div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on">
देश भर में यह बहस चल पड़ी है कि रोहित वेमुला दलित था या नहीं। सत्तापक्ष कह रहा है कि वह दलित नहीं था और विपक्ष उसके दलित होने पर अपना वीटो लगा रहा है। चिंता की बात तो यह है कि सामाजिक चिंतक, विश्लेषक और पत्रकार भी इस बहस का हिस्सा बन गए हैं। इस देश में किसी की मौत सनसनी नहीं है। सनसनी है उसका दलित होना या न होना। रोहित की आत्महत्या के बाद तो हमें अपने सिस्टम की खामियों को दुरुस्त करने को लेकर बहस छेड़नी चाहिए थी पर अफसोस! हम तो अभी इस जाल में फंसे हैं कि दलित मरा या गैरदलित। कोई नहीं कह रहा कि एक छात्र मरा, एक इंसान मरा, एक मां का बेटा मरा या फिर एक बहन का भाई मरा। इंसान होना, एक छात्र होना, एक मां का बेटा होना, एक बहन का भाई होना किसी के लिए मायने नहीं रखता। मायने रखता है उसका दलित होना या न होना। क्योंकि दलित शब्द बिकता है।
ये किस तरह की मातमपुरसी है? चलो राजनीति करनी है, अपनी जमीन मजबूत करनी है या तलाश करनी है या खोई जमीन हासिल करनी है तो शौक से करो लेकिन इतना मत गिर जाओ। विपक्षी नेताओं को दलित कार्ड खेलने का मौका मिला है। कई छोटी पार्टियों को भी इसमें अपने लिए अवसर और विस्तार का मौका दिख रहा है। दूसरी ओर सत्ता शीर्ष विपक्ष के आरोपों का जवाब देने के लिए बड़े-बड़े मंत्रियों से प्रेस कांफ्रेंस करवा रहा है। बाकी देश जाए भाड़ में। उधर एक छात्र मरा, दूसरी तरफ मौका मिल गया हीरो बनने और विलेन बनाने का। छाती पीटकर सामाजिक न्याय की दुहाई दी जा रही है। सरकार और विपक्ष दोनों ही तरफ से यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि जो कुछ भी हो सकता है, वे ही करने वाले हैं। 70 साल तक राजनेता सामाजिक न्याय की ही दुहाई दे रहे हैं और अब तक रोहित वेमुला जैसे लोग इसके शिकार हो रहे हैं। ये मातमपुरसी तब तक होती रहेगी, जब तक कोई दूसरा रोहित शिकार नहीं हो रहा। तब राजनीति का केंद्र हैदराबाद न होकर कोई और शहर हो जाएगा। तब रोहित वेमुला इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाएगा।
याद होगा आपको, महाराष्ट्र में एक दीन हीन महिला के घर राजनेता रोटी खाने जाते थे। यह दिखाने के लिए कि वो किसानों, भूखों, नंगों के माई-बाप हैं। दुर्भाग्यवश वो महिला भूख से ही मारी गई और उसका कोई पुरसाहाल न रहा। अभी पिछले साल पंजाब में राजनेता एक किसान के घर गए और ठीक एक माह बाद उस किसान ने फंदे से लटककर अपनी जान दे दी थी। किसान तब भी मर रहे थे और अब भी मर रहे हैं और आगे भी मरते रहेंगे। अभी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री जिस दिन बुंदेलखंड गए थे, उसी दिन कर्ज के बोझ तले दबे एक किसान फंदे पर लटक गया। यह उस किसान के लिए त्रासदी नहीं थी। यह मुख्यमंत्री के लिए त्रासदी थी। यह उनके और उनसे पहले के मुख्यमंत्रियों के लिए लानत थी। मुख्यमंत्री और अन्य राजनेता यह समझें या नहीं समझें। थेथरई करने के लिए तो दुनिया बनी ही है और लोग कर ही रहे हैं।
रोहित मरते रहेंगे। राजनीति होने तक यह रुकने वाली नहीं है। क्योंकि सिस्टम तब तक नहीं सुधरेगा, जब तक सिस्टम नहीं सुधरेगा और राजनीति सिस्टम सुधारने नहीं देगी। रोहित की मौत को व्यर्थ न जाने दीजिए। राजनीति को इस मुद्दे पर हावी न होने दीजिए। जिसको राजनीति करनी है, करने दीजिए। कम से कम हम और आप सिस्टम की बात करें। सिस्टम सुधारना तो दूर की बात है। आइए पहले हम सिस्टम की बात करें, क्योंकि बात निकलेगी तभी दूर तलक जाएगी।
