ये #Ambedkar के रूप हैं या उनकी प्रतीक के टुकड़े। सबके अपने दावे और दलीलें हैं, सबके पास तर्क-कुतर्क है, सबके पास इतिहास की अपनी तरह की व्याख्या भी है। अच्छी बात यह है कि देश के कायदे-कानून बनाने वाले के प्रति सम्मान है और उस प्रतीक को हथियाने की होड़ है पर गलत यह है कि अंबेडकर को टुकड़ों में बांटा जा रहा है, जबकि वे एक समग्र हैं। अंबेडकर साहब कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टियां और अन्य क्षेत्रीय दलों के लिए एक साथ मुफीद कैसे हो सकते हैं। उनकी समग्रता का आलम तो देखिए कि कल पैदा हुईं और नए जमाने की राजनीति का दावा करने वाली पार्टियां भी उन्हें अपना बता रही हैं। सभी पार्टियों का आजकल एक ही नारा है- अंबेडकर हमारे, बाकी सब तुम्हारे।
इस बार भारत रत्न बोधिसत्व बाबा साहब डा भीमराव अंबेडकर साहब की जयंती कुछ खास रही। सभी पार्टियों को स्थानीय स्तर तक जाकर बाबा साहब के जन्मदिवस पर कार्यक्रमों का आयोजन करना पड़ा। ये सब अचानक नहीं हुआ। पिछले एक साल से इस पर कवायद चल रही थी। दरअसल, सत्ता में आने के बाद जिस तरह भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी की सरकार ने हांसिए पर छोड़ दिए गए प्रतीकों को हथियाना शुरू किया है, उससे विपक्षी दलों में एक डर का भाव था कि कहीं सरकार अंबेडकर साहब को भी प्रतीकात्मक रूप से अपने पाले में न कर ले। इसलिए बड़ी से बड़ी, पुरानी से पुरानी और छोटी से छोटी पार्टियों को भी मजबूरन अंबेडकर साहब की जयंती पर खासी सक्रियता दिखानी पड़ी। केंद्र सरकार के दबाव में इस बार संयुक्त राष्ट्र संघ को भी बाबा साहब का जन्मदिवस मनाने के लिए बाध्य होना पड़ा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे बढ़ती ताकत के रूप में भारत की स्वीकार्यता के रूप में देखा जा रहा है। मुख्य विपक्षी दलों के प्रवक्ता टीवी पर यह दलील दे रहे थे कि अगर अंबेडकर कांग्रेसी नहीं होते तो उन्हें संविधान सभा की ड्राफि़टग कमेटी का मेंबर क्यों बनाया जाता। अब कांग्रेस तो कांग्रेस ही ठहरी। उसके नेताओं को लगता है कि कांग्रेस से अंबेडकर की पहचान है। देश की सबसे पुरानी पार्टी का हश्र देखकर भी प्रवक्ता और नेता नहीं चेत रहे हैं तो क्या कहा जाए।
सबसे बड़ी पार्टी के बाद बात करते हैं नईनवेली पार्टी का। इस पार्टी के सर्वेसर्वा अरविंद केजरीवाल का कहना है कि मोदी जी, आप अपने पास सावरकर रखिए और अंबेडकर को हमारा रहने दीजिए। नए जमाने की राजनीति करने वाले घिसी-पिटी कांग्रेस की भाषा बोल रहे हैं। अंबेडकर साहब के रूतबे से किसे इनकार है पर इसका मतलब यह तो नहीं कि बाकी सभी को छोड़ दिया जाए। नईनवेली पार्टी का जिक्र कर रहे हैं तो ओवैसी साहब की पार्टी की गतिविधियां भी तो परखनी होंगी। उत्तर प्रदेश के अधिकांश जिलों में आेवैसी साहब की पार्टी ने अंबेडकर साहब का जन्मदिवस धूमधाम से मनाया। जरा जरा सी बात पर इस्लाम पर खतरा बताने वाले आेवैसी साहब बताएं कि कैसे अंबेडकर साहब के चित्र पर माल्यार्पण कर उनका जन्मदिवस मनाया गया। राजनीति जो न कराए, कम है। राजनीति ही है कि समाजवादी भी इस बार अंबेडकर साहब के जन्मदिवस मनाने निकले।
