यूं तो अपना देश चौथे साल के बजट से ही चुनावी मोड में आ जाता है। चौथे साल में सरकारें चुनाव को ध्यान में रखकर बजट में लोकलुभावन घोषणाएं करती हैं, ताकि पिछले कुछ वर्षों की जनता की नाराजगी दूर की जा सके, लेकिन इस साल बजट में ऐसा कुछ नहीं हुआ, जिसके आधार पर यह बात कही जाए। हां, आयुष्मान भारत की घोषणा जरूर हुई पर ऐसा नहीं लगता कि यह योजना इस चुनाव में अपनी कोई खास भूमिका अदा कर पायेगी, क्योंकि लोगों तक इसका लाभ पहुंचने से पहले चुनाव का परिणाम आ चुका होगा। एमएसपी को लेकर सरकार ने कुछ कदम जरूर उठाये, लेकिन यह पहले से घोषित था। अब इसे सरकार का आत्मविश्वास माना जाए या फिर इसे ढीठ सरकार कहा जाए। बजट में इलेक्शन मोड भले न दिखा हो, पर अब देश पूरी तरह इसके लिए तैयार दिख रहा है। पार्टियों की गहमागहमी, उनकी तैयारी और बयानबाजी बता रही है कि वे चुनाव के लिए कमर कस चुके हैं। बस बिगुल फूंकने की देर है और वे एक-दूसरे पर टूट पड़ेंगे। निकल पड़ेंगे जनता को हथियाने, रिझाने और बरगलाने के लिए। विपक्षी हिसाब मांग रहे हैं तो सत्ताधारी दावे कर रहे हैं। पिछले चुनाव में जो दावे कर रहे थे, वे अब वादे कर रहे हैं औ...