'भारत के लोग संयुक्त राष्ट्र (United Nations) के रिफॉर्म्स को लेकर लंबे समय से इंतजार कर रहे हैं. आज भारत के लोग चिंतित हैं कि क्या यह प्रोसेस लॉजिकल एंड पर पहुंच पाएगा. आखिर कब तक भारत को संयुक्त राष्ट्र के डिसिजन मेकिंग स्ट्रक्चर (Decision Making Structure) से अलग रखा जाएगा? एक ऐसा देश जो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहां विश्व की 18% से ज्यादा जनसंख्या रहती है, जहां सैकड़ों भाषाएं हैं, सैकड़ों बोलियां हैं, अनेकों पंथ हैं, अनेकों विचारधाराएं हैं. जिस देश ने सैकड़ों वर्षों तक वैश्विक अर्थव्यवस्था (Global Economy) का नेतृत्व करने और सैकड़ों वर्षों तक गुलामी दोनों को झेला है.' प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) 26 सितंबर की शाम को (भारतीय समयानुसार) जब संयुक्त राष्ट्र की जनरल एसेंबली (UNGA) को संबोधित कर रहे थे, तो उनकी मुद्रा अलग थी. वो संयुक्त राष्ट्र के रिफॉर्म्स (United Nation Reforms) को लेकर गुहार नहीं कर रहे थे, बल्कि चेतावनी दे रहे थे. वैसे इंटरनेशनल प्लेटफॉर्म पर पीएम नरेंद्र मोदी (PM Modi) कभी गुहार की मुद्रा में नहीं रहते. वह खुद ही कहते हैं, न हम आंख झुकाकर बात करेंगे और न ही आंख उठाकर, हम बात करेंगे तो आंख में आंख मिलाकर.
याचना नहीं, अब रण होगा.... प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी (Former PM Atal Bihari Vajpayee) की कविता की झलक साफ दिख रही थी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जो लोग करीब से जानते हैं, उन्हें इस बार के संबोधन से भान हो गया होगा कि अब भारत संयुक्त राष्ट्र में सुधार को लेकर बहुत इंतजार करने के मूड में नहीं है. पिछले कई दशकों से संयुक्त राष्ट्र में सुधार की बातें की जा रही हैं लेकिन आज भी संयुक्त राष्ट्र वहीं अटका हुआ है, जहां वह अपने स्थापत्य काल में था. प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में संयुक्त राष्ट्र के इस दुखती रग को कुरेदने की भी कोशिश की.
कोरोना वायरस संक्रमण के काल में कई जानकार यह दावा कर रहे थे कि पोस्ट कोविड (Post Covid-19) वर्ल्ड ऑर्डर में बदलाव हो सकता है. यह बात तब और पुख्ता महसूस की गई, जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने विश्व स्वास्थ्य संगठन को दी जाने वाली सहयोग राशि को स्थगित करने की घोषणा कर दी और दूसरा विश्व स्वास्थ्य संगठन की चर्चा भी छेड़ दी थी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कोरोना वायरस संक्रमण के बहाने विश्व स्वास्थ्य संगठन पर हमला बोला. तो क्या पीएम नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप वर्ल्ड ऑर्डर चेंज करने के पक्ष में हैं. संयुक्त राष्ट्र में पीएम नरेंद्र मोदी का भाषण अब तक भारत के किसी भी शासनाध्यक्ष की ओर से दिया गया सबसे तीखा भाषण था. यह तीखापन उस व्यवस्था के खिलाफ था, जो यह भूल गया है कि परिवर्तन संसार का नियम है. उस जड़ता के खिलाफ था, जो खुद में बदलाव के लिए तैयार नहीं हो रहा है.
22 मिनट के अपने लंबे भाषण में पीएम नरेंद्र मोदी ने आतंकवाद, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत के लिए स्थायी सदस्यता, कोरोना महामारी और भारत में चलाई जा रही लोक कल्याणकारी योजनाओं का जिक्र किया. पीएम मोदी ने यह कहकर भी दुनिया को आश्वस्त किया कि दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीन उत्पादक देश भारत विश्व को इस संकट से निकालने के लिए हरसंभव कोशिश करेगा. दरअसल, पीएम नरेंद्र मोदी दुनिया को यह जताने की कोशिश कर रहे थे कि भारत संयुक्त राष्ट्र के डिसिजन मेकिंग प्रॉसेस में नहीं है तो क्या हुआ, भारत अपने आप में संयुक्त राष्ट्र है. जो काम विश्व संस्था होने के नाते संयुक्त राष्ट्र नहीं कर पा रहा, उस काम में भारत हमेशा आगे रहता है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र की जड़ता पर प्रहार करते हुए कहा, 1945 की दुनिया निश्चित तौर पर अलग थी. तब विश्व कल्याण की भावना के साथ जिस संस्था का गठन हुआ, जिस स्वरूप में गठन हुआ, वो उस समय के हिसाब से था. आज 21वीं सदी में हमारे भविष्य की जरूरत और चुनौतियां कुछ और हैं. इस समय सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस संस्था का गठन दूसरे विश्वयुद्ध के बाद के हालात में हुआ था, क्या उसका स्वरूप आज भी प्रासंगिक है. संयुक्त राष्ट्र को आईना दिखाते हुए पीएम मोदी ने कहा, संयुक्त राष्ट्र के सामने गिनाने को कई उपलब्धियां होंगी, लेकिन अनेक ऐसे उदाहरण भी हैं जो इस विश्व संस्था के सामने आत्ममंथन की जरूरत पर बल दे रहे हैं.
