मोदी सरकार की असहिष्णु नीतियों के विरोध में देश से लेकर विदेशों तक में आवाजें उठाई जा रही हैं। भारत में तो आधे से भी अधिक साहित्यकारों ने अपने-अपने पुरस्कार लौटा दिए हैं। फिल्मकारों और अब वैज्ञानिकों ने भी पुरस्कार लौटाने की महत्ती रस्म निभाने की कवायद शुरू कर दी है। शायर मुनव्वर राना ने पुरस्कार तो लौटा दिया पर प्रधानमंत्री कार्यालय से एक बार बुलावा आ गया तो जूता सिर पर रखने की बात करने लगे। जाहिर है पुरस्कार वे इसलिए लौटा रहे थे कि इतने बड़े शायर होने के बाद भी प्रधानमंत्री कार्यालय से बुलावा नहीं आ रहा था। बेचारे कसमसा रहे हैं कि अब कौन सा मुंह लेकर प्रधानमंत्री के सामने जाएं। लिहाजा क्षतिपूर्ति करने के लिए जूता उठाने की बात कहते फिर रहे हैं। दूसरे लोग इसलिए अभी तक नाराज हैं कि सिर्फ मुनव्वर को ही बुलावा क्यों आया, हमें क्यों नहीं आया? मुनव्वर तो जूता उठाता, हम तो बहुत कुछ उठा सकते थे। हम जो उठाते तो मुनव्वर भी शरमा जाते। वसुधैव कुटुंबकम के जमाने में इस बात की चर्चा और इसका प्रभाव अब विदेशों में पड़ने लगा है। देश का मोस्ट वांटेड दाउद इब्राहिम ने साहित्यकारों, फिल्मकारों और वैज्ञा...