सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

फ़रवरी 14, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

जो दिखा वो सच नहीं है!!!!

ऐसा बहुत कम होता है कि जो दिखता है, वो सच नहीं होता लेकिन ऐसा होता है, यह भी एक सच है। सच न हो तब भी सच मान लीजिए कि यह एक सच है। बैक गियर लगाते हुए हम फिर मालदा और पूर्णिया की घटना को याद करना चाहेंगे। उस घटना में जो दिखाया गया, वो सच नहीं था। रोहित वेमुला की मौत के पीछे के कारणों को अनुमानित रूप से सच मान लिया गया, जबकि देखा किसी ने नहीं था। यहां हम कह सकते हैं कि जो नहीं दिखता, वो सच होता है। अब आते हैं दृश्य माध्यमों से खेले जाने वाले खेल पर। एक चैनल ने दिखाया कि जेएनयू में अफजल की बरसी मनाई गई और उस दौरान राष्ट्रविरोधी नारे लगाए गए। अगले ही दिन ऐसे ही एक कार्यक्रम में दिल्ली प्रेस क्लब में देशविरोधी नारों को हवा दी गई। बवाल मचना लाजिमी था, क्योंकि यहां सरकार वर्सेज अन्य नहीं, देश वर्सेज गद्दारों का हिट शो चल रहा था। लिहाजा न चाहते हुए भी अन्य चैनलों को इसे फॉलो करना पड़ा। शतरंज में शह के बाद मात होता है लेकिन इस प्रकरण में मात के बाद शह का खेल खेला गया। बाकी चैनल मात खा गए लिहाजा उस न्यूज चैनल को सवालों के घेरे में लाने और गद्दारों को शह देने की भरसक कोशिश की...