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क्या जमाना आ गया

क्या जमाना आ गया अपने पराये हो गए। और पराया अपना हो गया क्या जमाना आ गया।। अगस्त में ही लैंड वेस्ट हो गया भगत सिंह आतंकवादी और कन्हैया भगत सिंह हो गया क्या जमाना आ गया।। लोकतंत्र की हत्या की जिसने वही लोकतंत्र बचाने सड़क पर आये विपक्ष की कुर्सी सुहाती नहीं जिसे सत्तापक्ष होश में आओ नारे लेकर आये क्या जमाना आ गया।। इटली में है मायका पर मायके पर विश्वास नहीं यहाँ मायके का कुत्ता भी अच्छा लागे पर ये तो मायके वालों पर कीचड़ उछाल रहीं क्या जमाना आ गया।। बंगाल में वाम मध्य साथ में केरल में एक दूसरे के खिलाफ में संसद, जेएनयू में एक दूसरे की गोद में और जंतर मंतर पर विरोध में क्या जमाना आ गया।। चारा चोर के साथ सब मिल बैठ गए मिनी पाकिस्तान बताने वाले नेता हो गए शराब पर लिखकर हरिवंश जी बच्चन हो गए और शराब बंद कर नीतीश कुमार जननेता हो गए क्या जमाना आ गया।। तब चारा ही घोटाला था वाटरगेट भी बौना था जब से आया 2जी, कोयला घोटालों का सरदार बन गया क्या जमाना आ गया।। आप वाले चले सिस्टम सुधारने जो खुद भी ना कभी सुधरे थे सत्ता पाते ही सब आम से खास जरूर बन गए सर्वाध...

अपने अपने #Ambedkar

ये #Ambedkar के रूप हैं या उनकी प्र‍तीक के टुकड़े। सबके अपने दावे और दलीलें हैं, सबके पास तर्क-कुतर्क है, सबके पास इतिहास की अपनी तरह की व्‍याख्‍या भी है। अच्‍छी बात यह है कि देश के कायदे-कानून बनाने वाले के प्रति सम्‍मान है और उस प्रतीक को हथियाने की होड़ है पर गलत यह है कि अंबेडकर को टुकड़ों में बांटा जा रहा है, जबकि वे एक समग्र हैं। अंबेडकर साहब कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, कम्‍युनिस्‍ट पार्टियां और अन्‍य क्षेत्रीय दलों के लिए एक साथ मुफीद कैसे हो सकते हैं। उनकी समग्रता का आलम तो देखिए कि कल पैदा हुईं और नए जमाने की राजनीति का दावा करने वाली पार्टियां भी उन्‍हें अपना बता रही हैं। सभी पार्टियों का आजकल एक ही नारा है- अंबेडकर हमारे, बाकी सब तुम्‍हारे। इस बार भारत रत्‍न बोधिसत्‍व बाबा साहब डा भीमराव अंबेडकर साहब की जयंती कुछ खास रही। सभी पार्टियों को स्‍थानीय स्‍तर तक जाकर बाबा साहब के जन्‍मदिवस पर कार्यक्रमों का आयोजन करना पड़ा। ये सब अचानक नहीं हुआ। पिछले एक साल से इस पर कवायद चल रही थी। दरअसल, सत्‍ता में आने के बाद जिस तरह भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी की सरकार ने हांस...

