क्या आपने गौर किया है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जो भी टकराया, वो चूर-चूर हो गया. सबसे पहले भाजपा नेता संजय जोशी ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से लोहा लिया था और आज वे कहां हैं, शायद ही किसी को पता हो. बीजेपी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनने और प्रधानमंत्री बनने के बाद भी पार्टी के कई नेताओं ने नरेंद्र मोदी से टक्कर ली थी, उनका भी हश्र आप देख लीजिए. ऐसे नेताओं की फेहरिस्त लंबी है. चाहे यशवंत सिन्हा हों, शत्रुघ्न सिन्हा हों, अरुण शौरी या फिर नवजोत सिंह सिद्धू, जिसने भी नरेंद्र मोदी के वर्चस्व को चुनौती दी, वे आज राजनीतिक रूप से हाशिए पर हैं. ऐसा इसलिए है, क्योंकि पीएम नरेंद्र मोदी की कुंडली में शत्रुहंता योग बहुत प्रबल है. उनके सामने कोई विरोधी नहीं टिक सकता, भले ही वह कितना ही मजबूत क्यों न हो.
पिछले 6 साल में ऐसी 10 से अधिक घटनाएं हो चुकी हैं, जिसमें पीएम नरेंद्र मोदी का पुतला जलाने वाले खुद जल गए. कहने में यह भले ही अतिश्योक्ति लगेगी, लेकिन अगर ऐसी एक-दो घटनाएं होतीं तो यह सामान्य बात होती. कहने का मतलब यह है कि पीएम मोदी का पुतला इतना शक्तिशाली है तो फिर पीएम मोदी की तो बात ही छोड़ दीजिए.
पीएम नरेंद्र मोदी से सीधा लोहा लेने वाले सोनिया गांधी, राहुल गांधी, अखिलेश यादव, मायावती, महबूबा मुफ्ती, फारुक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला, नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव, उपेंद्र कुशवाहा जैसे नेताओं का आज की राजनीति में क्या हश्र हो गया है, बताने की जरूरत नहीं है. जब तक अरविंद केजरीवाल ने पीएम नरेंद्र मोदी का विरोध किया, तब तक वे दिल्ली के मुख्यमंत्री होते हुए भी राजनीति में स्थापित नहीं हो पाए थे. उन्हें किसी ने सलाह दी कि पीएम नरेंद्र मोदी पर सीधा अटैक न करो, उसके बाद से केजरीवाल की राजनीति बुलंदियों पर गई है और वे दिल्ली की अपनी गद्दी भी बरकरार रखने में कामयाब हो गए.
अब ममता बनर्जी को भी किसी ने यही सलाह दी है और वे इस सलाह पर अमल भी कर रही हैं. ममता बनर्जी का यही फैसला उनकी कुर्सी बचा ले जाए तो बहुत अचरज नहीं होना चाहिए. कुल मिलाकर गाली पीएम नरेंद्र मोदी का आहार है. आप मोदी को जितना गाली दोगे, उनका पौरुष और बढ़ता चला जाएगा. पीएम मोदी बहुत शक्तिशाली होने के बाद भी ओड़िशा के सीएम नवीन पटनायक का नुकसान नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि नवीन पटनायक ने कभी मोदी विरोध की राजनीति की ही नहीं.
आज कर्नाटक के पूर्व सीएम एचडी कुमारस्वामी को कांग्रेस से गठबंधन गलती महसूस हो रही है. कभी IRS रहे उदित राज़ मोदी के विरोध में खुद लतीफा बन गए और लतीफा रहे रामदास आठवले मोदी सरकार में मंत्री हैं. पीएम मोदी ने भले ही महबूबा मुफ्ती से गठबंधन किया पर पार्टी के एजेंडे को ऊपर रखते हुए उन्हें साल भर के लिए नज़रबन्द भी कर दिया. अब महबूबा मुफ्ती राजनीतिक रूप से नख-दंतविहीन हो गई हैं.
राजनीति में ही नहीं, अन्य क्षेत्रों में भी जिन्होंने पीएम मोदी का विरोध किया, वे पैदल हो गए. पहले शाहरुख खान और आमिर खान फिल्मों की सफलता की गारंटी माने जाते थे और अब इनकी फिल्में आने से पहले ही लोग फ्लॉप कराने के लिए तैयार बैठे हैं. सलमान खान बच गए, क्योंकि सलीम खान ने समय रहते मोदी के दरबार में हाजिरी लगा दी थी.
मीडिया की बात करें तो वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम, पुण्य प्रसून बाजपेयी, बरखा दत्त, अभिसार शर्मा, आशुतोष और प्रभु चावला जैसे नाम कभी भारतीय मीडिया की दशा-दिशा तय करते थे. आज इनकी हालत यूट्यूबर की हो गई है.
वरिष्ठ इतिहासकार इरफ़ान हबीब जैसे लोग मोदी विरोध के नाम पर कलम छोड़कर मंच पर राज्यपाल से धक्का-मुक्की करते हैं तो रोमिला थापर जैसों को जेएनयू वीसी के पास अपना CV जमा कराना पड़ रहा है.
स्वर्गीय अशोक सिंघल जी बोलकर गए थे कि पीएम नरेंद्र मोदी अवतारी पुरुष हैं. उन्होंने यह भी कहा था कि देश में 1000 साल बाद कोई हिन्दू सिंहासन पर विराजमान हुआ है.

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