं, अनेकों विचारधाराएं हैं. जिस देश ने सैकड़ों वर्षों तक वैश्विक अर्थव्यवस्था (Global Economy) का नेतृत्व करने और सैकड़ों वर्षों तक गुलामी दोनों को झेला है.' प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) 26 सितंबर की शाम को (भारतीय समयानुसार) जब संयुक्‍त राष्‍ट्र की जनरल एसेंबली (UNGA) को संबोधित कर रहे थे, तो उनकी मुद्रा अलग थी. वो संयुक्‍त राष्‍ट्र के रिफॉर्म्‍स (United Nation Reforms) को लेकर गुहार नहीं कर रहे थे, बल्‍कि चेतावनी दे रहे थे. वैसे इंटरनेशनल प्‍लेटफॉर्म पर पीएम नरेंद्र मोदी (PM Modi) कभी गुहार की मुद्रा में नहीं रहते. वह खुद ही कहते हैं, न ह...

महागठबंधन की बलि बेदी पर कुर्बान होगी कांग्रेस

महागठबंधन तो होगा, चाहे कुर्बानी किसी को देनी पड़े। फिलहाल कुर्बानी कांग्रेस को ही देनी होगी, क्योंकि क्षेत्रीय दल अपने हिस्से में से शायद ही कटौती करें। महागठबंधन की सबसे ज्यादा जरूरत भी कांग्रेस को ही है। उस दल का, जिसका कभी जम्मू कश्मीर से लेकर तमिलनाडु और गुजरात से लेकर मिजोरम तक एकाधिकार हुआ करता था, वह अब पंजाब और पुड्डुचेरी तक सिमट कर रह गई है। यही उसकी छटपटाहट है और यही सबसे बड़ी कमजोरी। यही कारण है कि सभी क्षेत्रीय दल उसे आंख दिखा रहे हैं। कांग्रेस किसी तरह 2019 का चुनाव जीतना चाहेगी, क्योंकि यह राहुल गांधी के लिए बतौर अध्यक्ष पहला आम चुनाव होगा और जीत ही उन्हें स्थापित करेगी। हालांकि हार से उनकी अध्यक्षी को आंच नहीं आएगी पर संभव है कि पंजाब जैसे राज्य की सत्ता भी हाथ से निकल जाए। कांग्रेस की एक छटपटाहट यह भी है कि मोदी सरकार में उसे सम्मानित विपक्ष का भी दर्जा हासिल नहीं हुआ। इसलिए कांग्रेस को महागठबंधन का जहर कबूल होगा, पर मोदी शासन का हलाहल कदापि मंजूर नहीं। कांग्रेस जानती है कि मोदी सरकार का बने रहना उसके अस्तित्व के लिए बहुत बड़ा खतरा है, इसलिए वह कोई भी जोखिम उठाने को तैय...

इलेक्शन मोड में

यूं तो अपना देश चौथे साल के बजट से ही चुनावी मोड में आ जाता है। चौथे साल में सरकारें चुनाव को ध्यान में रखकर बजट में लोकलुभावन घोषणाएं करती हैं, ताकि पिछले कुछ वर्षों की जनता की नाराजगी दूर की जा सके, लेकिन इस साल बजट में ऐसा कुछ नहीं हुआ, जिसके आधार पर यह बात कही जाए। हां, आयुष्मान भारत की घोषणा जरूर हुई पर ऐसा नहीं लगता कि यह योजना इस चुनाव में अपनी कोई खास भूमिका अदा कर पायेगी, क्योंकि लोगों तक इसका लाभ पहुंचने से पहले चुनाव का परिणाम आ चुका होगा। एमएसपी को लेकर सरकार ने कुछ कदम जरूर उठाये, लेकिन यह पहले से घोषित था। अब इसे सरकार का आत्मविश्वास माना जाए या फिर इसे ढीठ सरकार कहा जाए। बजट में इलेक्शन मोड भले न दिखा हो, पर अब देश पूरी तरह इसके लिए तैयार दिख रहा है। पार्टियों की गहमागहमी, उनकी तैयारी और बयानबाजी बता रही है कि वे चुनाव के लिए कमर कस चुके हैं। बस बिगुल फूंकने की देर है और वे एक-दूसरे पर टूट पड़ेंगे। निकल पड़ेंगे जनता को हथियाने, रिझाने और बरगलाने के लिए। विपक्षी हिसाब मांग रहे हैं तो सत्ताधारी दावे कर रहे हैं। पिछले चुनाव में जो दावे कर रहे थे, वे अब वादे कर रहे हैं औ...

