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संदेश

मैं शराब हूं

शबाब पर कोई प्रतिबंध नहीं है, कबाब पर कोई मनाही नहीं है लेकिन मुझसे सभी को नफरत रहती है। जबकि मेरे नाम कई विशिष्‍ट टाइप के तमगे जुड़े हैं। देवताओं की महफिल में भी परोसा गया मैं और राक्षसों की भोज में भी पर बदनाम ही रहा हूं मैं। अमृत पिलाने के बदले भगवान विष्‍णु ने मोहिनी रूप धारण कर मुझे उनके हलक में उतार दिया। व्‍हाइट हाउस की पार्टी की शान हूं मैं पर बिहार, गुजरात जैसे राज्‍यों के लिए बेकार हूं मैं। कैसे अपनी बदतमीजी मेरे ऊपर मढ़ दी जाती है और मैं कुछ कुछ नहीं कर पाता। मुझ पर लिखी कविता मधुशाला बन जाती है और मैं...। क्‍या करूं मैं?  व्‍हाइट हाउस, क्रेमलिन और 10 डाउनिंग स्‍ट्रीट की दावत मेरे बिना अधूरी रहती है और इस देश के लोगों की नादानी तो देखो, मुझ पर प्रतिबंध लगाने की होड़ सी मची है। हरिवंश राय बच्‍चन साहब ने लिखा है - 'बैर कराते मंदिर मसजिद, मेल कराती मधुशाला' । अगर मैं इतना ही बुरा हूं तो इतने बड़े कवि और साहित्‍यकार ने मेरे बारे में इतनी ऊंची सोच कैसे रखी? गुजरात में मैं पहले से बैन हूँ और अब उसी लीक पर चलते हुए सुशासन बाबू नीतीश कुमार ने भी वहीं काम किया है। बं...

नारंग! तुम "खलनायक" ही रह गए

नारंग और जेजे जैसे नाम किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं। दोनों नाम बॉलीवुडिया खलनायकी के पर्याय रहे हैं। समय बदला, चरित्र बदला। आज नारंग मात्र कुछ ही लोगों के लिए हीरो बन पाया। जेजे के उन्‍मादियों ने नारंग को सिर्फ इसलिए दुनिया से रुखसत कर दिया कि वह बांगलादेश पर भारत की विजय के उल्‍लास को पचा नहीं पाया था। अपराध तो उसका संगीन था, इसमें कोई दो राय नहीं। नादानी में नारंग खुद ही अपनी जान का दुश्‍मन बन गया। उसका यही एकमात्र अपराध भी नहीं था। उसका सबसे बड़ा अपराध तो यह था कि उसके नाम के आगे न कोई दलित उपनाम था और न ही मुसलिम। सो हो गया बेचारे का खेल खत्‍म। अगर वह दलित और मुसलमान होता तो लालबत्‍ती गाडि़यों का रेला उसके घर के आगे लाइन लगा रहे होते। तमाम पुरस्‍कारों की मां बहन हो गई होती अब तक। कई लोग देश से यह कहकर कि निकल जाते कि यहां कोई सुरक्षित नहीं है। पर अफसोस, वह इन किसी मानकों को पूरा नहीं करता था। नारंग बॉलीवुडिया खलनायकी से चरित्र अभिनेता के रोल में आ चुका था। जिन्‍दाल, बख्‍तावर, जोजो, मोगैंबो, डा डैंग, तात्‍या से अलग नारंग देशभक्ति दिखा रहा था। अब जनमानस तो नारंग को खलनायक ही...

छिछोर है कन्‍हैया

कन्‍हैया छिछोर है, बदतमीज है, आवारा है लेकिन कुछ लोग मजबूर हैं कन्‍हैया की तारीफ करने के लिए। क्‍या करें बेचारे, सामने कोई बड़ा चेहरा ही नहीं है। नीतीश कुमार जीत जाते हैं तो उनमें अपना चेहरा देखने की कोशिश, ममता जीत जाएंगी तो उनमें एक चेहरा ढूंढने की कोशिश, केजरीवाल एक चलता-फिरता चेहरा हैं ही, रोहित वेमुला भी चेहरा हो जाते हैं। कन्‍हैया और उमर खालिद भी एक विकल्‍प हैं या फिर विकल्‍पहीनता के मारे हुए लोगों का चेहरा हैं। दूसरी ओर, स्‍वमेव राहुल गांधी पापड़ की तरह सतह पर हैं ही, जिनके इर्द गिर्द हमेशा बरी थोपने की कोशिश की जाती है। जब जो लोग सफल हो जाते हैं, वे राहुल गांधी और बाकियों को वैसे ही कोसते रहते हैं, जैसे अरविंद केजरीवाल। जो लोग सफल नहीं हो पाते, वे राहुल गांधी में ही अपना चेहरा ढूंढते रहते हैं। विकल्‍पहीनता के मारे लोगों को क्‍या कहें, जिस आवारा कन्‍हैया को पेशाब करने का सऊर नहीं है उसे राष्‍टृीय राजनीति के परिप्रेक्ष्‍य में खड़ा करने की कोशिश करते हैं। दिल्‍ली विवि की एक असिस्‍टेंट प्रोफेसर ने खुलासा किया है कि जेएनयू कैंपस में कन्‍हैया बेतरतीब तरीके से पेशाब कर रहा था। ...

