सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

मैं शराब हूं



शबाब पर कोई प्रतिबंध नहीं है, कबाब पर कोई मनाही नहीं है लेकिन मुझसे सभी को नफरत रहती है। जबकि मेरे नाम कई विशिष्‍ट टाइप के तमगे जुड़े हैं। देवताओं की महफिल में भी परोसा गया मैं और राक्षसों की भोज में भी पर बदनाम ही रहा हूं मैं। अमृत पिलाने के बदले भगवान विष्‍णु ने मोहिनी रूप धारण कर मुझे उनके हलक में उतार दिया। व्‍हाइट हाउस की पार्टी की शान हूं मैं पर बिहार, गुजरात जैसे राज्‍यों के लिए बेकार हूं मैं। कैसे अपनी बदतमीजी मेरे ऊपर मढ़ दी जाती है और मैं कुछ कुछ नहीं कर पाता। मुझ पर लिखी कविता मधुशाला बन जाती है और मैं...। क्‍या करूं मैं?  व्‍हाइट हाउस, क्रेमलिन और 10 डाउनिंग स्‍ट्रीट की दावत मेरे बिना अधूरी रहती है और इस देश के लोगों की नादानी तो देखो, मुझ पर प्रतिबंध लगाने की होड़ सी मची है।

हरिवंश राय बच्‍चन साहब ने लिखा है - 'बैर कराते मंदिर मसजिद, मेल कराती मधुशाला' । अगर मैं इतना ही बुरा हूं तो इतने बड़े कवि और साहित्‍यकार ने मेरे बारे में इतनी ऊंची सोच कैसे रखी? गुजरात में मैं पहले से बैन हूँ और अब उसी लीक पर चलते हुए सुशासन बाबू नीतीश कुमार ने भी वहीं काम किया है। बंद बोतल में रहता हूं तो लोगों को अच्‍छा लगता है। बोतल खुलती है तो गले में उतर जाता हूं। उसके बाद जो होता है, उससे तो मानव जाति का चरित्र उजागर होता है, मेरा नहीं। मानव जाति का तो ब्रह़मास्‍त्र है - कुछ भी कर लो और दूसरे पर दोष मढ़ दो। मैं हलक से नीचे उतरा नहीं कि दोषी बन गया। शबाब और कबाब पर कोई ग्रंथ हो या न हो, बच्‍चन साहब ने मुझ पर काव्‍य ग्रंथ लिखकर जो उपकार किया है, उसका एहसान मैं सृष्टिकाल तक चुका नहीं पाउंगा।

एक तरफ मुंबई में नए नियम शर्तों के हिसाब से शबाब फिर से परोसने का फैसला आया, वहीं मेरे बारे में अशुभ समाचार आया। मुझे तो लोग खलनायक मानते ही हैं, मुझ पर मनाही से बिहार सरकार जनप्रिय सरकार हो गई। अब मैं नीतीश साहब को क्‍या बताउं कि कितने लोगों ने मुझे मिटाने के लिए क्‍या क्‍या नहीं किया पर मैं काठ की हांडी तो हूं नहीं कि एक बार में ही चूल्‍हे से उतर जाउंगा। देशी, विदेशी, निहायत देशी न जाने कितने स्‍वरूप और न जाने कितने स्‍वाद हैं मेरे। स्‍वाद अनेक और काम एक। नाम तो देखिए मेरा, अंगूर की बेटी। कहां मैं और कहां .......। अच्‍छा हुआ मुझे प्रतिबंधित कर दिया गया वरना मैं कहां सभ्‍य समाज की पार्टियों की शान और कहां ...। मुझे अफसोस नहीं है और अफसोस है भी तो इस तरह के फैसलों पर जो लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए लिए जाते हैं। खैर क्‍या करना? मेरा तो अतीत भी गौरवशाली रहा है, वर्तमान भी गौरवशाली है और भविष्‍य के गौरवशाली होने में भी कोई शक्ति बाधा नहीं बन सकती। अभिमान नहीं, स्‍वाभिमान के साथ कहना चाहता हूं -
कुछ बात है मुझमें कि हस्‍ती मिटती नहीं हमारी

