कन्हैया छिछोर है, बदतमीज है, आवारा है लेकिन कुछ लोग मजबूर हैं कन्हैया की तारीफ करने के लिए। क्या करें बेचारे, सामने कोई बड़ा चेहरा ही नहीं है। नीतीश कुमार जीत जाते हैं तो उनमें अपना चेहरा देखने की कोशिश, ममता जीत जाएंगी तो उनमें एक चेहरा ढूंढने की कोशिश, केजरीवाल एक चलता-फिरता चेहरा हैं ही, रोहित वेमुला भी चेहरा हो जाते हैं। कन्हैया और उमर खालिद भी एक विकल्प हैं या फिर विकल्पहीनता के मारे हुए लोगों का चेहरा हैं। दूसरी ओर, स्वमेव राहुल गांधी पापड़ की तरह सतह पर हैं ही, जिनके इर्द गिर्द हमेशा बरी थोपने की कोशिश की जाती है। जब जो लोग सफल हो जाते हैं, वे राहुल गांधी और बाकियों को वैसे ही कोसते रहते हैं, जैसे अरविंद केजरीवाल। जो लोग सफल नहीं हो पाते, वे राहुल गांधी में ही अपना चेहरा ढूंढते रहते हैं। विकल्पहीनता के मारे लोगों को क्या कहें, जिस आवारा कन्हैया को पेशाब करने का सऊर नहीं है उसे राष्टृीय राजनीति के परिप्रेक्ष्य में खड़ा करने की कोशिश करते हैं। दिल्ली विवि की एक असिस्टेंट प्रोफेसर ने खुलासा किया है कि जेएनयू कैंपस में कन्हैया बेतरतीब तरीके से पेशाब कर रहा था। ...