चुनाव और चुनौतियां

#आमचुनाव का साल है। एक को खोने का डर है तो दूसरे के लिए पाने की चुनौती है। दोनों का अपना अपना अंतर्द्वंद्व है, जिससे जूझते हुए जितना है। चुनाव से पहले कोई यह नहीं कह सकता कि किसका पलड़ा भारी है और किसका नहीं। अभी तो इस 'महाभारत' का 'पांचजन्य' फूंका जाना भी शेष है। शब्दबाण चलेंगे, जुबानें लड़खड़ाएंगी, फिसलेंगी, सवाली-जवाबी होगी, उड़नखटोला धूल उड़ाएंगी, पार्टियां रैली-रैली खेलेंगी, जनता समझेगी-बुझेगी। फिर फैसले की घड़ी आएगी। सांस धुकुर-धुकुर चलेगी। आघात लगेगा, प्रतिघात होगा। कोई राजा होगा और कोई रंक होगा। कोई सड़क पर तो कोई संसद में होगा। कोई मजलिस में होगा तो कोई मंत्री होगा। फिर चुनाव आएंगे, चुनौतियां भी आएंगी-जाएंगी। सिर्फ चुनाव और चुनावी मुद्दे को लेकर ऐसा होता है, यह सच नहीं है। हां, राजनीति का कैनवास जरूर बडा हो गया है। तभी तो गैर राजनीतिक मुद्दा भी राजनीति का केंद्र बन जाता है। प्रश्न का औरा बढ़ गया है और उत्तर उतना ही सतही प्रतीत हो रहा है। देश में इस समय #kathua कांड, #Unnav कांड, #AMU कांड, #Collegium कांड, #Kaveriwater, पश्चिम बंगाल में #Panchayatchunav, बिहार ...

चार 'पी' से देश में आ गया है भूचाल

वैसे तो अपने देश में किसी भी बात पर भूचाल आ जाता है। हालिया घटनाक्रम को देखें तो एक पकौड़ा भी देश मे भूचाल लाने के लिए काफी है। मुद्दों की दरिद्रगी और चर्चा में बने रहने की छटपटाहट ने विपक्षियों को पकौड़े पर सियासत करने को मजबूर कर दिया है। दूसरी ओर, बजट के बाद लगातार लुढ़कते और फिर संभलते बाजार को पंजाब नेशनल बैंक घोटाले से बड़ा झटका लगा है। इन सबके बीच अब तक अनाम-गुमनाम दक्षिण भारतीय अभिनेत्री प्रिया अचानक अपनी आंखों के करामात से नई सनसनी बनकर उभरती हैं और हर भारतीयों के मोबाइल में ठौर बना लेती हैं। कुल मिलाकर चार 'पी' ने यहां तहलका मचा रखा है: पद्मावत, पकौड़ा, प्रिया और पंजाब नेशनल बैंक। सबसे पहले बात करते हैं पद्मावत की। कुछ दिनों पहले तक पद्मावत ने देश की राजनीति को हिलाकर रख दिया था। संजय लीला भंसाली की इस फिल्म (पहले पद्मावती और बाद में पद्मावत) ने उत्तर और मध्य भारत के लगभग सभी राज्यों की राजनीति को प्रभावित करके रख दिया। हिंसक आंदोलन हुए और सुप्रीम कोर्ट तक को इसमें दखल देना पड़ा था। उसके बाद भी कई राज्यों में शुरुआती दौर में फ़िल्म का प्रदर्शन नहीं हो सका। कुछ राज्य...