माना कि कुछ परिवारों में मुझे लेकर घटिया राय कायम है पर उससे अधिक परिवारों में मुझे लेकर जो दीवानगी है, वहीं मेरे लिए बहुत है। शराबी फिल्‍म में बिग बी साहब ने गाया था- नशा शराब में होता तो नाचती बोलत। वाह! क्‍या लाइन थी। मानव जाति को आईना दिखाने के लिए इससे अच्‍छी लाइन नहीं हो सकती। मुझे बदनाम करने के लिए देवदास का चरित्र गढ़ा गया। कौन बताए कि सनक शराब में नहीं, दिमाग में होती है। जाने कितनी किताबों में मेरा मान बढ़ाया गया है और जाने कितनी किताबों में मेरे मान का मर्दन किया गया है। मैं वहीं का वहीं हूं और लिखने पढ़ने वाले रास्‍ता नाप लिए। मैं वो विषय हूं, जो कभी खत्‍म नहीं होता। पढ़ने वाला खत्‍म हो जाता है और विषय जिंदा रह जाते हैं।

ठीक है, कौन अपना माथा खराब करे। प्रतिबंधित हो गया हूं मैं बिहार, गुजरात के अलावा दो और राज्‍यों में लेकिन देखता हूं कि मेरी बिक्री कौन रोक लेता है। प्रतिबंध के बाद तो मेरी औकात और बढ़ गई है या बढ़ जाएगी। लोग अभी से ही साबुन खाने लगे हैं। कितना दिन साबुन खाएंगे, सर्फ खाएंगे, धतूरा खाएंगे।  कितने दिन कोई मुझे रोक लेगा। शबाब और कबाब नहीं हूं मैं। मैं वो आदत हूं जो ठेके से लेकर बेडरूम तक सिर चढ़कर बोलता है। सौ में बिकता था, अब हजार में बिकूंगा। बड़ा शौक है सरकारों को मुझे प्रतिबंधित करने का। दरअसल वो शौक शराबियों से और अधिक पैसे निकलवाने की है। एक का सौ और सौ का हजार आएगा तो नेताओं की झोली भरेगी, जिसका कोई हिसाब किताब भी होगा और न ही कोई इनकम टैक्‍स का झमेल। कम्‍प्‍लीट ब्‍लैक एंड व्‍हाइट मनी। दरअसल ये नेताओं का कम्‍प्‍लीट फ्रस्‍टेशन है, जिनकी अपनी ही पार्टियों में मैं पैमाने से बाहर हो जाता हूं लेकिन बाकी लोगों के लिए ..... । अब क्‍या बताएं। सरकारें आएंगी, सरकारें जाएंगी। मुझ पर प्रतिबंध लगेगा और प्रतिबंध हटेगा। वंशीलाल सरकार इसी मुद़दे पर आई थी और इसी मुद़दे पर चली भी गई। वंशीलाल भी चले गए और मैं..... ।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

#gaurilankesh : मौत हो तो ऐसी

मौत हो तो ऐसी। एक मिनट पहले तक जिन्हें कर्नाटक के बाहर बहुत अधिक नहीं जाना जाता था, उन्हें मरते ही पल भर में अनंत शोहरत हासिल हो गई। जगह-जगह मातमनुमा उल्लास-उत्सव मनाया जाने लगा। पिघलती मोमबत्तियां अगाध श्रद्धांजलि का भाव पैदा करने लगीं। देश की राजधानी दिल्ली में मातमपुरसी का आयोजन कर राजनीति की रोटियां सेंकी गईं और तमाम सेलिब्रिटी ने अपने जौहर दिखाए। क्या करें भाव भले मातम का न हो, माहौल तो मातम का था न। #gaurilankesh कर्नाटक की पत्रकार की हत्या की खबरें टीवी पर कुछ यूं फ्लैश की गईं: कर्नाटक की पत्रकार #gaurilankesh की हत्या, गौरी हिन्दूवादी राजनीति की धुर विरोधी थीं और भाजपा की नीतियों का विरोध करती थीं। मेरे दस साल के कैरियर में खबर फ्लैश करने का यह नया और आधुनिक तरीका लगा। गौरी लंकेश के बारे में यही पूरी जानकारी थी और उन्हें इससे अधिक समझने का मौका न तो मानस को दिया गया और न ही पत्रकारों ने खुद इसमें अपनी दिलचस्पी दिखाई। मुझे भी उनके बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं थी। लगा कि किसी महिला की हत्या कर दी गई होगी। मुझे क्या पता था कि इसमें बहुत मसाला है और इतना मसाला है कि स...