मैं शराब हूं

शबाब पर कोई प्रतिबंध नहीं है, कबाब पर कोई मनाही नहीं है लेकिन मुझसे सभी को नफरत रहती है। जबकि मेरे नाम कई विशिष्‍ट टाइप के तमगे जुड़े हैं। देवताओं की महफिल में भी परोसा गया मैं और राक्षसों की भोज में भी पर बदनाम ही रहा हूं मैं। अमृत पिलाने के बदले भगवान विष्‍णु ने मोहिनी रूप धारण कर मुझे उनके हलक में उतार दिया। व्‍हाइट हाउस की पार्टी की शान हूं मैं पर बिहार, गुजरात जैसे राज्‍यों के लिए बेकार हूं मैं। कैसे अपनी बदतमीजी मेरे ऊपर मढ़ दी जाती है और मैं कुछ कुछ नहीं कर पाता। मुझ पर लिखी कविता मधुशाला बन जाती है और मैं...। क्‍या करूं मैं?  व्‍हाइट हाउस, क्रेमलिन और 10 डाउनिंग स्‍ट्रीट की दावत मेरे बिना अधूरी रहती है और इस देश के लोगों की नादानी तो देखो, मुझ पर प्रतिबंध लगाने की होड़ सी मची है। हरिवंश राय बच्‍चन साहब ने लिखा है - 'बैर कराते मंदिर मसजिद, मेल कराती मधुशाला' । अगर मैं इतना ही बुरा हूं तो इतने बड़े कवि और साहित्‍यकार ने मेरे बारे में इतनी ऊंची सोच कैसे रखी? गुजरात में मैं पहले से बैन हूँ और अब उसी लीक पर चलते हुए सुशासन बाबू नीतीश कुमार ने भी वहीं काम किया है। बं...

नारंग! तुम "खलनायक" ही रह गए

नारंग और जेजे जैसे नाम किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं। दोनों नाम बॉलीवुडिया खलनायकी के पर्याय रहे हैं। समय बदला, चरित्र बदला। आज नारंग मात्र कुछ ही लोगों के लिए हीरो बन पाया। जेजे के उन्‍मादियों ने नारंग को सिर्फ इसलिए दुनिया से रुखसत कर दिया कि वह बांगलादेश पर भारत की विजय के उल्‍लास को पचा नहीं पाया था। अपराध तो उसका संगीन था, इसमें कोई दो राय नहीं। नादानी में नारंग खुद ही अपनी जान का दुश्‍मन बन गया। उसका यही एकमात्र अपराध भी नहीं था। उसका सबसे बड़ा अपराध तो यह था कि उसके नाम के आगे न कोई दलित उपनाम था और न ही मुसलिम। सो हो गया बेचारे का खेल खत्‍म। अगर वह दलित और मुसलमान होता तो लालबत्‍ती गाडि़यों का रेला उसके घर के आगे लाइन लगा रहे होते। तमाम पुरस्‍कारों की मां बहन हो गई होती अब तक। कई लोग देश से यह कहकर कि निकल जाते कि यहां कोई सुरक्षित नहीं है। पर अफसोस, वह इन किसी मानकों को पूरा नहीं करता था। नारंग बॉलीवुडिया खलनायकी से चरित्र अभिनेता के रोल में आ चुका था। जिन्‍दाल, बख्‍तावर, जोजो, मोगैंबो, डा डैंग, तात्‍या से अलग नारंग देशभक्ति दिखा रहा था। अब जनमानस तो नारंग को खलनायक ही...

छिछोर है कन्‍हैया

कन्‍हैया छिछोर है, बदतमीज है, आवारा है लेकिन कुछ लोग मजबूर हैं कन्‍हैया की तारीफ करने के लिए। क्‍या करें बेचारे, सामने कोई बड़ा चेहरा ही नहीं है। नीतीश कुमार जीत जाते हैं तो उनमें अपना चेहरा देखने की कोशिश, ममता जीत जाएंगी तो उनमें एक चेहरा ढूंढने की कोशिश, केजरीवाल एक चलता-फिरता चेहरा हैं ही, रोहित वेमुला भी चेहरा हो जाते हैं। कन्‍हैया और उमर खालिद भी एक विकल्‍प हैं या फिर विकल्‍पहीनता के मारे हुए लोगों का चेहरा हैं। दूसरी ओर, स्‍वमेव राहुल गांधी पापड़ की तरह सतह पर हैं ही, जिनके इर्द गिर्द हमेशा बरी थोपने की कोशिश की जाती है। जब जो लोग सफल हो जाते हैं, वे राहुल गांधी और बाकियों को वैसे ही कोसते रहते हैं, जैसे अरविंद केजरीवाल। जो लोग सफल नहीं हो पाते, वे राहुल गांधी में ही अपना चेहरा ढूंढते रहते हैं। विकल्‍पहीनता के मारे लोगों को क्‍या कहें, जिस आवारा कन्‍हैया को पेशाब करने का सऊर नहीं है उसे राष्‍टृीय राजनीति के परिप्रेक्ष्‍य में खड़ा करने की कोशिश करते हैं। दिल्‍ली विवि की एक असिस्‍टेंट प्रोफेसर ने खुलासा किया है कि जेएनयू कैंपस में कन्‍हैया बेतरतीब तरीके से पेशाब कर रहा था। ...

