बिहार में चुनाव का शोर खत्म हो चुका है। परिणाम आ चुके हैं। भारी बहुमत से चुनी गई नई सरकार छठ के बाद शपथ लेने जा रही है। बिहार की नईनवेली सरकार को ढेरों बधाई। "राज्य का चुनाव पर असर पूरे देश में" का स्लोगन इस राज्य के महत्व को दर्शाता है। इस चुनाव के समय कई तरह के घटनाक्रम सामने आए। पहले डीएनए और फिर पैकेज को लेकर विवाद जोड़ पकड़ा। चुनाव नजदीक आया तो बीफ खाने की आशंका में अखलाक का मारा जाना, गोहत्या, हरियाणा में दलितों के बच्चों को जलाने, एक दलित की थाने में रहस्यमय हालात में मौत, भाजपा नेताओं की अनर्गल बयानबाजी, महाराष्ट्र मेंटैक्सी और ऑटो ड्राइवरों को लाइसेंस मराठी भाषा जानने पर ही देने की घोषणा, बिहार से तमाम लोगों को घूमने के लिए महाराष्ट्र ले जाना, छोटा राजन की गिरफ्तारी, पाकिस्तान के खिलाफ बयानबाजी, मोहन भागवत का आरक्षण संबंधी बयान, लालू के मुंह में शैतान का घुसना, मोदी को ब्रहमपिशाच बताना आदि घटनाएं एक के बाद एक हुईं। बिहार चुनाव ने इन सभी मुद्दों को खुद में समेट लिया। इसका परिदृश्य राष्ट्रीय हो गया। कुछ तो बिहार का राजनीतिक चरित्र ही ऐसा है और कुछ बना दिया गया।
दिल्ली में असर : बिहार में मिली करारी हार का असर दिल्ली में अधिक दिखने वाला है। विपक्ष और अधिक आक्रामक होगा। राहुल गांधी के तेवरों को धार मिलेगी। उसपर भी नीतीश और लालू का साथ होगा। अब कोई चमतकार ही संसद सत्र को चला सकता है। पिछले सत्र का हश्र सभी देख चुके हैं। नतीजा महत्वपूर्ण विधेयक पास नहीं होंगे और आर्थिक सुधार और सरकार के सुधारवादी कदम अटकेंगे। जाहिर हैपूरा विपक्ष यही चाहता है। यह सरकार के कौशल की परीक्षा होगी कि किस तरह वह संसद सत्र को चला ले पाती है। सत्र के नहीं चलने पर देश और विदेश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दावों पर सवाल उठेंगे। अर्थव्यवस्था गोते लगाएगी और मंदी चली आएगी।
जीएसटी बिल : फिलहाल सरकार अर्थव्यवस्था के लिहाज से जीएसटी को महत्वपूर्ण कदम बता रही है। कांग्रेस विधेयक के वर्तमान स्वरूप का विरोध कर रही है। मानसून सत्र में इस बिल को पास कराने की योजना सरकार की थी पर ललित गेट जैसे मुद्दों के कारण सरकार इसे पास नहीं करा पाई। शीत सत्र में इस विधेयक पर महत्वपूर्ण फैसला होना हैलेकिन लग नहीं रहा है कि सरकार इस पर आगे बढ़ पाएगी। जीएसटी बिल पास हुए बिना सरकार देश विदेश में यह संदेश नहीं दे पा रही है कि वह आर्थिक एजेंडे के लिए दृढसंकल्पित है।
असम, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में चुनाव : आगे इनदोनों राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। बिहार में जिस तरह महागठब्ंधन किया गया, उसी को कांग्रेस वहां दुहराएगी और वोटों का ध्रुवीकरण करेगी। अभी असम में कांग्रेस मुसीबत में है। उसके विधायक लगातार दूर होते जा रहे हैं और यह स्थिति अभी और विकराल होगी। इसलिए कांग्रेस इस पर लगाम लगाने के लिए कोई कोर कसर छोड़ना नहीं चाहेगी। उसके बाद पश्चिम बंगाल में चुनाव होने हैं। वहां अभी यह कहना मुश्किल है कि कांग्रेस के कहने पर तृणमूल कांग्रेस महागठबंधन करेगी लेकिन तब के हालात केमद्देनजर अगर ऐसा हुआ और वामपंथी भी साथ आ गए तो भाजपा के लिए और मुसीबत हो जाएगी। हालांकि वहां पार्टी को खोने के लिए कुछ भी नहीं है लेकिन फिलहाल वहां पार्टी को कुछ उम्मीद की किरण दिख रही है। यही हाल उत्तर प्रदेश का हो सकता है। कांग्रेस चाहेगी कि मायावती और मुलायम सिंह यादव साथ आ जाएं और दोनों के साथ उसका महागठबंधन हो जाए। अगर उत्तर प्रदेश में ऐसा हुआ तो पार्टी को लेने के देने पड़ जाएंगे। उत्तर प्रदेश में भी अभी यह कहना मुश्किल होगा कि मुलायम और मायावती साथ आ जाएंगे लेकिन राजनीति में कब क्या हो जाए, कुछ नहीं कहा जा सकता।
अपनों के निशाने पर : दिल्ली के बाद से ही हैंगओवर हो चुकी भाजपा अब बिहार चुनाव में मिली हार के बाद लॉग ऑफ हो चुकी है। पार्टी में अब अंतर्विरोध उभरेंगे। अपने पराये होंगे। एक दूसरे की आलोचना करेंगे। विरोधियों को नहीं, अपनों को निशाना बनाएंगे। पार्टी और भटकेगी। किनारे हो चुके नेता हमलावर होंगे। पार्टी को इस संकट से जल्द से जल्द मुक्ति पानी होगी। नहीं तो आगे आने वाले चुनावों में भी पार्टी के सामने यही दिक्कतें सामने आएंगी। बड़बोलेपन पार्टी के लिए सबसे अधिक खतरा बनकर उभरा है। माइक देखते ही भाजपा नेता बौरा जा रहे हैं। किस नेता को क्या बोलना है यह तय ही नहीं है। कोई भी कुछ भी बोल रहा है और चर्चा पा जा रहा है। उससे भी अधिक चर्चा में आ रहा है उनका बयान, जिस पर पार्टी की छीछालेदर हो रही है। लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, संजय जोशी, यशवंत सिन्हा, जसवंत सिंह, शांता कुमार, अरुण शौरी, रामजेठमलानी, सुधींद्र कुलकर्णी आदि अब पार्टी नेतृत्व पर तीखे हमले कर रहे हैं।
सहयोगी होंगे हमलावर : बिहार चुनाव में मिली हार से पहले से ही शिवसेना सरकार को आड़े हाथ ले रही थी। बिहार चुनाव का परिणाम आने के बाद से पार्टी भाजपा को ताने अधिक नसीहत कम दे रही है। महाराष्ट्र में तनातनी इतनी बढ़ चुकी है कि बात समर्थन वापसी की भी होने लगी है। दोनों पार्टियां वहां एक दूसरे को आंख तरेर रही हैं। हालात इतनी जल्दी सुधरेंगे, इसकी उम्मीद कम है।
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