यूं तो अपना देश चौथे साल के बजट से ही चुनावी मोड में आ जाता है। चौथे साल में सरकारें चुनाव को ध्यान में रखकर बजट में लोकलुभावन घोषणाएं करती हैं, ताकि पिछले कुछ वर्षों की जनता की नाराजगी दूर की जा सके, लेकिन इस साल बजट में ऐसा कुछ नहीं हुआ, जिसके आधार पर यह बात कही जाए। हां, आयुष्मान भारत की घोषणा जरूर हुई पर ऐसा नहीं लगता कि यह योजना इस चुनाव में अपनी कोई खास भूमिका अदा कर पायेगी, क्योंकि लोगों तक इसका लाभ पहुंचने से पहले चुनाव का परिणाम आ चुका होगा। एमएसपी को लेकर सरकार ने कुछ कदम जरूर उठाये, लेकिन यह पहले से घोषित था। अब इसे सरकार का आत्मविश्वास माना जाए या फिर इसे ढीठ सरकार कहा जाए।बजट में इलेक्शन मोड भले न दिखा हो, पर अब देश पूरी तरह इसके लिए तैयार दिख रहा है। पार्टियों की गहमागहमी, उनकी तैयारी और बयानबाजी बता रही है कि वे चुनाव के लिए कमर कस चुके हैं। बस बिगुल फूंकने की देर है और वे एक-दूसरे पर टूट पड़ेंगे। निकल पड़ेंगे जनता को हथियाने, रिझाने और बरगलाने के लिए। विपक्षी हिसाब मांग रहे हैं तो सत्ताधारी दावे कर रहे हैं। पिछले चुनाव में जो दावे कर रहे थे, वे अब वादे कर रहे हैं और जो वादे कर रहे थे वे दावे कर रहे हैं। न्यूटन के गति का तीसरा नियम यहां सटीक सा लग रहा है। पेट्रोल की महंगाई और डॉलर की कमर टूटने से जनता आक्रोशित है, विपक्ष इस पर जवाब मांग रहा है तो सरकार इस पर फंसती दिख रही है। राफेल पर विपक्ष कमर कसे हुए है तो सरकार भी अलग-अलग मंचों से इसका जवाब दे रही है।
अयोध्या में राम मंदिर, धारा 370, समान नागरिक संहिता, 15 लाख रुपये, बेरोजगारी, गोरक्षा, गंगा की सफाई, एक के बदले 10 सिर लाने के वादे अब सरकार की पेशानी पर बल डाल सकते हैं, वहीं उज्ज्वला योजना, जनधन, मुद्रा, स्टार्टअप, स्टैंडअप, आयुष्मान भारत, आतंकवाद पर लगाम, 18 हज़ार गांव का विद्युतीकरण के अलावा बिजली की समुचित आपूर्ति को सरकार भुना सकती है। सर्जिकल स्ट्राइक और नोटबन्दी को सरकार ट्रम्प कार्ड के रूप में इस्तेमाल कर सकती है, वहीं विपक्ष इसी मुद्दे पर सरकार से दो-दो हाथ करने को तैयार है। इन दिनों राफेल डील पर संग्राम छिड़ा हुआ है। गोपनीयता कानून को हथियार बनाते हुए विपक्ष नित नए आरोप लगा रहा है, वही सरकार की तरफ़ से भी करार जवाब मिल रहा है।सरकार की बात करें तो जीएसटी पर अभी बहुत कुछ करना बाकी है। पेट्रोलियम पदार्थों की महंगाई थामने को लेकर कोई कदम नहीं उठाए गए। ट्रेनों की लेटलतीफी पर कोई आश्वासन सरकार ने नहीं दिया। पाकिस्तान, कश्मीर, आतंकवाद, धारा 370, राम मंदिर, समान नागरिक संहिता, आर्थिक रूप से कमजोर अगड़ों को आरक्षण, जाट-गुर्जर आरक्षण आंदोलन, एससी-एसटी एक्ट अब भी सरकार की कमजोरी साबित करती हैं। हरियाणा, राजस्थान, गुजरात और मध्यप्रदेश जैसे गढ़ में भाजपा पहले से कमजोर हुई है तो असम, बंगाल और अन्य पूर्वोत्तर के राज्यों में पार्टी ने अपने हालात सुधारे हैं। ओडिसा, कर्नाटक और केरल में भी पार्टी बेहतर स्थिति में है। उत्तर प्रदेश में नुकसान प्रबल है तो बिहार, झारखंड और उत्तराखंड के अलावा छत्तीसगढ़ में पार्टी न नुकसान में है और न फायदे में है। तमिलनाडु में जयललिता और करुणानिधि की मौत के बाद का खालीपन पार्टी को फायदा दिलाता है या नही, यह देखना बाकी है। आंध्र में जगन मोहन और तेलंगाना में चंद्रशेखर से दोस्ताना फायदे का सौदा साबित हो सकता है
वही विपक्ष की बात करें तो उत्तर प्रदेश से अछि खबर आ सकती है। विपक्ष को जीत के लिए आपस मे फायदा नुकसान से इतर एक साथ आना होगा। बिहार में विपक्ष के लिए बराबरी की लड़ाई है तो बंगाल में ममता की छांव तले सबको इकठा होना होगा। राजस्थान, मध्यप्रदेश और हरियाणा से विपक्ष को सौगात मिल सकती है। पूर्वोत्तर से विपक्ष की उम्मीद को पलीता लग सकता है। ओडिसा में कांग्रेस के लिए कोई अच्छी खबर नही है तो आंध्र में चंद्रबाबू नायडू सरकार को एंटी इनकंबेंसी का सामना करना पड़ सकता है। केरल अभी भी विपक्ष के लिए खुशनुमा हो सकता है। महाराष्ट्र की राजनीति में अभी बहुत कुछ होना बाकी है, फिर भी भाजपा को नुकसान होता नही दिख रहा है। कर्नाटक में कुमारस्वामी की नौटंकी की ठीकरा कांग्रेस पर ही फूटना है। झारखंड भाजपा के लिए सेफ हाउस बना हुआ है। चुनाव में अभी छह महीने बाकी हैं और सरकार आयुष्मान भारत जैसी योजना लॉच कर चुकी है। पक्ष और विपक्ष की ओर से अभी कई तीर छूटने बाकी हैं। राहुल मंदिर-मंदिर घूम रहे हैं तो सरकार तीन तलाक़ और हलाला के खिलाफ अध्यादेश ला चुकी है। अभी कई नेता पाला बदलेंगे। घात होगा, प्रतिघात होगा। राजनीतिक तापमान बढ़ेगा। चुनाव में अचानक पाकिस्तान की एंट्री होगी। आत्मघाती बयान होंगे, दूसरों को मौका मिलेगा। भूल होगी, चूक होगी। अंत में जनता आशीर्वाद देगी

उम्दा विश्लेषण।
जवाब देंहटाएंझारखंड सेफ हाउस बनेगा, इसको लेकर सहमत नहीं। मेरी जानकारी ये है कि झारखंड सरकार से जनता बुरी तरह त्रस्त है, अफसर नहीं हैं खुश।
समीक्षा अच्छी की है सर जी।
जवाब देंहटाएंबहुत बढ़िया...
जवाब देंहटाएंबेहतरीन बड़े भैया...
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