#आमचुनाव का साल है। एक को खोने का डर है तो दूसरे के लिए पाने की चुनौती है। दोनों का अपना अपना अंतर्द्वंद्व है, जिससे जूझते हुए जितना है। चुनाव से पहले कोई यह नहीं कह सकता कि किसका पलड़ा भारी है और किसका नहीं। अभी तो इस 'महाभारत' का 'पांचजन्य' फूंका जाना भी शेष है। शब्दबाण चलेंगे, जुबानें लड़खड़ाएंगी, फिसलेंगी, सवाली-जवाबी होगी, उड़नखटोला धूल उड़ाएंगी, पार्टियां रैली-रैली खेलेंगी, जनता समझेगी-बुझेगी। फिर फैसले की घड़ी आएगी। सांस धुकुर-धुकुर चलेगी। आघात लगेगा, प्रतिघात होगा। कोई राजा होगा और कोई रंक होगा। कोई सड़क पर तो कोई संसद में होगा। कोई मजलिस में होगा तो कोई मंत्री होगा। फिर चुनाव आएंगे, चुनौतियां भी आएंगी-जाएंगी।
सिर्फ चुनाव और चुनावी मुद्दे को लेकर ऐसा होता है, यह सच नहीं है। हां, राजनीति का कैनवास जरूर बडा हो गया है। तभी तो गैर राजनीतिक मुद्दा भी राजनीति का केंद्र बन जाता है। प्रश्न का औरा बढ़ गया है और उत्तर उतना ही सतही प्रतीत हो रहा है। देश में इस समय #kathua कांड, #Unnav कांड, #AMU कांड, #Collegium कांड, #Kaveriwater, पश्चिम बंगाल में #Panchayatchunav, बिहार में छेड़छाड़ कांड, उत्तर प्रदेश में प्राकृतिक कांड (मौसम के बिगड़े मिजाज से 73 मरे), दिल्ली में मुख्य सचिव पिटाई कांड, हिमाचल में #Solan कांड, पंजाब में सिद्धू कांड, हरियाणा में रेप कांड, राजस्थान में एससी दूल्हे को घोड़ी से उतारने का कांड, आसाराम कांड, गुजरात मे नारद कांड, त्रिपुरा में इंटरनेट कांड, नक्सल कांड, कश्मीर में आतंकी कांड, देवरिया और मुजफ्फरपुर कांड, शहरी नक्सली कांड जैसे मुद्दों पर तो भारी विमर्श होता है, लेकिन इन मुद्दों में चुनाव हराने या जिताने की काबिलियत नहीं है। चुनाव के समय ये मुद्दे अपनी आभा खो देते हैं और कोई सतही मुद्दा राजनीतिक खाल ओढ़कर धमाकेदार एंट्री पा जाता है। चुनाव में जनेऊ, टीका, कलावा, टोपी, मंदिर, मस्जिद, चर्च, हिन्दू, मुस्लिम, तलाक़, आरक्षण जैसे मुद्दे दोनों तरफ से उछाले जाते हैं। इनमे से किसी एक पर भी किसी ने मुंह की खाई तो मजाल है कि वो बाजी मार सके। चुकने का मतलब हारी हुई बाज़ी खेलना। ये मुद्दे इतने संवेदनशील होते हैं कि जनता एकदम से सबक सिखाने के मूड में आ जाती है।
ताज़ा मामला #SC/ST एक्ट को ही लें तो पार्टियों में होड़ मची थी कि हम उनके सबसे उन्नत किस्म का रहनुमा बनकर दिखाएं। सो उनके पक्ष में सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटकर रख दिया गया। अब सवर्णों ने इसके खिलाफ आवाज उठाई तो सबके चेहरे पर से हवाइयां उड़ने लगी हैं। अब सवर्णों की सहानुभूति पाने की होड़ मची है। रूठने-मनाने का सिलसिला चल पड़ा है। अच्छी बात यह है कि सवर्ण अब एकमुश्त वोट दिखने लगा है। नहीं तो इससे पहले पसेरी और मन के भाव से दलितों और मुसलमानों का ही वोट अंक जाता रहा है। वोट की मंडी में सवर्णों के भाव खुदरा मार्केट में भी नहीं लगते थे। सवर्णों के लिए बातें होने लगी हैं। सत्तारूढ़ दल दोराहे पर है तो विपक्षी दल सवर्णों को लुभाने की यथसम्भाव कोशिश कर रहे हैं। सवर्णों को शायद वो लकड़ी का गठ्ठर वाला किस्सा याद आ गया होगा।
#कर्नाटक में चुनाव की रणभेरी बजते ही #कांग्रेस अध्यक्ष #राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री #नरेंद्र मोदी को एक चुनौती दे डाली। #कर्नाटक के रण में कूदे #प्रधानमंत्री ने उस चुनौती को स्वीकार नहीं किया और बातों-बातों में #राहुल गांधी को अपनी तरफ से चुनौती पेश कर दी। #राहुल गांधी इसका कुछ जवाब देते, इससे पहले ही #कर्नाटक के मुख्यमंत्री #सिद्धरमैया ने #प्रधानमंत्री को एक अन्य चुनौती दे डाली। खास बात यह है कि यहां कोई चुनौती स्वीकार नहीं कर रहा, बल्कि एक-दूसरे से आगे बढ़कर सिर्फ चुनौती देने की होड़ लगी है। चुनौती का जवाब चुनौती है। सवाल के जवाब में सवाल हैं। उत्तर गायब हैं। आक्रामक दिखने की होड़ में जवाब देने या चुनौती स्वीकार करने में बाधाएं आ रही हैं। सवाल का जवाब देने को इस तरह दर्शाया जा रहा है कि जैसे सामने वाले की कोई कमजोर नस दब गई हो। यह नई तरह की राजनीति है।

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