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संदेश

तेजस्‍वी यादव का PK कौन? जिसने उड़ा दी है नीतीश कुमार की नींद

पीएम नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) और नीतीश कुमार (Nitish Kumar) जैसे दिग्‍गज राजनेताओं से लोहा लेते हुए राजद नेता और महागठबंधन से मुख्‍यमंत्री पद के दावेदार तेजस्‍वी यादव (Tejaswi Yadav) जिस तरह सधी हुई राजनीति कर रहे हैं, उससे लग रहा है कि उन्‍हें उनका PK मिल गया है. PK यानी प्रशांत किशोर (Prashant Kishor), जो पिछले चुनाव में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) की चुनावी रणनीति बना रहे थे. इस बार बिहार चुनाव से PK नदारद हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि तेजस्‍वी यादव का PK कौन है? कौन है जो चुनावी राजनीति की बिसात पर तेजस्‍वी से सधी हुई चाल चलने को कह रहा है. कहीं यह खुद PK तो नहीं, PK नहीं तो मनोज झा (Manoj Jha) तो नहीं. मनोज झा इसलिए कि तेजस्‍वी यादव मनोज झा का बहुत सम्‍मान करते हैं और तेजस्‍वी यादव ने जब 10 लाख नौकरियां देने की बात कही थी तो मनोज झा की उसमें प्रमुख भूमिका बताई जाती है. 10 लाख नौकरियां देने के वादे के साथ ही तेजस्‍वी यादव ने रोजगार को बिहार में चुनाव का प्रमुख मुद्दा बना दिया है, जिस पर NDA के नेता बगलें झांकने को मजबूर हो रहे हैं. बिहार चुनाव में पीए...

बिहार के CM तो नीतीश कुमार ही होंगे!

1995 में जॉर्ज फर्नांडिस और नीतीश की समता पार्टी चुनाव लड़ती हैऔर लगभग पूरा सफाया हो जाता है . फिर भाजपा से गठबंधन करते हैं और सीनियर पार्टनर और मुख्यमंत्री के दावेदार बनते हैं. नीतीश की जदयू 2014 का लोकसभा चुनाव अकेले लड़ती है. पूरी तरह खारिज हो जाती है. फिर लालू से गंठबंधन करते हैं. सीनियर पार्टनर और मुख्यमंत्री पद के दावेदार बनते हैं. महागठबंधन में सरकार चलाने से उनकी छवि पर छींटें पड़ते हैं और वे इन छींटों से बचने के लिए धुर विरोधी नरेंद्र मोदी की भाजपा की गोद में जा बैठते हैं. बिहार में चुनाव की दो धुरी भाजपा और लालू ही हैं लेकिन सरदार नीतीश बनते हैं. बिना जनाधार वाला सरदार. लोग रामविलास को मौकापरस्ती से जोड़ते हैं. सफल मौकपरस्ती के लिए दो बातों का होना जरूरी है. समय देखकर आप किसी से भी जुड़ जायें और आपको हर कोई खुद से जोड़ ले. नीतीश समय-समय पर सबसे जुड़े और समय-समय पर हर कोई उन्हें खुद से जोड़ने को तैयार रहता है लेकिन उन पर मौकापरस्त का टैग नहीं लगा. इसे घाघ राजनीतिज्ञ होना कहते हैं. बिना जनाधार वाला घाघ सरदार. बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Election 2020) में बीजेपी और रा...

