दिल्ली में हिंसा अब सालाना जलसे की तरह हो गई है. पिछले साल नागरिकता कानून के नाम पर दिल्ली को भड़काया गया तो इस बार किसान आंदोलन के नाम पर दिल्ली को दहलाया गया. संभव है कि अगले साल कोई और बहाने से किसी और को आगे कर अपना उल्लू सीधा किया जाए. कुल मिलाकर सरकार को नवंबर के बाद सचेत हो जाना चाहिए, क्योंकि इसकी क्रोनोलॉजी समझना बेहद जरूरी है. वो तो खैर मनाइए कोरोना महामारी का कि दिल्ली का दंगा कंट्रोल हो गया, नहीं तो हम वो देखने वाले थे, जो कभी सोच भी नहीं सकते थे.
ये जो तस्वीरें आप देख रहे हैं, वो आपको विचलित करने के लिए काफी हैं. गणतंत्र दिवस जैसे गौरवशाली दिन, जब हमें दुनिया को अपना गौरव दिखाना होता है, उस दिन को आंदोलन के नाम पर राष्ट्रीय शर्म बना दिया गया. एक तरफ जवान दुनिया के सामने अपना फौलादी इरादा जाहिर कर रहे थे तो दूसरी ओर, दिल्ली को दहलाने के लिए कुछ साजिशें कुछ कर गुजरने के लिए बेकरार हो रही थीं. तभी तो तय समय से पहले कई जगहों पर दिल्ली पुलिस की बैरिकेडिंग तोड़ने की खबरें आने लगीं. यह पहले से तय था कि आज का दिन भारी साबित होने वाला है, फिर भी सरकार और दिल्ली पुलिस ने किसानों को तय शर्तों के आधार पर ट्रैक्टर मार्च निकालने की आजादी दी. अमेरिका के कैपिटल हिल कांड की जो ताकतें आलोचना कर रही थीं, वे किसान आंदोलन के नाम पर दिल्ली में फैली अराजकता के लिए दिल्ली पुलिस और सरकार को कोसती दिखीं.
दिल्ली में पिछले दो माह से जो कुछ चल रहा था, उस आधार पर देखें तो यह सब होना ही था. किसानों की जिद को जज्बा करार देने वाले आंदोलन के पक्ष में थे, जबकि सरकार के साथ 11 दौर की बातचीत के बाद भी कोई फल न निकलने से यह तय हो गया था कि उसका हश्र ऐसा हो सकता है. लेकिन इतना भयानक हश्र होगा, इसका अंदाजा शायद किसी को नहीं होगा.
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सरकार और दिल्ली पुलिस को भी दाद देनी होगी कि गणतंत्र दिवस के दिन लाल किला और आईटीओ पर उपद्रवियों के बवाल के बीच भी बलप्रयोग नहीं कर पाई. शायद सरकार इस पसोपेश में थी कि बलप्रयोग से आंदोलन को सहानुभूति न मिल जाए, इसलिए उसने उपद्रवियों को वो सब करने दिया, जो वो करना चाहते थे. हालांकि सरकार ने यह सब राष्ट्रीय शर्म की कीमत पर करने दिया. शायद सरकार किसानों को मिल रही सहानुभूति को पूरी तरह खत्म कर देना चाहती थी, ताकि कार्रवाई के समय कोई ओह या आह न निकाल पाए. यह हमारा अंदाजा या अंदेशा हो सकता है. भगवान जानें सरकार क्या करना और दिखाना चाहती थी.
तो दिल्ली में हिंसा का ताजा एपिसोड कब तक चलेगा, यह कहना तो अभी मुश्किल है, लेकिन लगता है कि अब हंटर चलेगा. हंटर इसलिए चलेगा कि किसान संगठनों ने हिंसा से पल्ला झाड़ लिया है. तो फिर यह सोचना होगा कि वो कौन लोग हैं जो किसानों के साथ दिल्ली में प्रवेश कर गए हैं और निकलने का नाम नहीं ले रहे हैं. जवानों का मनोबल बढ़ाने के लिए दिल्ली पुलिस कमिश्नर ने आंदोलन से सख्ती से निपटने का आदेश दे दिया है. यह पूरा साल तो जांच, एफआईआर, गिरफ्तारी और चार्जशीट में निकल जाएगा. हां, एक बात का खास ध्यान रखिएगा कि नवंबर-दिसंबर से फिर किसी आंदोलन के लिए तैयार हो जाइएगा, क्योंकि यह तो अपना सालाना जलसा होता जा रहा है. फिर किसी नए कानून को लेकर यह जलसा नए रूप में नए कलेवर में आपके सामने होगा.


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