कन्हैया जेलगमनम्

द्वापर युग में कन्हैया के पापा जेल गए थे। तब कंस का राज था। अब कलयुग में स्वयं 'कन्हैया' को ये दिन देखना पड़ रहा है। अभी यहाँ मोदीराज है। तब स्थितियां अलग थीं और अब के हालात अलग। नाम का लोचा फंस रहा है। कन्‍हैया यहां कथित तौर पर खलनायक है पर समय बीतने के साथ उसकी खलनायकी संजय दत्‍त की तरह निखरकर नायक वाली बन रही है। काफी अंतर्विराेध है। सब कुछ द्वापर युग की तरह तय नहीं है, जैसा कि हम ग्रंथों और टीवी चैनलों के माध्‍यम से जान पाए हैं। वर्षों बाद जब इस समय का इतिहास लिखा जाएगा तो लोगों के विचारों में मोदी और कन्‍हैया को लेकर वो साम्‍य नजर नहीं आएगा। नौ फरवरी की रात ऐतिहासिक हो गई है। उस रात के अंधेरे से एक चिराग पैदा हुआ है। उस चिराग की चकाचौंध विचित्र है। उसकी विचित्रता आधा गिलास खाली और आधा भरा हुआ टाइप है। हाल में बनी उसकी छवि सर्वस्‍वीकार्य नहीं है। अब तक यह तय नहीं हो पाया है कि उसका उभार प्राकृत्रिक है या कृत्रिम। उभार के बाद का उभार तो कृत्रिम है यानी मीडिया की माइकें और लाइट, कैमरा और एक्‍शन फेयर एंड लवली टाइप हैं। हाल में एक नेता ने संसद में फेयर एंड लवली का जोर शोर ...

जो दिखा वो सच नहीं है!!!!

ऐसा बहुत कम होता है कि जो दिखता है, वो सच नहीं होता लेकिन ऐसा होता है, यह भी एक सच है। सच न हो तब भी सच मान लीजिए कि यह एक सच है। बैक गियर लगाते हुए हम फिर मालदा और पूर्णिया की घटना को याद करना चाहेंगे। उस घटना में जो दिखाया गया, वो सच नहीं था। रोहित वेमुला की मौत के पीछे के कारणों को अनुमानित रूप से सच मान लिया गया, जबकि देखा किसी ने नहीं था। यहां हम कह सकते हैं कि जो नहीं दिखता, वो सच होता है। अब आते हैं दृश्य माध्यमों से खेले जाने वाले खेल पर। एक चैनल ने दिखाया कि जेएनयू में अफजल की बरसी मनाई गई और उस दौरान राष्ट्रविरोधी नारे लगाए गए। अगले ही दिन ऐसे ही एक कार्यक्रम में दिल्ली प्रेस क्लब में देशविरोधी नारों को हवा दी गई। बवाल मचना लाजिमी था, क्योंकि यहां सरकार वर्सेज अन्य नहीं, देश वर्सेज गद्दारों का हिट शो चल रहा था। लिहाजा न चाहते हुए भी अन्य चैनलों को इसे फॉलो करना पड़ा। शतरंज में शह के बाद मात होता है लेकिन इस प्रकरण में मात के बाद शह का खेल खेला गया। बाकी चैनल मात खा गए लिहाजा उस न्यूज चैनल को सवालों के घेरे में लाने और गद्दारों को शह देने की भरसक कोशिश की...