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दिसंबर 20, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मन की बात!

मित्रों, मन की बात यह है कि मन बड़ा परेशान है। मैं मन की बात करता गया और आपलोग अनसुना करते गए। दिल्ली और बिहार मेरे हाथ से निकल गया। विरोधियों के साथ साथ अपनों की उँगलियाँ भी उठने लगी हैं। वे उँगलियाँ भी उठने लगी हैं, जो रोटी भी नहीं उठा पातीं। इसलिए व्यथित हूँ। अब आप लोग ही मेरा साथ नहीं देंगे तो कौन देगा? मित्रों, इस बार मन की बात को गौर से सुनिएगा। मैं रूस में था। वहां से काबुल होते हुए मुझे दिल्ली आना था। दिल्ली में वाजपेयी जी को जन्मदिन की बधाई देनी थी। काबुल में वहां की संसद को संबोधित करते हुए मैंने आतंकवाद पर इशारों में पकिस्तान को जमकर कोसा। फिर अचानक पाकिस्तान जाने का निर्णय ले लिया। संयोग से उसी दिन नवाज का जन्मदिन भी था। मई समझ सकता हूँ कि मेरे इस फैसले को लेकर क्या प्रतिक्रिया हुई होगी। क्या देश, क्या विदेश सभी हतप्रभ थे पर आपलोग तो जानते ही हैं कि इसी तरह मैंने बराक, शी और आबे को सरप्राइज़ दिया था। यह आज की विदेश नीति की मांग है। इसके परिणाम क्या होंगे, इसमें मैं नहीं जा रहा पर अटल जी की पहल को आगे बढ़ाते हुए मैंने उन्हें जन्मदिन का तोहफा देने की कोशिश की है। मित्र...

गुम होते जवाब

सवाल हावी हो रहे हैं और जवाब गुम। सवाल के जवाब में नए सवाल हैंपर जवाब नहीं है। छोटे सवाल के जवाब में बड़ा सवाल है। प्रश्नोत्तर की विधा प्रश्न और प्रश्न के खेल में दफन होती जा रही है। अब यह प्रश्न बड़ा हो चला है कि मेरा प्रश्न बड़ा है कि तुम्हारा। जवाब के कोई मायने नहीं हैं और जवाब कोई चाह भी नहीं रहा है।  ये कोई एक आदमी कर रहा है, एक संस्था कर रही है या फिर सरकार कर रही है, यह कहना गलत होगा। यह हम सब मिलकर कर रहे हैं। जो यह नहीं कर रहा है, हम उसका उपहास उड़ा रहे हैं, वैचारिक रूप से उस पर हमला बोल रहे हैं।  हम आपस में एक दूसरे की आवाज को दबाना चाहते हैं और अपनी आवाज को भी धार नहीं दे पा रहे हैं। घोटाले का जवाब घोटाला है। मेरा घोटाला छोटा और तुम्हारा घोटाला बड़ा। मेरे राज्य में क्राइम कम और तुम्हारे राज्य में ज्यादा। मेरा राज्य अच्छा और तुम्हारा राज्य बुरा। मेरा अपराध छोटा और तुम्हारा अपराध फांसी पर चढ़ने लायक। बहस का दायरा इसी मेरे और तेरे में सिमटता जा रहा है। अखबार, टीवी और सोशल मीडिया के डिबेट में इसे लगातार बल मिल रहा है। तर्क गायब होता जा रहा है। जब सवाल नहीं होंगे तो तर्क...

मोदी से ताकतवर हैं जेटली

वाकई बहुत नाइंसाफी है रे। दुस्साहस दिखाने के चलते भाजपा ने कीर्ति को तो आजाद कर दिया लेकिन शत्रु को ‘खामोश’ करने का कोई नुस्खा अभी पार्टी के पास नहीं दिखता। कीर्ति के तल्ख तेवर तो हफ्ते भर से टीवी की टीआरपी बढ़ा रहे हैं, वहीं शत्रु पिछले कई महीनों से अपना गुबार निकालकर मोदी लहर के गुब्बारे में सूई घोंप रहे हैं। कीर्ति के साथ-साथ राजनीति को जानने समझने वाले भी पार्टी के इस कदम से भौंचक हैं। जब पार्टी कीर्ति आजाद पर कार्रवाई कर सकती है तो शत्रुघ्न सिन्हा, आरके सिंह, भोला सिंह आदि नेताओं पर क्यों नहीं? इन नेताओं ने तो सीधे-सीधे नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को चुनौती दे दी थी। फिर भी इन पर रहमोकरम समझ से परे है। तो क्या यह मान लिया जाए कि भाजपा में नरेंद्र मोदी पर हमला करना आसान है और अरुण जेटली को निशाना बनाना मुश्किल। अभी तक पत्रकार लोग कलम इस मुद्दे पर तोड़ रहे थे कि नरेंद्र मोदी काफी शक्तिशाली प्रधानमंत्री हैं। कोई इसके खिलाफ लिख रहा था तो कोई इसके समर्थन में था लेकिन सरकार द्वारा उठाए गए पिछले कुछ कदमों को देखें तो प्रतीत होता है कि अरुण जेटली पार्टी और सरकार के लिए मास्टरमाइंड के रू...