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भाजपा का ‘विचित्र किन्तु सत्य’

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भाजपा के बारे में टिप्पणी की थी : विचित्र किन्तु सत्य। उस समय तो वह टिप्पणी राजनीतिक थी और उसे राजनीतिक दृष्टि से ही देखा गया था पर बदले हालात में यह टिप्पणी कम से कम भाजपा के बारे में सत्य साबित हो रही है। भाजपा के लिए पहला विचित्र किन्तु सत्य है पत्रकारों की माइक। माइक देखते ही भाजपा नेता बौरा जाते हैं और अपनी हद भूल जाते हैं। माइक के सामने सब बोलते हैं। कोई भी यह नेता नहीं कहता कि यह बात हमारे हद से बाहर है। यह विचित्र किन्तु सत्य या तो अनुशासनहीनता है या फिर पार्टी की रणनीति। दोनों ही स्थितियों में पार्टी के लिए यह हास्यास्पद है, क्योंकि भाजपा पार्टी विद डिफरेंस और अत्यधिक अनुशासन का ढिंढोरा पीटती रही है। अनुशासनहीनता है तो फिर पार्टी को कार्रवाई करनी चाहिए और अगर यह रणनीति का हिस्सा है तो यह रणनीति बदलनी चाहिए। भाजपा के दूसरे और विचित्र किन्तु सत्य हैं शॉटगन शत्रुघ्न सिन्हा। लगता है कि पार्टी के पास उनको चुप कराने का कोई उपाय नहीं बचा है। वे लगातार पार्टी नेतृत्व को एक तरह से चुनौती दे रहे हैं कि अगर दम है तो कार्रवाई करके दिखा। शायद ही क...

हमले अच्छे हैं!

ये कैसा इत्तेफाक है कि जिस आतंकवाद (टेररिज्म) से फ्रांस इस पूरे साल त्रस्त रहा, वहीं पर टेररिज्म शब्द इजाद किया गया था। टेररिज्म लैटिन शब्द टेरर से बना है, जिसका अर्थ भयभीत करना होता है। दरअसल फ्रांस में 1793 से 1794 के बीच के शासन को रिजिन ऑफ टेरर कहा जाता है। उस समय फ्रांस पर जैकोबिन का शासन था। उसके शासन को गाली देने के लिए तब के लोग इस शब्द का प्रयोग करने लगे। इस शब्द को और चर्चा उस समय मिली, जब 1869 में रूस के सर्गेई नेकावेव ने खुद पीपल्स रिट्रीब्यूशन की स्थापना कर खुद को टेररिस्ट घोषित कर लिया। यह वह वर्ष था, जब हमारे राष्ट्रपिता और अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी पैदा हुए थे। आज टेररिज्म शब्द अंतरराष्ट्रीय पटल पर काफी मशहूर शब्द है। क्यों? क्योंकि अब शक्तिशाली और दादा कहे जाने वाले देश भी इससे भयभीत हो चले हैं। पहले उनके लिए इस शब्द का कोई अर्थ ही नहीं था, क्योंकि आतंकवादियों की पहुंच इन तक नहीं थी लेकिन जब अंतरराष्ट्रीय आतंक के गुरु ओसामा बिन लादेन ने अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश पर भी हमला बोल दिया तब माना गया कि आतंकवाद जैसा भी कुछ होता है। विश्व बिरादरी में हाहाकार मच गय...

बिहार चुनाव के बाद

बिहार में चुनाव का शोर खत्म हो चुका है। परिणाम आ चुके हैं। भारी बहुमत से चुनी गई नई सरकार छठ के बाद शपथ लेने जा रही है। बिहार की नईनवेली सरकार को ढेरों बधाई। "राज्य का चुनाव पर असर पूरे देश में" का स्लोगन इस राज्य के महत्व को दर्शाता है। इस चुनाव के समय कई तरह के घटनाक्रम सामने आए। पहले डीएनए और फिर पैकेज को लेकर विवाद जोड़ पकड़ा। चुनाव नजदीक आया तो  बीफ खाने की आशंका में अखलाक  का मारा जाना, गोहत्या, हरियाणा में दलितों के बच्चों को जलाने, एक दलित की थाने में रहस्यमय हालात में मौत, भाजपा नेताओं की अनर्गल बयानबाजी, महाराष्ट्र मेंटैक्सी और ऑटो ड्राइवरों को लाइसेंस मराठी भाषा जानने पर ही देने की घोषणा, बिहार से तमाम लोगों को घूमने के लिए महाराष्ट्र ले जाना, छोटा राजन की गिरफ्तारी, पाकिस्तान के खिलाफ बयानबाजी, मोहन भागवत का आरक्षण संबंधी बयान, लालू के मुंह में शैतान का घुसना, मोदी को ब्रहमपिशाच बताना आदि घटनाएं एक के बाद एक हुईं। बिहार चुनाव ने इन सभी मुद्दों को खुद में समेट लिया। इसका परिदृश्य राष्ट्रीय हो गया। कुछ तो बिहार का राजनीतिक चरित्र ही ऐसा है और कुछ बना दिया गया। ...