चिंता जताने के साथ संयुक्‍त राष्‍ट्र को चेतावनी दे रहे थे पीएम नरेंद्र मोदी

'भारत के लोग संयुक्त राष्ट्र (United Nations) के रिफॉर्म्स को लेकर लंबे समय से इंतजार कर रहे हैं. आज भारत के लोग चिंतित हैं कि क्या यह प्रोसेस लॉजिकल एंड पर पहुंच पाएगा. आखिर कब तक भारत को संयुक्त राष्ट्र के डिसिजन मेकिंग स्ट्रक्चर (Decision Making Structure) से अलग रखा जाएगा? एक ऐसा देश जो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहां विश्व की 18% से ज्यादा जनसंख्या रहती है, जहां सैकड़ों भाषाएं हैं, सैकड़ों बोलियां हैं, अनेकों पंथ हैं, अनेकों विचारधाराएं हैं. जिस देश ने सैकड़ों वर्षों तक वैश्विक अर्थव्यवस्था (Global Economy) का नेतृत्व करने और सैकड़ों वर्षों तक गुलामी दोनों को झेला है.' प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) 26 सितंबर की शाम को (भारतीय समयानुसार) जब संयुक्‍त राष्‍ट्र की जनरल एसेंबली (UNGA) को संबोधित कर रहे थे, तो उनकी मुद्रा अलग थी. वो संयुक्‍त राष्‍ट्र के रिफॉर्म्‍स (United Nation Reforms) को लेकर गुहार नहीं कर रहे थे, बल्‍कि चेतावनी दे रहे थे. वैसे इंटरनेशनल प्‍लेटफॉर्म पर पीएम नरेंद्र मोदी (PM Modi) कभी गुहार की मुद्रा में नहीं रहते. वह खुद ही कहते हैं, न ह...

महागठबंधन की बलि बेदी पर कुर्बान होगी कांग्रेस

महागठबंधन तो होगा, चाहे कुर्बानी किसी को देनी पड़े। फिलहाल कुर्बानी कांग्रेस को ही देनी होगी, क्योंकि क्षेत्रीय दल अपने हिस्से में से शायद ही कटौती करें। महागठबंधन की सबसे ज्यादा जरूरत भी कांग्रेस को ही है। उस दल का, जिसका कभी जम्मू कश्मीर से लेकर तमिलनाडु और गुजरात से लेकर मिजोरम तक एकाधिकार हुआ करता था, वह अब पंजाब और पुड्डुचेरी तक सिमट कर रह गई है। यही उसकी छटपटाहट है और यही सबसे बड़ी कमजोरी। यही कारण है कि सभी क्षेत्रीय दल उसे आंख दिखा रहे हैं। कांग्रेस किसी तरह 2019 का चुनाव जीतना चाहेगी, क्योंकि यह राहुल गांधी के लिए बतौर अध्यक्ष पहला आम चुनाव होगा और जीत ही उन्हें स्थापित करेगी। हालांकि हार से उनकी अध्यक्षी को आंच नहीं आएगी पर संभव है कि पंजाब जैसे राज्य की सत्ता भी हाथ से निकल जाए। कांग्रेस की एक छटपटाहट यह भी है कि मोदी सरकार में उसे सम्मानित विपक्ष का भी दर्जा हासिल नहीं हुआ। इसलिए कांग्रेस को महागठबंधन का जहर कबूल होगा, पर मोदी शासन का हलाहल कदापि मंजूर नहीं। कांग्रेस जानती है कि मोदी सरकार का बने रहना उसके अस्तित्व के लिए बहुत बड़ा खतरा है, इसलिए वह कोई भी जोखिम उठाने को तैय...

इलेक्शन मोड में

यूं तो अपना देश चौथे साल के बजट से ही चुनावी मोड में आ जाता है। चौथे साल में सरकारें चुनाव को ध्यान में रखकर बजट में लोकलुभावन घोषणाएं करती हैं, ताकि पिछले कुछ वर्षों की जनता की नाराजगी दूर की जा सके, लेकिन इस साल बजट में ऐसा कुछ नहीं हुआ, जिसके आधार पर यह बात कही जाए। हां, आयुष्मान भारत की घोषणा जरूर हुई पर ऐसा नहीं लगता कि यह योजना इस चुनाव में अपनी कोई खास भूमिका अदा कर पायेगी, क्योंकि लोगों तक इसका लाभ पहुंचने से पहले चुनाव का परिणाम आ चुका होगा। एमएसपी को लेकर सरकार ने कुछ कदम जरूर उठाये, लेकिन यह पहले से घोषित था। अब इसे सरकार का आत्मविश्वास माना जाए या फिर इसे ढीठ सरकार कहा जाए। बजट में इलेक्शन मोड भले न दिखा हो, पर अब देश पूरी तरह इसके लिए तैयार दिख रहा है। पार्टियों की गहमागहमी, उनकी तैयारी और बयानबाजी बता रही है कि वे चुनाव के लिए कमर कस चुके हैं। बस बिगुल फूंकने की देर है और वे एक-दूसरे पर टूट पड़ेंगे। निकल पड़ेंगे जनता को हथियाने, रिझाने और बरगलाने के लिए। विपक्षी हिसाब मांग रहे हैं तो सत्ताधारी दावे कर रहे हैं। पिछले चुनाव में जो दावे कर रहे थे, वे अब वादे कर रहे हैं औ...

