आजकल देश में लाइन में लगने को लेकर बहस छिड़ी हुई है। दूसरी ओर, हमलोग तो संडास के लिए भी लाइन में लगने के तजुर्बेकार हैं। कब हम लाइन में नहीं लगे। जब से होश संभाला, तब से लाइन में खड़े लोगों को देखते रहे हैं। केरोसिन और चीनी के लिए लोग हर महीने लाइन में खड़े रहते हैं। सिनेमाहॉल की टिकट खिड़की पर ऐसा कौन होगा, जो अपना हाथ न छिलवाया होगा। रसोई गैस सिलेंडर के लिए किलोमीटर तक की लाइन भी हमने देखी है। सर्कस और मौत का कुआं की टिकट के लिए लाइन में लगे हैं हम। रेलवे रिजर्वेशन काउंटर और रोडवेज की टिकट खिड़की पर भी धक्का खाए हैं हमने। बैंक में पैसा जमा करते और निकालने के लिए भी सैकड़ों लोगों को लाइन में लगते देखा है। कोर्ट में पेशी के लिए भी लाइन होती है और आपके हमारे केसों की सुनवाई के लिए भी एक लाइन होती है। वोट देने के लिए सुबह से लगी लाइन शाम के निर्धारित समय तक भी खत्म नहीं होती। स्वास्थ्य केंद्र पर टीका लगवाने के लिए भी लाइन से होकर ही जाना होता है। परीक्षा फॉर्म भरने के लिए भी लाइन लगने की जरूरत होती है। डाक घर में पोस्टल ऑर्डर और बैंकों में डिमांड ड्राफ़ट के लिए भी लाइन ...