एक तरफ वोटों का सूखा तो दूसरी तरफ मतदान का सावन

ऐसा लग रहा था कि हम वोटों के सूखे वाले क्षेत्र से मतदान की बारिश वाले इलाके में पहुंच गए। एक तरफ बूथ वोटरों के लिए तरस रहे थे तो दसूरी तरफ बूथों पर मतदाताओं की लंबी लाइन। शहर के कुछ बूथों का दौरा करने के बाद हम मिनी बाईपास होते हुए सीबीगंज, मथुरापुर और परसाखेड़ा की तरफ बढ़ रहे थे। रास्ते का एक-एक बूथ हमें शहर और देहात का अंतर समझा रहा था। मौसम भी मेहरबान था। ऐसा लग रहा था कि गुनगुनी धूप ठंड में दुबके लोगों को बाहर निकलकर वोट डालने के लिए उत्साहित कर रही है। मिनी बाईपास से गुजरते वक्त साफ नजर आ रहा था कि खांटी शहरी लोगों की अपेक्षा देहात के लोग कितने जागरूक होते हैं। इस रोड पर जहां कई किलोमीटर तक सन्नाटा पसरा हुआ था, वहीं जीके मांटेसरी स्कूल पर बने बूथ पर लगी भीड़ का कोलाहल उस सन्नाटे को खत्म कर रहा था। प्रत्याशियों के बस्ते पर जुटी भीड़ वोटर लिस्ट में खुद को तलाश रही थी। आगे हमें आईटीआई के पास बने बूथ के आसपास भी खासी भीड़ दिखी। रास्ते में जो भी बूथ मिले, वहां मतदाताओं की संख्या शहरी मतदाताओं को आईना दिखा रही थी। सीबीगंज, मथुरापुर और परसाखेड़ा होते हुए हम केंद्रीय मंत्री संतोष ...

#gaurilankesh : मौत हो तो ऐसी

मौत हो तो ऐसी। एक मिनट पहले तक जिन्हें कर्नाटक के बाहर बहुत अधिक नहीं जाना जाता था, उन्हें मरते ही पल भर में अनंत शोहरत हासिल हो गई। जगह-जगह मातमनुमा उल्लास-उत्सव मनाया जाने लगा। पिघलती मोमबत्तियां अगाध श्रद्धांजलि का भाव पैदा करने लगीं। देश की राजधानी दिल्ली में मातमपुरसी का आयोजन कर राजनीति की रोटियां सेंकी गईं और तमाम सेलिब्रिटी ने अपने जौहर दिखाए। क्या करें भाव भले मातम का न हो, माहौल तो मातम का था न। #gaurilankesh कर्नाटक की पत्रकार की हत्या की खबरें टीवी पर कुछ यूं फ्लैश की गईं: कर्नाटक की पत्रकार #gaurilankesh की हत्या, गौरी हिन्दूवादी राजनीति की धुर विरोधी थीं और भाजपा की नीतियों का विरोध करती थीं। मेरे दस साल के कैरियर में खबर फ्लैश करने का यह नया और आधुनिक तरीका लगा। गौरी लंकेश के बारे में यही पूरी जानकारी थी और उन्हें इससे अधिक समझने का मौका न तो मानस को दिया गया और न ही पत्रकारों ने खुद इसमें अपनी दिलचस्पी दिखाई। मुझे भी उनके बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं थी। लगा कि किसी महिला की हत्या कर दी गई होगी। मुझे क्या पता था कि इसमें बहुत मसाला है और इतना मसाला है कि स...

#Nitish #Laloo से और #sharad भयभीत थे #nitish से

इधर #Nitish महागठबंधन से पीछा छुड़ाकर एनडीए में जाने का बहाना तलाश रहे थे, उधर #Sharad Yadav यादव #Nitish से भयभीत होकर अलग रास्ता अख्तियार करने में जुटे थे। दोनों की अपनी वाजिब वजहें थीं। दरअसल शरद यादव को दूसरे जॉर्ज फर्नांडीस बन जाने का भय सता रहा था। खासकर पार्टी के अध्यक्ष पद से हटाए जाने के बाद से वे खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे थे। इधर नीतीश कुमार को भी लालू के साथ काम करने में उतना मजा नहीं आ रहा था। वे खुलकर उस तरह बैटिंग नहीं कर पा रहे थे, जिस तरह एनडीए के साथ रहकर वे किया करते थे। नीतीश के साथ रहकर लालू प्रसाद यादव दिनोंदिन मजबूत होते जा रहे थे। हालांकि केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई और घेरेबंदी से उन पर शिकंजा कसता जा रहा था पर राजनीतिक रूप से इसका कोई नुकसान लालू प्रसाद को न होकर नीतीश कुमार को हो रहा था। उनका एमवाई (मुस्लिम+यादव) समीकरण फिर से मजबूत हो रहा था। मजाकिया अंदाज में लालू प्रसाद नीतीश कुमार पर तंज भी कस देते थे और उसे बाद में अपने हिसाब से संशोधित भी कर लेते थे। इससे वे अपने वोटरों को संदेश देने में कामयाब हो रहे थे और नीतीश की लगातार छीछालेदर ...