खुद को दलित राजनीति की पुरोधा साबित करने वाली बसपा प्रमुख मायावती ने तो अंबेडकर जयंती पर हमेशा की तरह बाकायदा लखनऊ में रैली की और केंद्र सरकार के अलावा कांग्रेस पर भी हमला बोला। अपनी सरकार के दौरान ऊंचे आसन, चरणों में अफसरों को स्थापित करने वाली, कथित रूप से दलितों की सरकार में बाबू लाल मरांडी, नसीमुद़दीन सिददीकी, सतीश मिश्रा, यादव सिंह पर मेहरबान रहने वाली मायावती खुद को दलित राजनीति में पहले पायदान पर स्थापित कर चुकी हैं। दुनिया जानती है कि तीन-चार बार की उनकी सरकार के बाद भी आम दलितों के हालात में बहुत अधिक परिवर्तन नहीं हुए। शायद दलित भी उनकी कार्यशैली को समझ गए, इसलिए तो लोकसभा चुनाव में उन्हें निल बटे सन्नाटा से नवाज दिया। हालात यह हैं कि लोकसभा में छींक मारने के लिए भी उनका एक सांसद नहीं है।
अब बात करते हैं उस पार्टी की, जिसके चलते इन पार्टियों को मजबूरन अंबेडकर साहब की जयंती इतने बड़े पैमाने पर मनाने के लिए बाध्य होना पड़ा। कम से कम इस काम के लिए केंद्र सरकार बधाई की पात्र है। जी हां, केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह प्रतीकों को हड़पना शुरू किया है, उससे बाकी पार्टियां स्तब्ध हैं। नेहरू कैबिनेट में दूसरे नंबर के मंत्री रहे वल्लब भाई पटेल अब कांग्रेसी नहीं रहे। मोदी सरकार ने उनका भाजपाकरण कर दिया है। जगजीवन राम पर केंद्र सरकार ने नोएडा में बड़ा कार्यक्रम आयोजित कर बड़ा संदेश देने की कोशिश की। जयप्रकाश नारायण को लेकर भी उसी तरह की कवायद हुई। और अब अंबेडकर साहब....। 80 के दशक में भारतीय जनता पार्टी ने बाबा साहब को हिन्दू विरोधी बताया था और अब वे उसी पार्टी के सबसे बड़े आदर्श हो गए हैं।
दोष एक पार्टी का नहीं है। समय के साथ सबके भाव और विचार बदले हैं या बदल रहे हैं। हालांकि ये कहना भी गलत नहीं होगा कि दोष अंबेडकर साहब का ही है कि उनका व्यक्तित्व इतना विशाल और समावेशी हो गया कि सभी पार्टियां उनमें एडजस्ट करती जा रही हैं। सीमांत लोगों तक सरकार की व्यवस्था पहुंचे, इसके लिए उन्होंने संविधान में पर्याप्त व्यवस्थाएं कीं। वंचित वर्ग को शिक्षा, समानता और स्वतंत्रता मिले, इसके लिए वे हमेशा से संघर्षरत रहे। फिलहाल सबके अपने अपने अंबेडकर हैं पर अंबेडकर के लिए सभी अपने हैं। करनी से न सही, कथनी से ही अंबेडकर को इतनी विशालता देने के लिए कम से कम राजनीतिक दलों का तो देश आभारी हो ही गया है। इतने व्यापक पैमाने पर अंबेडकर साहब कभी सामयिक नहीं रहे। बैनर अलग थे पर कार्यक्रम एक सा था और कार्यक्रमों का उद़देश्य भी समान थे। ये तो आपको भी मानना पड़ेगा कि हमारे राजनीतिक दलों के उ़ददेश्यों में इतनी समानता कैसे आई। हालांकि ये नई बात नहीं है पर इस पर चर्चा तो की ही जा सकती है।

अम्बेडकर होते तो अपनी खींचतान पर रोते। अच्छा लिखा है आपने।
जवाब देंहटाएंअम्बेडकर होते तो अपनी खींचतान पर रोते। अच्छा लिखा है आपने।
जवाब देंहटाएंअंबेडकर की विरासत पर सियासत शुरू हो गई। जय भीम कहने वाले लोगों को शायद पता हो कि बाबा साहब ने हिन्दू धर्म नहीं बदला। खुद को उनका पैरोकार बताने वाले अपने ही धर्म से गद्दारी करने में लगे है।।
जवाब देंहटाएंभाई साहब अच्छे विचार