नीतीश की समता पार्टी चुनाव लड़ती है। लगभग पूरा सफाया हो जाता है। फिर भाजपा से गठबंधन करते हैं और सीनियर पार्टनर और मुख्यमंत्री के दावेदार बनते हैं। नीतीश की जदयू 2014 का लोकसभा चुनाव अकेले लड़ती है। पूरी तरह खारिज हो जाती है। फिर लालू से गंठबंधन करते हैं। सीनियर पार्टनर और मुख्यमंत्री पद के दावेदार बनते हैं। महागठबंधन में सरकार चलाने से उनकी छवि पर छींटें पड़ते हैं और वे इन छींटों से बचने के लिए धुर विरोधी नरेंद्र मोदी की भाजपा की गोद में जा बैठते हैं।
बिहार में चुनाव की दो धुरी भाजपा और लालू ही हैं लेकिन सरदार नीतीश बनते हैं. बिना जनाधार वाला सरदार. लोग रामविलास को मौकापरस्ती से जोड़ते हैं। सफल मौकपरस्ती के लिए दो बातों का होना जरूरी है। समय देखकर आप किसी से भी जुड़ जायें और आपको हर कोई खुद से जोड़ ले. नीतीश समय-समय पर सबसे जुड़े और समय-समय पर हर कोई उन्हें खुद से जोड़ने को तैयार रहता है लेकिन उन पर मौकापरस्त का टैग नहीं लगा। इसे घाघ राजनीतिज्ञ होना कहते हैं। बिना जनाधार वाला घाघ सरदार।
नीतीश मुसलमानों की बात करते हैं और भाजपा के लंबे समय तक साझीदार रहे। नीतीश सवर्णों की भी बात करते हैं और लालू के साझेदीदार हैं। नीतीश पिछड़ों की बात करते हैं और अगड़े उनकी सरकार की कमान संभालते हैं। नीतीश महादलित की बात करते हैं और मांझी को धकियाते हैं। इसे अन्तर्विरोधी होना कहते हैं। बिना जनाधार वाला अन्तर्विरोधी घाघ सरदार।
नीतीश ने बिहार की राजनीति को साध लिया है। भाजपा से बेहतर , लालू से बेहतर। जीत के लिए अगर 45 प्रशिशत चाहिए तो नीतीश इसका आखिरी 10 प्रतिशत हैं। भाजपा (+) और लालू कुल मिलाकर 70 प्रशितत होंगे लेकिन ये विरोधी धुरी हैं। नीतीश के बिना न भाजपा (+) 45 प्रतिशत हो सकती है और न ही लालू। वे इसी का फायदा उठाते हैं. बीच-बीच में वे खुद को भी टेस्ट करते हैं लेकिन हमेशा वह खुद को 10 प्रतिशत ही पाते हैं लेकिन वे इस महज 10 प्रतिशत को कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने देते। वे इसका सर्वश्रेष्ठ इस्तेमाल करते हैं और अचूक इस्तेमाल करते हैं।
मीडिया नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल को महान मीडिया मैनेजर बताती है पर बिहार में नीतीश के मैनेजमेंट के आगे सब फेल हैं। वहां केवल नीतीश की चलती है। तभी तो उनके एनडीए में आते ही राजनीतिक गणितज्ञ 2019 के बारे में तमाम बातें कर रहे हैं। 10 प्रतिशत वाला नेता न केवल बिहार बल्कि पूरे देश में अभी चर्चा का विषय बना हुआ है। देशभर के अखबारों के फ्रंट पेज नीतीश कुमार की खबरों से रंगे हुए हैं और टीवी चैनल नॉन स्टॉप नीतीश कुमार और उनकी रणनीति पर बहस कर रहे हैं।
बहुत कम लोग होते हैं, जो अपने नाम के अनुसार काम करके जाने जाते हैं। नीतीश कुमार उन्हीं कम लोगों में से एक हैं। नाम नीतीश और काम नीतीज्ञ। वाह रे नीतीश कुमार। काजल की कोठरी से बेदाग निकलने की कला कोई आपसे सीखे।
मित्र बिक्रम प्रताप सिंह के फेसबुक वॉल से साभार
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