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भाजपा का ‘विचित्र किन्तु सत्य’

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भाजपा के बारे में टिप्पणी की थी : विचित्र किन्तु सत्य। उस समय तो वह टिप्पणी राजनीतिक थी और उसे राजनीतिक दृष्टि से ही देखा गया था पर बदले हालात में यह टिप्पणी कम से कम भाजपा के बारे में सत्य साबित हो रही है।

भाजपा के लिए पहला विचित्र किन्तु सत्य है पत्रकारों की माइक। माइक देखते ही भाजपा नेता बौरा जाते हैं और अपनी हद भूल जाते हैं। माइक के सामने सब बोलते हैं। कोई भी यह नेता नहीं कहता कि यह बात हमारे हद से बाहर है। यह विचित्र किन्तु सत्य या तो अनुशासनहीनता है या फिर पार्टी की रणनीति। दोनों ही स्थितियों में पार्टी के लिए यह हास्यास्पद है, क्योंकि भाजपा पार्टी विद डिफरेंस और अत्यधिक अनुशासन का ढिंढोरा पीटती रही है। अनुशासनहीनता है तो फिर पार्टी को कार्रवाई करनी चाहिए और अगर यह रणनीति का हिस्सा है तो यह रणनीति बदलनी चाहिए।

भाजपा के दूसरे और विचित्र किन्तु सत्य हैं शॉटगन शत्रुघ्न सिन्हा। लगता है कि पार्टी के पास उनको चुप कराने का कोई उपाय नहीं बचा है। वे लगातार पार्टी नेतृत्व को एक तरह से चुनौती दे रहे हैं कि अगर दम है तो कार्रवाई करके दिखा। शायद ही कोई दिन ऐसा बाकी हो, जिस दिन शॉटगन पार्टी को चुनौती न देते हों। उनका दावा है कि वाजपेयी मंत्रिमंडल में जहाजरानी मंत्री के रूप में उनका कोई उल्लेखनीय काम हो न हो, उन पर कोई दाग नहीं लगा। इस आधार पर उन्हें मंत्री बनाया जाना चाहिए। दूसरी ओर पार्टी का कहना है कि इतना महत्वपूर्ण मंत्रालय होने के बाद भी उन्होंने कोई उल्लेखनीय काम नहीं किया। जनता उनको उनके काम से नहीं जानती है। अब भाजपा चाहती है कि शॉटगन पार्टी से खुद ही निकल जाएं। दूसरी ओर शॉटगन और उनके स्क्रिप्ट राइटर नीतीश कुमार चाहते हैं कि पार्टी उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दे। इससे नीतीश का एक सांसद बढ़ जाएगा और भाजपा उनकी सदस्यता रद नहीं करा पाएगी। अंतत: होना भी यही है लेकिन भाजपा अंत तक अपना एक सांसद खोना नहीं चाह रही, लेकिन तब तक पार्टी बहुत नुकसान उठा चुकी होगी।

भाजपा का तीसरा विचित्र किन्तु सत्य लोकसभा चुनाव में किए गए लोक-लुभावन वादे हैं। जैसे पार्टी ने वादा किया था कि विदेशों से कालाधन लाकर जनता में बांट दिया जाएगा। यह वादा राजनीतिक हलकों और सोशल मीडिया में चुटकुला बनकर रह गया है। इससे पार्टी मजाक का पात्र बनकर रह गई है। साथ ही इस विषय पर पार्टी नेताओं के उलजुलूल बयान ने भी काफी नुकसान पहुंचाया है। कई वरिष्ठ नेताओं ने तो इस वादे को महज जुमला ही करार दे दिया। इससे पार्टी के सारे वादे जनता की नजर में जुमले बनकर रह गए हैं और दिल्ली के बाद बिहार में भी शिकस्त खानी पड़ी।

हार्दिक पटेल भी भाजपा के लिए विचित्र किन्तु सत्य से कम नहीं हैं। इतनी बड़ी पार्टी एक युवक को काबू में नहीं कर पाई और अगले चुनाव के लिए वहीं विचित्र किन्तु सत्य पार्टी के लिए सिरदर्द साबित होने जा रहा है। हार्दिक को केजरीवाल मैनेज कर सकते हैं, नीतीश कुमार मैनेज कर सकते हैं लेकिन भाजपा मैनेज नहीं कर पाई।

बुजुर्गों की फौज भाजपा के लिए भी विचित्र किन्तु सत्य बन गई है। बुजुर्गों के बयान यदा कदा पार्टी के लिए मुसीबत खड़ी कर देते हैं और पार्टी कुछ नहीं कर पाती। एक तरफ राहुल गांधी बुजुर्गों को किनारे नहीं कर पा रहे हैं तो मीडिया में उनकी खिंचाई होती है और दूसरी तरफ भाजपा ने बुजुर्गों को किनारे कर दिया तो भी इसे गलत करार दिया जाता है। पार्टी न अपने बुजुर्गों को मैनेज कर पा रही है और न ही मीडिया को।

विचित्र किन्तु सत्य का सबसे बड़ा उदाहरण है भाजपा को मिला शिवसेना का साथ। शिवसेना किसी भी विपक्षी दल से अधिक भाजपा को परेशान करती है। शिवसेना समझती है कि भाजपा को परेशान करना ही उसका मकसद है। खासकर महाराष्ट्र चुनाव के बाद से शिवसेना यदा कदा ऐसी परिस्थितियां खड़ी करती रही है कि भाजपा को विपक्षी दल की कमी महसूस न हो। महाराष्ट्र में ही भाजपा को शिवसेना ने सहयोगी होकर जितना परेशान किया, उतना तो विपक्षी कांग्रेस और एनसीपी भी नहीं कर पाई। भाजपा ऐसे सहयोगियों से निजात पाने में तो फिलहाल विफल साबित हुई है।

‘इंडिया शाइनिंग’ याद है न। उसी का अपडेट वर्जन है ‘अच्छे दिन’। लग रहा है कि इंडिया शाइनिंग की तरह ही अच्छे दिन भी भाजपा का विचित्र किन्तु सत्य साबित होने जा रहा है। भाजपा की दिक्कत यह है कि नारे तो वह अच्छा खोज लेती है पर लोगों तक इसका लाभ नहीं पहुंचा पाती। इंडिया शाइनिंग की तरह अच्छे दिन के लाभ के लिए लोग तरस रहे हैं।

अटल बिहारी वाजपेयी अपने पूरे शासनकाल में भाजपा को नरेंद्र मोदी जितनी उपलब्धि नहीं दिला सके, सिवाय इसके नरेंद्र मोदी पार्टी के कई धड़ों में अस्वीकार्य हैं। अटल बिहारी के शासनकाल में भाजपा सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश से सत्ताच्युत हुई और कल्याण सिंह के बाद राम प्रकाश गुप्त मुख्यमंत्री बनाए गए। यही भाजपा के यूपी में पतन का काल था। उसके बाद भाजपा जो गिरी, उठ नहीं पाई। पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश की अधिकांश सीटें जीतने में कामयाब रही फिर भी नरेंद्र मोदी पार्टी के कुछ धड़े को नापसंद हैं। यह पार्टी का सबसे बड़ा विचित्र किन्तु सत्य है। इस विचित्र किन्तु सत्य से पीछा छुड़ाना होगा।

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