सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

जनवरी 31, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

क्‍योंकि दलित शब्‍द बिकता है

div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"> देश भर में यह बहस चल पड़ी है कि रोहित वेमुला दलित था या नहीं। सत्तापक्ष कह रहा है कि वह दलित नहीं था और विपक्ष उसके दलित होने पर अपना वीटो लगा रहा है। चिंता की बात तो यह है कि सामाजिक चिंतक, विश्लेषक और पत्रकार भी इस बहस का हिस्सा बन गए हैं। इस देश में किसी की मौत सनसनी नहीं है। सनसनी है उसका दलित होना या न होना। रोहित की आत्महत्या के बाद तो हमें अपने सिस्टम की खामियों को दुरुस्त करने को लेकर बहस छेड़नी चाहिए थी पर अफसोस! हम तो अभी इस जाल में फंसे हैं कि दलित मरा या गैरदलित। कोई नहीं कह रहा कि एक छात्र मरा, एक इंसान मरा, एक मां का बेटा मरा या फिर एक बहन का भाई मरा। इंसान होना, एक छात्र होना, एक मां का बेटा होना, एक बहन का भाई होना किसी के लिए मायने नहीं रखता। मायने रखता है उसका दलित होना या न होना। क्‍योंकि दलित शब्‍द बिकता है। ये किस तरह की मातमपुरसी है? चलो राजनीति करनी है, अपनी जमीन मजबूत करनी है या तलाश करनी है या खोई जमीन हासिल करनी है तो शौक से करो लेकिन इतना मत गिर जाओ। विपक्षी नेताओं को दलित ...