ये किस तरह की मातमपुरसी है? चलो राजनीति करनी है, अपनी जमीन मजबूत करनी है या तलाश करनी है या खोई जमीन हासिल करनी है तो शौक से करो लेकिन इतना मत गिर जाओ। विपक्षी नेताओं को दलित कार्ड खेलने का मौका मिला है। कई छोटी पार्टियों को भी इसमें अपने लिए अवसर और विस्तार का मौका दिख रहा है। दूसरी ओर सत्ता शीर्ष विपक्ष के आरोपों का जवाब देने के लिए बड़े-बड़े मंत्रियों से प्रेस कांफ्रेंस करवा रहा है। बाकी देश जाए भाड़ में। उधर एक छात्र मरा, दूसरी तरफ मौका मिल गया हीरो बनने और विलेन बनाने का। छाती पीटकर सामाजिक न्याय की दुहाई दी जा रही है। सरकार और विपक्ष दोनों ही तरफ से यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि जो कुछ भी हो सकता है, वे ही करने वाले हैं। 70 साल तक राजनेता सामाजिक न्याय की ही दुहाई दे रहे हैं और अब तक रोहित वेमुला जैसे लोग इसके शिकार हो रहे हैं। ये मातमपुरसी तब तक होती रहेगी, जब तक कोई दूसरा रोहित शिकार नहीं हो रहा। तब राजनीति का केंद्र हैदराबाद न होकर कोई और शहर हो जाएगा। तब रोहित वेमुला इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाएगा।
याद होगा आपको, महाराष्ट्र में एक दीन हीन महिला के घर राजनेता रोटी खाने जाते थे। यह दिखाने के लिए कि वो किसानों, भूखों, नंगों के माई-बाप हैं। दुर्भाग्यवश वो महिला भूख से ही मारी गई और उसका कोई पुरसाहाल न रहा। अभी पिछले साल पंजाब में राजनेता एक किसान के घर गए और ठीक एक माह बाद उस किसान ने फंदे से लटककर अपनी जान दे दी थी। किसान तब भी मर रहे थे और अब भी मर रहे हैं और आगे भी मरते रहेंगे। अभी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री जिस दिन बुंदेलखंड गए थे, उसी दिन कर्ज के बोझ तले दबे एक किसान फंदे पर लटक गया। यह उस किसान के लिए त्रासदी नहीं थी। यह मुख्यमंत्री के लिए त्रासदी थी। यह उनके और उनसे पहले के मुख्यमंत्रियों के लिए लानत थी। मुख्यमंत्री और अन्य राजनेता यह समझें या नहीं समझें। थेथरई करने के लिए तो दुनिया बनी ही है और लोग कर ही रहे हैं।
रोहित मरते रहेंगे। राजनीति होने तक यह रुकने वाली नहीं है। क्योंकि सिस्टम तब तक नहीं सुधरेगा, जब तक सिस्टम नहीं सुधरेगा और राजनीति सिस्टम सुधारने नहीं देगी। रोहित की मौत को व्यर्थ न जाने दीजिए। राजनीति को इस मुद्दे पर हावी न होने दीजिए। जिसको राजनीति करनी है, करने दीजिए। कम से कम हम और आप सिस्टम की बात करें। सिस्टम सुधारना तो दूर की बात है। आइए पहले हम सिस्टम की बात करें, क्योंकि बात निकलेगी तभी दूर तलक जाएगी।
rajniti nhi krege to vote bank kha se bnayege
जवाब देंहटाएंrajniti nhi krege to vote bank kha se bnayege
जवाब देंहटाएंलोगों को एक मौका चाहिए कि वह दलित था यह नहीं क्योंकि सिस्टम ही काफी विगड़ा हुआ है सर जी कहीं सिस्टम नाम कोई चीज ही नहीं रह गई। सरकारें अपना भला सोचती हैं किसी किसान की जान की क्या वैल्यू क्या? जब सरकार नहीं होती हैं तो नेता लोग उन्हें अपना हितैषी कहते हैं।
जवाब देंहटाएंशानदार चौका
जवाब देंहटाएंशानदार चौका
जवाब देंहटाएं