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#Nitish #Laloo से और #sharad भयभीत थे #nitish से


इधर #Nitish महागठबंधन से पीछा छुड़ाकर एनडीए में जाने का बहाना तलाश रहे थे, उधर #Sharad Yadav यादव #Nitish से भयभीत होकर अलग रास्ता अख्तियार करने में जुटे थे। दोनों की अपनी वाजिब वजहें थीं। दरअसल शरद यादव को दूसरे जॉर्ज फर्नांडीस बन जाने का भय सता रहा था। खासकर पार्टी के अध्यक्ष पद से हटाए जाने के बाद से वे खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे थे। इधर नीतीश कुमार को भी लालू के साथ काम करने में उतना मजा नहीं आ रहा था। वे खुलकर उस तरह बैटिंग नहीं कर पा रहे थे, जिस तरह एनडीए के साथ रहकर वे किया करते थे।


नीतीश के साथ रहकर लालू प्रसाद यादव दिनोंदिन मजबूत होते जा रहे थे। हालांकि केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई और घेरेबंदी से उन पर शिकंजा कसता जा रहा था पर राजनीतिक रूप से इसका कोई नुकसान लालू प्रसाद को न होकर नीतीश कुमार को हो रहा था। उनका एमवाई (मुस्लिम+यादव) समीकरण फिर से मजबूत हो रहा था। मजाकिया अंदाज में लालू प्रसाद नीतीश कुमार पर तंज भी कस देते थे और उसे बाद में अपने हिसाब से संशोधित भी कर लेते थे। इससे वे अपने वोटरों को संदेश देने में कामयाब हो रहे थे और नीतीश की लगातार छीछालेदर हो रही थी। नीतीश के सुशासन पर लालू के कुशासन के दाग के छींटे पड़ते जा रहे थे। दूसरी ओर, लालू यादव ने नीतीश के विकल्प के रूप में अपने बेटे तेजस्वी को खड़ा करना शुरू कर दिया था। नीतीश को डर था कि अधिक दिनों तक राजद के साथ सरकार चलाई तो उनकी छवि को बड़ा धक्का पहुंचेगा और साथ ही तेजस्वी का चेहरा राजद के लिए बड़ा हथियार साबित होगा। इसलिए उन्होंने बहाने तलाशने शुरू कर दिए।

बताया तो यह भी जा रहा है कि नीतीश के इशारे पर ही केंद्र सरकार ने बेनामी संपत्ति कानून पास किया और निशाने पर लालू यादव आ ही गए। उनकी बेटी, दामाद, दोनों बेटों के नाम की तमाम संपत्ति सील हो गई। आयकर और प्रवर्तन निदेशालय की टीम ने पटना में घंटों लालू के परिवार के ठिकानों पर छापेमारी की और इसके साथ ही नीतीश कुमार को बहाने मिल गए। जद यू और राजद के दूसरी पंक्ति के नेताओं के बीच वाकयुद्ध शुरू हो गया। कभी बयानों के तीर तो कभी सुलह की कोशिश। आखिर नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद से पीछा छुड़ाया और अगले ही दिन एनडीए सरकार के मुखिया के रूप में शपथ भी ले ली। राजद नेताओं को शायद नीतीश के इस अप्रत्याशित कदम की अपेक्षा न थी, क्योंकि तब तक नीतीश एक कदम आगे और दो कदम पीछे की रणनीति पर काम कर रहे थे। ये शायद उनकी रणनीति का हिस्सा था।

इधर पटना में ये सब हो रहा था, उधर दिल्ली में अलग खिचड़ी पक रही थी। शरद यादव और अली अनवर ने नीतीश के इस कदम को विश्वासघात का नाम दिया और जनादेश के खिलाफ जाने का आरोप लगाया। यहां तक कि ये दोनों नेता नीतीश के शपथग्रहण कार्यक्रम में भी शामिल नहीं हो पाए। जानकार बताते हैं कि शरद यादव को भय सता रहा था कि नीतीश उन्हें दूसरा जॉर्ज फर्नांडीस न बना दें और वे नेपथ्य में न चले जाएं। इसलिए उन्होंने भी मौका देखकर नीतीश के खिलाफ बगावती सुर अख्तियार कर लिया। अध्यक्ष पद से हटाए जाने के बाद से ही वे मौके की तलाश में थे, क्योंकि एक समय अध्यक्ष पद पर रहे और अब उनकी एक न चल रही थी। जद यू मतलब नीतीश कुमार हो गया था। कभी शरद के नजदीकी रहे केसी त्यागी भी शरद कैंप छोड़ नीतीश कैंप में शामिल हो चुके थे। उधर नीतीश के झटके से परेशान लालू अलग-थलग महसूस कर रहे थे। इसलिए उन्होंने शरद पर डोरे डालने शुरू कर दिए। शरद यादव इतने डरे हुए थे कि मंत्री पद का लालच भी उन्हें नीतीश से दूर जाने से नहीं रोक सका। मोदी सरकार में उन्हें बड़ा मंत्रालय का ऑफर था पर कहीं वे दूसरे जॉर्ज न बन जाएं, इसलिए ऑफर ठुकरा दिया और लालू कैंप में चले गए।

जद यू के विरोध और चेतावनी के बाद भी उन्होंने भाजपा भगाओ देश बचाओ रैली में न केवल हिस्सा लिया, बल्कि नीतीश और मोदी सरकार के खिलाफ अपनी भड़ास भी निकाली। अब तकनीकी रूप से उनकी राज्यसभा की सदस्यता तो नहीं जाएगी पर पार्टी उनके खिलाफ बड़ी कार्रवाई कर सकती है। फिलहाल उन्हें इसी बात से संतोष होगा कि उन्हें अब कोई जॉर्ज फर्नांडीस या कांशीराम नहीं बना पाएगा। शायद राजनीति में वे खुद का निर्वासन नहीं चाहते और लालू प्रसाद यादव उन्हें निर्वासित होने भी नहीं देंगे। इसी बहाने उनके बेटे को भी राजनीति में एंट्री मिल जाएगी। 

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