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जून 25, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

#Nitish को समझना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है

बिहार की राजनीति एक बार फिर से करवट ले रही है। महागठबंधन के नेताओं के रोज आ रहे नए-नए बयान सुर्खियां बन रहे हैं। आम के मौसम में जनता परिवार के बीच खटास बढ़ती जा रही है। हर एक बयान के बाद डैमेज कंट्रोल की कोशिश हो रही है तब तक एक नया बयान आ जाता है। रिश्‍ते तल्‍ख हो रहे हैं और बदलाव की आहट हर रोज सुबह के साथ महसूस हो रही है और शाम को फिर समन्‍वय की कोशिश हो रही होती है। छटपटाहट सभी को है पर पहल कौन करे। जाहिर है पहल नीतीश कुमार को ही करनी होगी क्‍योंकि लालू यादव ऐसा करने से रहे। केंद्र के बाद अब वे किसी भी कीमत पर बिहार की सत्‍ता से विमुख होना नहीं चाहेंगे। ऐसा नहीं है कि महागठबंधन में आई दरार का एकमात्र कारण राष्‍ट्रपति चुनाव ही है। इसकी खिचड़ी तब से पक रही थी, जब नीतीश कुमार को यह भान हो गया कि लालू प्रसाद यादव के साथ सरकार चलाने में उनकी ही मिट़टी पलीद होनी है। उनकी ही छवि को बट़टा लगेगा, क्‍योंकि लालू यादव जो कर रहे हैं वो उनके लिए नैसर्गिक है। उनका वोट बैंक भी यही चाहता है। इसलिए उन्‍हें कोई नुकसान नहीं है। नुकसान हर हाल में नीतीश कुमार को ही होना है। पिछले चुनाव में भी उन्...