राम मंदिर निर्माण के लिए बरस रहा पैसा

  इस समय पूरा देश राममय हो गया है. राम भक्‍ति में सराबोर देशवासियों ने मात्र 72 घंटों में 246 करोड़ रुपये दान के रूप में दिया है. छोटा हो गया बड़ा, इस दान के कार्य में अधिकांश देशवासी अपना योगदान दे रहा है. राम मंदिर के लिए हर घंटे 3.41 करोड़ रुपये जमा हो रहे हैं. अगर इसे मिनट में बांटे तो एक मिनट में 57 लाख रुपये जमा हो रहे हैं.  42 दिन तक चंदा इकट्ठा करने का काम. चलेगा और इसकी रकम एसबीआई, पीएनबी और बैंक ऑफ बड़ौदा में जमा की जा रही है. बैंकों के कुल 46000 ब्रांचों से पूरे देश को कवर किया जाएगा. 15 से 31 जनवरी तक रशीद काटकर चंदा जुटाया जाएगा. एक से 27 फरवरी तक कूपन के जरिए चंदा जुटाया जाएगा. चंदे के लिए 10, 100 और 1000 रुपये के कूपन जारी किए जाएंगे. 100 रुपये के 8 करोड़ कूपन छापे जाएंगे तो 10 रुपये के 4 करोड़ और 1000 रुपये के चंदे के लिए 12 लाख कूपन छापे जाएंगे.  विहिप और आरएसएस से जुड़े 40,00,000 कार्यकर्ताओं को दी गई है. इसके लिए 10 लाख टोली बनाई गई है, हर चार टोली पर एक कलेक्‍टर बनाया गया है, जिसकी जिम्‍मेदारी बैंक में पैसा जमा कराने की होगी. अब तक का सबसे बड़ा 11 कर...

दिल्ली में हिंसा का 'सालाना जलसा'

दिल्‍ली में हिंसा अब सालाना जलसे की तरह हो गई है. पिछले साल नागरिकता कानून के नाम पर दिल्‍ली को भड़काया गया तो इस बार किसान आंदोलन के नाम पर दिल्‍ली को दहलाया गया. संभव है कि अगले साल कोई और बहाने से किसी और को आगे कर अपना उल्‍लू सीधा किया जाए. कुल मिलाकर सरकार को नवंबर के बाद सचेत हो जाना चाहिए, क्‍योंकि इसकी क्रोनोलॉजी समझना बेहद जरूरी है. वो तो खैर मनाइए कोरोना महामारी का कि दिल्‍ली का दंगा कंट्रोल हो गया, नहीं तो हम वो देखने वाले थे, जो कभी सोच भी नहीं सकते थे. ये जो तस्‍वीरें आप देख रहे हैं, वो आपको विचलित करने के लिए काफी हैं. गणतंत्र दिवस जैसे गौरवशाली दिन, जब हमें दुनिया को अपना गौरव दिखाना होता है, उस दिन को आंदोलन के नाम पर राष्‍ट्रीय शर्म बना दिया गया. एक तरफ जवान दुनिया के सामने अपना फौलादी इरादा जाहिर कर रहे थे तो दूसरी ओर, दिल्‍ली को दहलाने के लिए कुछ साजिशें कुछ कर गुजरने के लिए बेकरार हो रही थीं. तभी तो तय समय से पहले कई जगहों पर दिल्‍ली पुलिस की बैरिकेडिंग तोड़ने की खबरें आने लगीं. यह पहले से तय था कि आज का दिन भारी साबित होने वाला है, फिर भी सरकार और दिल्‍ली पुलि...