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बिहार के CM तो नीतीश कुमार ही होंगे!



1995 में जॉर्ज फर्नांडिस और नीतीश की समता पार्टी चुनाव लड़ती हैऔर लगभग पूरा सफाया हो जाता है . फिर भाजपा से गठबंधन करते हैं और सीनियर पार्टनर और मुख्यमंत्री के दावेदार बनते हैं. नीतीश की जदयू 2014 का लोकसभा चुनाव अकेले लड़ती है. पूरी तरह खारिज हो जाती है. फिर लालू से गंठबंधन करते हैं. सीनियर पार्टनर और मुख्यमंत्री पद के दावेदार बनते हैं. महागठबंधन में सरकार चलाने से उनकी छवि पर छींटें पड़ते हैं और वे इन छींटों से बचने के लिए धुर विरोधी नरेंद्र मोदी की भाजपा की गोद में जा बैठते हैं.

बिहार में चुनाव की दो धुरी भाजपा और लालू ही हैं लेकिन सरदार नीतीश बनते हैं. बिना जनाधार वाला सरदार. लोग रामविलास को मौकापरस्ती से जोड़ते हैं. सफल मौकपरस्ती के लिए दो बातों का होना जरूरी है. समय देखकर आप किसी से भी जुड़ जायें और आपको हर कोई खुद से जोड़ ले. नीतीश समय-समय पर सबसे जुड़े और समय-समय पर हर कोई उन्हें खुद से जोड़ने को तैयार रहता है लेकिन उन पर मौकापरस्त का टैग नहीं लगा. इसे घाघ राजनीतिज्ञ होना कहते हैं. बिना जनाधार वाला घाघ सरदार.

बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Election 2020) में बीजेपी और राजद कुछ भी कर लें, कितनी भी रणनीति बना लें, मुख्यमंत्री तो नीतीश कुमार (Nitish Kumar) ही होंगे. अगर जेडीयू 60 विधायकों को भी जीता लेती है तो नीतीश कुमार जैसे राजनीतिक घाघ के लिए मुख्यमंत्री बने रहना कोई मुश्किल काम नहीं होगा. हां, अगर 60 से कम विधायक जीतकर आते हैं तो नीतीश कुमार को मुश्किलें पेश आ सकती हैं. इस समय नीतीश कुमार के लिए सबसे मुश्किल यह है कि सहयोगी दल BJP ही उन्हें CM पद पर नहीं देखना चाहती और राजद के तेजस्वी यादव (Tejaswi Yadav) तो कतई नहीं देखना चाहते. 

बीजेपी ने भले ही बिहार में नीतीश कुमार के चेहरे पर चुनाव लड़ने की बात कही है, लेकिन चिराग पासवान (Chirag Paswan) को आगे कर BJP ने जो दांव खेला है,  उससे JDU हक्का-बक्का रह गई है.  BJP की कोशिश यह है कि किसी भी हाल में नीतीश कुमार की पार्टी को उतनी सीटें न आ जाएं, जिससे वह मोलभाव करने की स्थिति में रहें. अब चिराग पासवान की पार्टी उन सीटों पर मजबूती से चुनाव लड़ेगी, जहां JDU मजबूत स्थिति में है और उन सीटों पर BJP वैसे तो JDU के साथ रहेगी पर अंदरखाने वह LJP को सपोर्ट करेगी. हालांकि BJP+LJP को मिलाकर बहुमत जितनी सीटें आ जाएंगी, इसकी संभावना कम लगती है. लिहाजा BJP चाहती है कि JDU इतनी कमजोर हो जाए कि मोलभाव न कर सके या NDA से इतर जाकर सरकार बनाने की सोच न सके. 