चुनाव और चुनौतियां

#आमचुनाव का साल है। एक को खोने का डर है तो दूसरे के लिए पाने की चुनौती है। दोनों का अपना अपना अंतर्द्वंद्व है, जिससे जूझते हुए जितना है। चुनाव से पहले कोई यह नहीं कह सकता कि किसका पलड़ा भारी है और किसका नहीं। अभी तो इस 'महाभारत' का 'पांचजन्य' फूंका जाना भी शेष है। शब्दबाण चलेंगे, जुबानें लड़खड़ाएंगी, फिसलेंगी, सवाली-जवाबी होगी, उड़नखटोला धूल उड़ाएंगी, पार्टियां रैली-रैली खेलेंगी, जनता समझेगी-बुझेगी। फिर फैसले की घड़ी आएगी। सांस धुकुर-धुकुर चलेगी। आघात लगेगा, प्रतिघात होगा। कोई राजा होगा और कोई रंक होगा। कोई सड़क पर तो कोई संसद में होगा। कोई मजलिस में होगा तो कोई मंत्री होगा। फिर चुनाव आएंगे, चुनौतियां भी आएंगी-जाएंगी। सिर्फ चुनाव और चुनावी मुद्दे को लेकर ऐसा होता है, यह सच नहीं है। हां, राजनीति का कैनवास जरूर बडा हो गया है। तभी तो गैर राजनीतिक मुद्दा भी राजनीति का केंद्र बन जाता है। प्रश्न का औरा बढ़ गया है और उत्तर उतना ही सतही प्रतीत हो रहा है। देश में इस समय #kathua कांड, #Unnav कांड, #AMU कांड, #Collegium कांड, #Kaveriwater, पश्चिम बंगाल में #Panchayatchunav, बिहार ...

चार 'पी' से देश में आ गया है भूचाल

वैसे तो अपने देश में किसी भी बात पर भूचाल आ जाता है। हालिया घटनाक्रम को देखें तो एक पकौड़ा भी देश मे भूचाल लाने के लिए काफी है। मुद्दों की दरिद्रगी और चर्चा में बने रहने की छटपटाहट ने विपक्षियों को पकौड़े पर सियासत करने को मजबूर कर दिया है। दूसरी ओर, बजट के बाद लगातार लुढ़कते और फिर संभलते बाजार को पंजाब नेशनल बैंक घोटाले से बड़ा झटका लगा है। इन सबके बीच अब तक अनाम-गुमनाम दक्षिण भारतीय अभिनेत्री प्रिया अचानक अपनी आंखों के करामात से नई सनसनी बनकर उभरती हैं और हर भारतीयों के मोबाइल में ठौर बना लेती हैं। कुल मिलाकर चार 'पी' ने यहां तहलका मचा रखा है: पद्मावत, पकौड़ा, प्रिया और पंजाब नेशनल बैंक। सबसे पहले बात करते हैं पद्मावत की। कुछ दिनों पहले तक पद्मावत ने देश की राजनीति को हिलाकर रख दिया था। संजय लीला भंसाली की इस फिल्म (पहले पद्मावती और बाद में पद्मावत) ने उत्तर और मध्य भारत के लगभग सभी राज्यों की राजनीति को प्रभावित करके रख दिया। हिंसक आंदोलन हुए और सुप्रीम कोर्ट तक को इसमें दखल देना पड़ा था। उसके बाद भी कई राज्यों में शुरुआती दौर में फ़िल्म का प्रदर्शन नहीं हो सका। कुछ राज्य...