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दिसंबर 27, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

नववर्ष मंगलमय हो

नववर्ष मंगलमय हो नूतन हो, सृजन हो नवीन सोच हो, दर्शन हो सारी धरती और सारा आकाश हो नववर्ष मंगलमय हो जीवन में बहार हो जिंदगी लाजबाब हो उमंग हो, उत्साह हो सबका प्यार हो नववर्ष मंगलमय हो सबका प्यार मिले सबका दुलार मिले सब तुझे चाहें, तू सबको चाहे दुश्मन भी दोस्त हो जाए ऐसा तुझे संसार मिले नववर्ष मंगलमय हो वेदना नहीं, संवेदना हो दर्द नहीं, आनंद हो तड़प नहीं, प्रणय हो बिछुड़न नहीं, साथ मिले नववर्ष मंगलमय हो विछोह नहीं, संसर्ग हो त्याग हो, अर्पण हो तेरा तुझको मिले मेरा मुझको मिले नववर्ष मंगलमय हो गुरु आपको ज्ञान दें मित्र भी आपको सम्मान दें बच्चों को स्नेह मिले बड़ों का आशीष मिले नववर्ष मंगलमय हो मां लक्ष्मी आपको दौलत दे मां सरस्वती दे दे विद्या गणपति आपको बुद्धि दें मां दुर्गा बनाएं बलवती हर सुख से खुशहाल रहें नववर्ष मंगलमय हो सारी धरती और सारा आकाश हो नववर्ष मंगलमय हो

सड़ गई है प्रयोगशाला की 'परखनली'

बिहार मतलब राजनीति की प्रयोगशाला। आज़ादी के बाद से अमूमन राजनीति के सभी प्रयोग बिहार में ही हुए हैं। इन प्रयोगों से जो निष्कर्ष निकला, उससे देश का तो कही न कही भला हो गया पर निरंतर प्रयोगों से प्रयोगशाला रूपी बिहार की 'परखनली' सड़ गयी प्रतीत होती है। बिहार उस कम्पास की तरह हो गया, जो दूसरों को दिशा दिखाते दिखाते खुद दिशाहीन हो गया। प्रयोगकर्ताओं ने बिहार के लोगों के मन में ये सफलतापूर्वक भर दिया कि तुम बिहार के हो तो तुर्रम खान हो। ऐसा इसलिए किया गया ताकि लोग दम्भ में चूर हो जाएँ। क्योंकि दम्भ में चूर व्यक्ति किसी के आगे हाथ नहीं फैलाता। वो खुद को दाता समझने लगता है। राजनेताओं के लिए प्रयोग दर प्रयोग यह आसान होता गया। बिहार के लोगों ने कभी नेताओं के आगे अपनी झोली नहीं फैलाई और आवश्यकता से अधिक स्वाभिमान के बोझ तले दबे रहे और राजनेता मौज करते रहे। अमूमन बिहार के लोगों को राजनितिक दृष्टि से अधिक संवेदनशील माना जाता है। यह भी लोगों को दम्भित करने का सिला है, जो बहुत ही सोच समझकर किया गया। नहीं तो इसके पीछे का कोई वैज्ञानिक या भौगोलिक कारण उपलब्ध नहीं है। दरअसल बिहार के लोगों को ...