दरअसल, इस समय बिहार में नीतीश कुमार के खिलाफ जबरदस्त माहौल है. ताज़्ज़ुब की बात यह है कि BJP के खिलाफ माहौल खराब नहीं है और BJP इसी मौके को भुनाना चाहती है. बिहार की जनता को नीतीश कुमार में वो नीतीश नहीं दिख रहा, जो 2005 में मुख्यमंत्री बना था. महागठबंधन (Mahagathbandhan) से होकर लौटे नीतीश कुमार में जनता अपना मुख्यमंत्री नहीं देख पा रही है. मउज़फ्फरपुर शेल्टर होम केस, तमाम घोटालों के अलावा अपराध कंट्रोल करने के मोर्चे पर भी नीतीश कुमार फेल साबित हुए हैं. इसके अलावा 15 साल के शासन में बिहार में न विकास हुआ और न ही रोजगार मिला.  बाढ़ के मोर्चे पर भी बड़ी-बड़ी बातें लोगों को चिढ़ाती रहीं. मजदूरों का पलायन रोकने में भी नीतीश कुमार विफल हुए. इस कारण जनता का नीतीश कुमार से मोह भंग हुआ है. 

फिर भी नीतीश कुमार CM बने रहेंगे, आखिर हम ऐसा क्यों बोल रहे हैं? इसके लिए आपको पूरी आर्टिकल पढ़नी होगी, तब ट्विस्ट आएगा.  दरअसल नीतीश कुमार ने खुद के लिए एक सामाजिक-राजनीतिक व्यूह तैयार कर लिया है, जिसे भेदने के नीतीश कुमार जैसे धुरंधर ही मैदान में चाहिए.  सामाजिक-राजनीतिक व्यूह हम इसलिए बोल रहे है क्योंकि समाज के बहुमत का नहीं लेकिन एक धड़ा अब भी उनके साथ है. ठीक इसी तरह राजनीति में उन्होंने खुद को सर्वमान्य नेता के तौर पर पेश किया है. नीतीश कुमार की फेस वैल्यू इतनी अच्छी है कि BJP उन्हें समर्थन दे रही है और कांग्रेस उन्हें समर्थन दे सकती है. बल्कि कांग्रेस राजद को भी साथ ले सकती है. नीतीश को जरूरत पड़ी तो वाम दल भी साथ दे सकते हैं. तो ऐसे में सोचिए अगर BJP नीतीश कुमार को गच्चा देती है तो कांग्रेस नीतीश के साथ आ जायेगी. हो सकता है कांग्रेस राजद को भी साथ लाये पर ऐसा न होने पर वामदल तो साथ आ ही सकते हैं. RJD को अकेले बहुमत मिल जाये, इसकी उम्मीद न के बराबर है. BJP को LJP के साथ बहुमत मिल जाये, इसके लिए एड़ी चोटी का जोर लगाना होगा. उधर, चुनाव बाद महागठबंधन को बहुमत मिल भी जाता है तो कांग्रेस तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री बनने देगी, इसमें शक है. ऐसे में कांग्रेस और नीतीश कुमार एक साथ आकर वाम दलों के साथ मिलकर सरकार बना सकते हैं. 

क्यों बिहार की मजबूरी बन गए हैं नीतीश कुमार?

नीतीश मुसलमानों की बात करते हैं और भाजपा के लंबे समय तक साझीदार रहे. नीतीश सवर्णों की भी बात करते हैं और लालू के साझेदार हैं. नीतीश पिछड़ों की बात करते हैं और अगड़े उनकी सरकार की कमान संभालते हैं. नीतीश महादलित की बात करते हैं और मांझी को धकियाते हैं और फिर साध लेते हैं.

दरअसल, नीतीश ने बिहार की राजनीति को साध लिया है. भाजपा और लालू दोनों से बेहतर.  जीत के लिए अगर 45 प्रशिशत चाहिए तो नीतीश इसका आखिरी 10 प्रतिशत हैं. भाजपा (+) और लालू कुल मिलाकर 70 प्रशितत होंगे लेकिन ये विरोधी धुरी हैं. नीतीश के बिना न भाजपा (+) 45 प्रतिशत हो सकती है और न ही लालू. वे इसी का फायदा उठाते हैं. बीच-बीच में वे खुद को भी टेस्ट करते हैं लेकिन हमेशा वह खुद को 10 प्रतिशत ही पाते हैं लेकिन वे इस महज 10 प्रतिशत को कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने देते. वे इसका सर्वश्रेष्ठ इस्तेमाल करते हैं और अचूक इस्तेमाल करते हैं.

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