बिना जनाधार वाला घाघ सरदार

नीतीश की समता पार्टी चुनाव लड़ती है। लगभग पूरा सफाया हो जाता है। फिर भाजपा से गठबंधन करते हैं और सीनियर पार्टनर और मुख्यमंत्री के दावेदार बनते हैं। नीतीश की जदयू 2014 का लोकसभा चुनाव अकेले लड़ती है। पूरी तरह खारिज हो जाती है। फिर लालू से गंठबंधन करते हैं। सीनियर पार्टनर और मुख्यमंत्री पद के दावेदार बनते हैं। महागठबंधन में सरकार चलाने से उनकी छवि पर छींटें पड़ते हैं और वे इन छींटों से बचने के लिए धुर विरोधी नरेंद्र मोदी की भाजपा की गोद में जा बैठते हैं। बिहार में चुनाव की दो धुरी भाजपा और लालू ही हैं लेकिन सरदार नीतीश बनते हैं. बिना जनाधार वाला सरदार. लोग रामविलास को मौकापरस्ती से जोड़ते हैं। सफल मौकपरस्ती के लिए दो बातों का होना जरूरी है। समय देखकर आप किसी से भी जुड़ जायें और आपको हर कोई खुद से जोड़ ले. नीतीश समय-समय पर सबसे जुड़े और समय-समय पर हर कोई उन्हें खुद से जोड़ने को तैयार रहता है लेकिन उन पर मौकापरस्त का टैग नहीं लगा। इसे घाघ राजनीतिज्ञ होना कहते हैं। बिना जनाधार वाला घाघ सरदार। नीतीश मुसलमानों की बात करते हैं और भाजपा के लंबे समय तक साझीदार रहे। नीतीश सवर्णों की भी...

मोनिका का दर्द और मेरा पत्रकारीय संतोष

मानसून की पहली बारिश में तन-मन से तर-बतर होकर ऑफिस पहुंचा ही था। रोज की तरह कम्प्यूटर ऑन किया। ब्राउजर पर जाकर एक के बाद एक पहले मेल आईडी, व्हाट्सएप, फेसबुक आदि पर लॉगइन किया। फेसबुक ओपन करते ही सामने जो तस्वीर थी, वो अधूरी होने के बाद भी जानी-पहचानी सी लगी। पोस्ट जागरण इंस्टीट्यूट में मेरी जूनियर रही मोनिका शेखर का था। चेहरे पर नाखुन के निशान काफी कुछ बयां कर रहे थे। उस पर ट्रेन में सीट के विवाद में उस समय हमला हुआ था, जब वह सीवान से नई दिल्ली के सफर पर थी। गोरखपुर और गोंडा के बीच हुए हमले के बाद भी ट्रेन की स्क्वायड से लेकर लखनऊ, बरेली, मुरादाबाद और यहां तक कि नई दिल्ली की रेल पुलिस पंगु बनी रही और एफआईआर दर्ज करने में आनाकानी करती रही। यह हाल तब था, जब कहीं से कोई राहत न मिलने पर मोनिका ने रेल मंत्री को ट्वीट किया था। मोनिका के पोस्ट को देखने के बाद मुझे लगा कि उसके लिए कुछ करना चाहिए। तब तक मैं मुत्तमईन नहीं था कि वह ट्रेन मेरे कार्यक्षेत्र बरेली से होकर गुजरी होगी। उधेड़बुन के बीच मैं अपना काम करता रहा पर ध्यान खामख्वाह उस पोस्ट पर चला ही जा रहा था। मैं बार-बार उसे पोस्ट क...