भाजपा को बिहार चुनाव हारना ही था

आप बिहार चुनाव में मिली करारी हार के लिए भाजपा की रणनीति को दोष दीजिए। अमित शाह के बिहार में कैंप करने का मजाक उड़ा लीजिए। मोदी की ताबड़तोड़ रैली की खिल्ली उड़ा लीजिए। मोदी के पैकेज देने के तरीकों पर सवाल उठाइए। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण की समीक्षा संबंधी बयान पर सारा ठीकरा फोड़ दीजिए। गाय और अखलाक विवाद को भी बिहार चुनाव परिणाम से जोड़कर मजा ले लीजिए पर इतना जान लीजिए कि ये सब नहीं होता तब भी बिहार चुनाव का परिणाम यही आने वाला था। हां, थोड़ा कम और अधिक होने की गुंजाइश हो सकती थी। ये सोचने से कि अगर ऐसा होता तो वैसा होता और वैसा होता तो ऐसा होगा, गलत होगा। बिहार में जाति आधारित चुनाव होते रहे हैं। यह चुनाव भी विशुद्ध जातीय आधार पर लड़ा गया। महागठबंधन ने जाति आधारित व्यूह रचना की तो एनडीए ने संप्रदाय आधारित। गलत और सही पर न जाइए। चुनावों में हर पार्टी की अपनी अपनी रणनीति होती है, जो गलत भी होती है और सही भी। खैर ये सब देखना चुनाव आयोग का सिरदर्द है। महागठबंधन की व्यूह रचना, जो लोकसभा चुनाव के बाद से ही मूर्त रूप लेने लगी थी, वो प्रथम दृष्टया ही प्रभावी लग रही थी। आधार वोट के रूप मे...

बुरा न मानो दिवाली है

मोदी सरकार की असहिष्णु नीतियों के विरोध में देश से लेकर विदेशों तक में आवाजें उठाई जा रही हैं। भारत में तो आधे से भी अधिक साहित्यकारों ने अपने-अपने पुरस्कार लौटा दिए हैं। फिल्मकारों और अब वैज्ञानिकों ने भी पुरस्कार लौटाने की महत्ती रस्म निभाने की कवायद शुरू कर दी है। शायर मुनव्वर राना ने पुरस्कार तो लौटा दिया पर प्रधानमंत्री कार्यालय से एक बार बुलावा आ गया तो जूता सिर पर रखने की बात करने लगे। जाहिर है पुरस्कार वे इसलिए लौटा रहे थे कि इतने बड़े शायर होने के बाद भी प्रधानमंत्री कार्यालय से बुलावा नहीं आ रहा था। बेचारे कसमसा रहे हैं कि अब कौन सा मुंह लेकर प्रधानमंत्री के सामने जाएं। लिहाजा क्षतिपूर्ति करने के लिए जूता उठाने की बात कहते फिर रहे हैं। दूसरे लोग इसलिए अभी तक नाराज हैं कि सिर्फ मुनव्वर को ही बुलावा क्यों आया, हमें क्यों नहीं आया? मुनव्वर तो जूता उठाता, हम तो बहुत कुछ उठा सकते थे। हम जो उठाते तो मुनव्वर भी शरमा जाते। वसुधैव कुटुंबकम के जमाने में इस बात की चर्चा और इसका प्रभाव अब विदेशों में पड़ने लगा है। देश का मोस्ट वांटेड दाउद इब्राहिम ने साहित्यकारों, फिल्मकारों और वैज्ञा...

प्रवासी बिहारियों पर दारोमदार

बिहार में दशहरा के बाद जो चुनाव का चरण शुरू होने जा रहा है, वो दोनों सियासी धड़ों के लिए महत्वपूर्ण है। भाजपा के लिए इन चरणों में अपना गढ़ बचाने की चुनौती है तो महागठबंधन को  भाजपा के गढ़ में सेंधमारी करने का मौका। इस चरण में महत्वपूर्ण भूमिका उन प्रवासी बिहारियों की होगी,  जो आम तौर पर बिहार से बाहर रहते हैं या रहने को मजबूर हैं क्योंकि घर में उन्हें कोई रोजगार हासिल नहीं है। इसकी टीस आमतौर पर हर बिहारी को रहती है।  आमतौर पर दशहरा के बाद बिहार से बाहर रहने वाले लोग लौटकर दिवाली और छठ पर्व के लिए घर लौटते हैं।   काफी तादाद में घर लौटे मतदाता भी बड़ी उलटफेर कर सकते हैं। प्रवासी बिहारी जिधर अपना वोट डालेंगे, उसका पलड़ा उतना ही मजबूत होगा। आगे के चरणों के चुनाव के लिए दोनों गठबंधनों की नजर प्रवासी बिहारियों पर टिकी है। महाराष्ट्र के भुक्तभोगी : भाजपा प्रवासी बिहारियों को अपना वोटर मानती है पर महाराष्ट्र की सरकार ने वहां ऐसा कानून लागू किया है, जिसके अनुसार वहां ड्राइविंग लाइसेंस उन्हीं को मिलेगा, जो मराठी भाषी हैं। इस कारण लाखों बिहारी वहां प्रभावित हो रहे हैं और उन...