पीएम मोदी ने कहा, कहने को तो तीसरा विश्व युद्ध नहीं हुआ लेकिन हम नकार नहीं सकते कि अनेकों युद्ध हुए, कई गृह युद्ध भी हुए. कितने आतंकी हमलों ने दुनिया को थर्रा कर रख दिया. खून की नदियां बहती रहीं. वो लाखों मासूम बच्चे जिन्हें दुनिया पर छा जाना था, वो दुनिया छोड़कर चले गए. उस समय और आज भी संयुक्त राष्ट्र के प्रयास क्या पर्याप्त थे?
अप्रत्यक्ष रूप से विश्व स्वास्थ्य संगठन पर चोट करते हुए पीएम मोदी ने कहा, पिछले 8-9 महीनों से पूरा विश्व कोरोना महामारी से लड़ रहा है, इस वैश्विक महामारी से निपटने के प्रयासों में संयुक्त राष्ट्र कहां है? इस बहाने भी उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की प्रतिक्रियाओं में बदलाव, व्यवस्थाओं में बदलाव, स्वरूप में बदलाव की जरूरत पर बल दिया. पीएम मोदी ने विश्व संस्था को यह भी जताया कि भारत के 130 करोड़ से ज्यादा लोगों का संयुक्त राष्ट्र में अटूट विश्वास है. तो क्या वह चेतावनी नहीं दे रहे थे कि संयुक्त राष्ट्र ने अपनी भूमिका नहीं बदली या संयुक्त राष्ट्र का स्वरूप नहीं बदला तो भारत की प्राथमिकताएं क्या हो सकती हैं.
पीएम नरेंद्र मोदी ने विश्व संस्था के सामने भारत के लिए एक मजबूत रेखाचित्र खींचते हुए कहा, जब हम मजबूत थे तो दुनिया को कभी सताया नहीं. जब हम मजबूर थे तो दुनिया पर बोझ नहीं बने. जिस देश में हो रहे परिवर्तनों का प्रभाव दुनिया के बहुत बड़े हिस्से पर पड़ता है, उस देश को आखिर कब तक इंतजार करना पड़ेगा. पीएम मोदी बोले- हम पूरे विश्व को एक परिवार मानते हैं. यूएन में भी भारत ने हमेशा विश्व कल्याण को ही प्राथमिकता दी है. भारत ने विश्व शांति की स्थापना के लिए करीब 50 पीसकीपिंग मिशन में अपने जांबाज सैनिक भेजे. शांति की स्थापना में भारत ने अपने सबसे अधिक वीर सैनिकों को खोया है. इसलिए आज हर भारतवासी संयुक्त राष्ट्र में अपने योगदान को देखते हुए यूएन में व्यापक भूमिका की राह देख रहा है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, कोरोना महामारी के मुश्किल समय में भी भारत ने 150 से अधिक देशों को जरूरी दवाएं भेजीं. हम फेज-3 क्लीनिकल ट्रायल की तरफ बढ़ रहे हैं. वैक्सीन की डिलिवरी के लिए स्टोरेज जैसी क्षमता बढ़ाने में भी भारत सभी की मदद करेगा. अगले साल जनवरी से भारत सुरक्षा परिषद के अस्थायी सदस्य के तौर पर भी अपना दायित्व निभाएगा. भारत की आवाज हमेशा शांति, सुरक्षा और समृद्धि के लिए उठेगी. भारत की आवाज मानवता, मानव जाति और मानवीय मूल्यों के दुश्मन आतंकवाद, अवैध हथियारों की तस्करी, ड्रग्स और मनी लॉन्ड्रिंग के खिलाफ उठेगी. भारत की सांस्कृतिकि धरोहर, संस्कार, हजारों वर्षों का अनुभव हमेशा विकासशील देशों का साथ देंगे.
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