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हमले अच्छे हैं!

ये कैसा इत्तेफाक है कि जिस आतंकवाद (टेररिज्म) से फ्रांस इस पूरे साल त्रस्त रहा, वहीं पर टेररिज्म शब्द इजाद किया गया था। टेररिज्म लैटिन शब्द टेरर से बना है, जिसका अर्थ भयभीत करना होता है। दरअसल फ्रांस में 1793 से 1794 के बीच के शासन को रिजिन ऑफ टेरर कहा जाता है। उस समय फ्रांस पर जैकोबिन का शासन था। उसके शासन को गाली देने के लिए तब के लोग इस शब्द का प्रयोग करने लगे। इस शब्द को और चर्चा उस समय मिली, जब 1869 में रूस के सर्गेई नेकावेव ने खुद पीपल्स रिट्रीब्यूशन की स्थापना कर खुद को टेररिस्ट घोषित कर लिया। यह वह वर्ष था, जब हमारे राष्ट्रपिता और अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी पैदा हुए थे। आज टेररिज्म शब्द अंतरराष्ट्रीय पटल पर काफी मशहूर शब्द है। क्यों? क्योंकि अब शक्तिशाली और दादा कहे जाने वाले देश भी इससे भयभीत हो चले हैं।



पहले उनके लिए इस शब्द का कोई अर्थ ही नहीं था, क्योंकि आतंकवादियों की पहुंच इन तक नहीं थी लेकिन जब अंतरराष्ट्रीय आतंक के गुरु ओसामा बिन लादेन ने अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश पर भी हमला बोल दिया तब माना गया कि आतंकवाद जैसा भी कुछ होता है। विश्व बिरादरी में हाहाकार मच गया था। अमेरिकी राष्ट्रपति छुटभैये नेताओं की तरह जहां-तहां प्रेस कांफ्रेंस करके जबाब देते दिख जाते थे। इशारों-इशारों में किसी देश को धमकी दी जाती थी तो किसी को दुलारा जाता था। तब अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश जूनियर की एक लाइन काफी फेमस हो गई थी- ‘‘या तो आप हमारे साथ हैं या आप हमारे खिलाफ हैं।’’ अमेरिका की नजर में उससे पहले आतंकवाद जैसा कुछ होता ही नहीं था। इन शक्तिशाली देशों की दोगली नीति का कमाल देखिए कि अब तक आतंकवाद की एकसम्मत परिभाषा नहीं गढ़ी जा सकी है। आतंकवाद को परिभाषित करने के लिए भारत का एक प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र की टेबल पर पड़ा है पर इन देशों की जिद और संयुक्त राष्ट्र की मौजूदा संरचना इसमें आड़े आ रही है। उम्मीद है कि पेरिस हमले के बाद विश्व व्यवस्था इस पर एकराय हो सकेगी। भारत के प्रधानमंत्री ने पेरिस हमले के बाद भी इसकी जोरदार वकालत की।



भारत आतंकवाद की जद में 80 के दशक में आया। उसके बाद से लेकर अब तक देश में हजारों आतंकवादी हमले हो चुके हैं। यहां तक कि भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को भी आतंकवादियों ने मौत के घाट उतार दिया। देश के संसद भवन पर हमला हुआ। जम्मू-कश्मीर विधानसभा के बाहर हमला हुआ। मशहूर मंदिर और मस्जिदों को निशाना बनाया गया। कोर्ट-कचहरियों को भी नहीं बख्शा गया। देश का कोई कोना ऐसा नहीं बचा, जो आतंकवाद से त्रस्त न हों। रही सही कसर मुंबई हमले ने पूरी कर दी। पौने दो सौ लोगों को खुलेआम चंद लोगों ने गोलियों से भून दिया। उस मामले का मुख्य आरोपी अब भी पाकिस्तान का दामाद बना हुआ है और विश्व बिरादरी मुंह ताक रही है। आतंकवाद से त्रस्त होने की इससे बड़ा सबूत और क्या हो सकता है। फिर भी विश्व बिरादरी ने इस शब्द की गंभीरता पर ध्यान नहीं दिया। तथाकथित शक्तिशाली देशों का मानना है कि हम पर हमला हो तो आतंकवाद, बाकी अन्य देशों पर हमला हो तो कुछ और। भारत, श्रीलंका, बांग्लादेश, इंडोनेशिया आदि देशों ने बहुत आतंकवाद झेला लेकिन किसी ने एक न सुनी।