कन्हैया जेलगमनम्

द्वापर युग में कन्हैया के पापा जेल गए थे। तब कंस का राज था। अब कलयुग में स्वयं 'कन्हैया' को ये दिन देखना पड़ रहा है। अभी यहाँ मोदीराज है। तब स्थितियां अलग थीं और अब के हालात अलग। नाम का लोचा फंस रहा है। कन्‍हैया यहां कथित तौर पर खलनायक है पर समय बीतने के साथ उसकी खलनायकी संजय दत्‍त की तरह निखरकर नायक वाली बन रही है। काफी अंतर्विराेध है। सब कुछ द्वापर युग की तरह तय नहीं है, जैसा कि हम ग्रंथों और टीवी चैनलों के माध्‍यम से जान पाए हैं। वर्षों बाद जब इस समय का इतिहास लिखा जाएगा तो लोगों के विचारों में मोदी और कन्‍हैया को लेकर वो साम्‍य नजर नहीं आएगा। नौ फरवरी की रात ऐतिहासिक हो गई है। उस रात के अंधेरे से एक चिराग पैदा हुआ है। उस चिराग की चकाचौंध विचित्र है। उसकी विचित्रता आधा गिलास खाली और आधा भरा हुआ टाइप है। हाल में बनी उसकी छवि सर्वस्‍वीकार्य नहीं है। अब तक यह तय नहीं हो पाया है कि उसका उभार प्राकृत्रिक है या कृत्रिम। उभार के बाद का उभार तो कृत्रिम है यानी मीडिया की माइकें और लाइट, कैमरा और एक्‍शन फेयर एंड लवली टाइप हैं। हाल में एक नेता ने संसद में फेयर एंड लवली का जोर शोर ...

जो दिखा वो सच नहीं है!!!!

ऐसा बहुत कम होता है कि जो दिखता है, वो सच नहीं होता लेकिन ऐसा होता है, यह भी एक सच है। सच न हो तब भी सच मान लीजिए कि यह एक सच है। बैक गियर लगाते हुए हम फिर मालदा और पूर्णिया की घटना को याद करना चाहेंगे। उस घटना में जो दिखाया गया, वो सच नहीं था। रोहित वेमुला की मौत के पीछे के कारणों को अनुमानित रूप से सच मान लिया गया, जबकि देखा किसी ने नहीं था। यहां हम कह सकते हैं कि जो नहीं दिखता, वो सच होता है। अब आते हैं दृश्य माध्यमों से खेले जाने वाले खेल पर। एक चैनल ने दिखाया कि जेएनयू में अफजल की बरसी मनाई गई और उस दौरान राष्ट्रविरोधी नारे लगाए गए। अगले ही दिन ऐसे ही एक कार्यक्रम में दिल्ली प्रेस क्लब में देशविरोधी नारों को हवा दी गई। बवाल मचना लाजिमी था, क्योंकि यहां सरकार वर्सेज अन्य नहीं, देश वर्सेज गद्दारों का हिट शो चल रहा था। लिहाजा न चाहते हुए भी अन्य चैनलों को इसे फॉलो करना पड़ा। शतरंज में शह के बाद मात होता है लेकिन इस प्रकरण में मात के बाद शह का खेल खेला गया। बाकी चैनल मात खा गए लिहाजा उस न्यूज चैनल को सवालों के घेरे में लाने और गद्दारों को शह देने की भरसक कोशिश की...

सियाचिन के हनुमान

बेवफा हुआ सियाचिन का मौसम बर्फ की चादर कब्र बन गई कब्र से जिन्दा निकले हनुमंथप्पा दुनिया की आँखें फटी की फटी रह गईं देश ने दवा की, देशवासियों ने दुआ जान की भीख मांगने निकलीं माँ, बहन व बुआ कैसे बचते 'हनुमान' जब कुदरत ही बेवफा हो गए सियाचिन तो बचा लेंगे हम दुश्मन की छाती पर चढ़ लेंगे हम पा लेंगे विजय कोहराम मचाकर मगर राम से 'हनुमान' तो बेवफा हो गए जीवाश्म छोड़ चले 'हनुमान' भले ही पर बताओ कब 'हनुमान' मरे हैं 'हनुमान' अजर हैं, अमर हैं दिल में हैं 'हनुमान', मन में हैं 'हनुमान' बोलो जय जय जय हनुमान बोलो जय जय जय हनुमान रचयिता: सुनील मिश्र 'सुनील'

क्‍योंकि दलित शब्‍द बिकता है

div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"> देश भर में यह बहस चल पड़ी है कि रोहित वेमुला दलित था या नहीं। सत्तापक्ष कह रहा है कि वह दलित नहीं था और विपक्ष उसके दलित होने पर अपना वीटो लगा रहा है। चिंता की बात तो यह है कि सामाजिक चिंतक, विश्लेषक और पत्रकार भी इस बहस का हिस्सा बन गए हैं। इस देश में किसी की मौत सनसनी नहीं है। सनसनी है उसका दलित होना या न होना। रोहित की आत्महत्या के बाद तो हमें अपने सिस्टम की खामियों को दुरुस्त करने को लेकर बहस छेड़नी चाहिए थी पर अफसोस! हम तो अभी इस जाल में फंसे हैं कि दलित मरा या गैरदलित। कोई नहीं कह रहा कि एक छात्र मरा, एक इंसान मरा, एक मां का बेटा मरा या फिर एक बहन का भाई मरा। इंसान होना, एक छात्र होना, एक मां का बेटा होना, एक बहन का भाई होना किसी के लिए मायने नहीं रखता। मायने रखता है उसका दलित होना या न होना। क्‍योंकि दलित शब्‍द बिकता है। ये किस तरह की मातमपुरसी है? चलो राजनीति करनी है, अपनी जमीन मजबूत करनी है या तलाश करनी है या खोई जमीन हासिल करनी है तो शौक से करो लेकिन इतना मत गिर जाओ। विपक्षी नेताओं को दलित ...