अमेरिका पर हमले के बाद लगा कि वाकई अब आतंकवाद के खिलाफ कुछ ठोस कदम उठाया जाएगा लेकिन नतीजा वहीं ढाक के तीन पात। साल बीतते गए और माहौल मद्धिम होता चला गया। नतीजा, चीन और ब्रिटेन भी आतंकवाद की जद में आ गए। लंदन मेट्रो में हमले से पूरा विश्व दहल गया, वहीं चीन के शिनशियांग प्रांत में भी यदा कदा घटनाएं होती रहती हैं। अब 2015 का साल तो फ्रांस के लिए कान बनकर ही आया है। पहले शार्ली हेब्दो प्रकरण, उसके बाद कई छोटे-छोटे हमले और फिर अब पेरिस में बड़ा हमला। अब ''टेररिज्‍म'' वहीं पहुंच गया है, जहां पर पैदा हुआ था। साफ है कि आतंकवादी कभी भी किसी देश को निशाना बना सकते हैं। जब तक आतंकवाद के खिलाफ विश्वव्यापी रणनीति नहीं बनाई जाएगी, तब तक मेरा आंकवाद और तुम्हारा आतंकवाद चलता रहेगा। मेरा आतंकवाद बड़ा और तुम्हारा आतंकवाद छोटा वाली नीति को  छोड़ने का समय आ गया है। तुष्टिकरण से अब तक न किसी का भला न हो पाया है और न होगा।

टिप्पणियाँ

  1. कत्लेआम कब तक झेलेंगे, अब और नहीं बर्दाश्त करो,
    तेरा मेरा बहुत हो चुका, मिलकर दुश्मन पर धार धरो,
    बम, बंदूकों से खेलने वाले कब प्यार की भाषा समझेंगे,
    मौत के तांडव करने वालों का मिलकर सब संहार करो,

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  2. duniya teji se do hisson mein bant raha hai. ya to aap aatankvad ke sath ho ya virodh mein. chup rahne ka koi matlab ab nahi hai.

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  3. mera manna hai ki doi bhi manav dahashatgardi pacand nahi ho sakta

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  4. बहुत खूब ....शानदार लेखनी
    सिर्फ शब्दों में ....आतंकवाद से लड़ने की सजा है ।
    लोन उल्फ़ ....

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  5. बहुत सही और सटीक कहा । आतंक का ना ही कोई नाम होता है,ना कोई मजहब ,ना उम्र , ना कोई सीमा ना ही इंसानियत । बस क्रूरता का तांडव

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  6. Terrorism par paachimi desh ab apni soch badlein... aatankwad duniya ke liye cancer ki tarah hai...

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  7. आतंकवाद बढ़ते बढ़ते अनछुए देश की तरफ पूरी तरह छा गया है। आतंकवादियों के हमले की यह कार्यवाही उनके पूरी तरह घुसपैठ की ओर इशारा कर रही है। मेरा मानना है कि इस हमले के बाद पश्चिमी देश आतंकवाद की परिभाषा बदलने को सोचना शुरू कर देना चाहिए। भारत में भी 26/11 के बाद कई प्रभावित करने वाले हमले हुए। आतंकवादियों ने शुरुआत कर दी है। इसे रोकने के लिए आतंकवाद की एक परिभाषा और संयुक्त प्रयास करने होंगे।

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