आप बिहार चुनाव में मिली करारी हार के लिए भाजपा की रणनीति को दोष दीजिए। अमित शाह के बिहार में कैंप करने का मजाक उड़ा लीजिए। मोदी की ताबड़तोड़ रैली की खिल्ली उड़ा लीजिए। मोदी के पैकेज देने के तरीकों पर सवाल उठाइए। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण की समीक्षा संबंधी बयान पर सारा ठीकरा फोड़ दीजिए। गाय और अखलाक विवाद को भी बिहार चुनाव परिणाम से जोड़कर मजा ले लीजिए पर इतना जान लीजिए कि ये सब नहीं होता तब भी बिहार चुनाव का परिणाम यही आने वाला था। हां, थोड़ा कम और अधिक होने की गुंजाइश हो सकती थी। ये सोचने से कि अगर ऐसा होता तो वैसा होता और वैसा होता तो ऐसा होगा, गलत होगा।
बिहार में जाति आधारित चुनाव होते रहे हैं। यह चुनाव भी विशुद्ध जातीय आधार पर लड़ा गया। महागठबंधन ने जाति आधारित व्यूह रचना की तो एनडीए ने संप्रदाय आधारित। गलत और सही पर न जाइए। चुनावों में हर पार्टी की अपनी अपनी रणनीति होती है, जो गलत भी होती है और सही भी। खैर ये सब देखना चुनाव आयोग का सिरदर्द है। महागठबंधन की व्यूह रचना, जो लोकसभा चुनाव के बाद से ही मूर्त रूप लेने लगी थी, वो प्रथम दृष्टया ही प्रभावी लग रही थी। आधार वोट के रूप में महागठबंधन के पास 25 प्रतिशत मुसलमान, 14 प्रतिशत यादव और 4 प्रतिशत कुर्मी मतदाता थे, जो कुल मिलाकर 43 प्रतिशत होते हैं। इसके जवाब में एनडीए के पास भूमिहार तीन प्रतिशत, ब्राह्मण 5 प्रतिशत, राजपूत 6 प्रतिशत, कायस्थ 1 प्रतिशत और महादलित 16 प्रतिशत कुल मिलाकर मात्र 31 प्रतिशत मतदाता आधार वोट के रूप में थे। एनडीए के तथाकथित महादलित वोटरों ने भी थोड़ा बहुत महागठबंधन के लिए मतदान किया लेकिन महागठबंधन के आधार वोट बैंक में से किसी ने भी एनडीए के लिए मतदान नहीं किया। एनडीए के साथ दिक्कत थी कि इनकी अगड़ी जाति के मतदाता वोट डालने न जाकर चाय पर चर्चा करते रहे। महागठबंधन का प्लस प्वाइंट ये रहा कि उसके अधिकांश मतदाता बूथों तक गए। एनडीए ने मुसलिम मतदाताओं को भटकाने के लिए कथित रूप से असदुद्दीन ओवैसी को आगे किया पर यह टोटका काम नहीं आया। टीवी की चर्चाओं पर न जाते हुए आप सीधे महागठबंधन के 43 प्रतिशत आधार वोट बैंक और एनडीए के 31 प्रतिशत आधार वोट बैंक का आंकड़ा मिला लीजिए। लोकसभा चुनाव में राजद, जदयू और कांग्रेस ने अलग अलग मिलकर चुनाव लड़ा था, इसलिए वोट बंट गए और भाजपा का रास्ता आसान हो गया। सही मायनों में देखा जाए तो चुनाव की इससे इतर विवेचना नहीं हो सकती।
अब आते हैं बिहार के तथाकथित विकास की कहानी पर। कहा ये जा रहा है कि नीतीश ने बिहार को पटरी पर ला दिया। शासन प्रशासन सशक्त हो गया है। सड़कें दुरुस्त हो गई हैं। अपराधों में कमी आई है। शिक्षा व्यवस्था में सुधार आया है। कहना गलत नहीं होगा कि ऐसी खबरें पीआर बेस होती हैं। एक बात और भी कि लालू राज में कोई काम ही नहीं हुआ। उसके बाद कोई भी सरकार थोड़ी भी काम करती तो उसका नाम होता। नीतीश कुमार को इसी का फायदा मिला। आइए हकीकत भी जान लेते हैं। हालांकि अब नई सरकार गठित होने जा रही है और इन आंकड़ों का कोई मतलब भी नहीं है लेकिन लोगों के लिए यह जानना बहुत जरूरी है।
कहां है सुशासन
सड़क : कहा जा रहा है कि बिहार में सड़कों के मामलों में उल्लेखनीय प्रगति हुई है और यह सही भी है। लेकिन यह उतना भी सही नहीं है जितना प्रचारित किया गया। सड़कों की दुर्दशा मध्य बिहार में काफी हद तक सुधरी। गांव-गांव सड़क बन गए। जहां सड़कों की हालत खस्ता था, वो सब दुरुस्त हो गए। दिल्ली से पटना का दौरा करने वाले पत्रकार इन्हीं सड़कों को देखकर मंत्रमुग्ध हो जाते थे। उत्तर बिहार में सड़कों की हालत सुधारने की जहमत न नीतीश सरकार ने उठाई और न इस पर दिल्ली से आने वाले पत्रकारों की नजर पड़ी। नतीजा पूरा उत्तर बिहार सड़कों के मामलों में ठगा महसूस कर रहा है। कागजों में भी देखें तो जहां सड़क बनाने का राष्ट्रीय औसत 0.66 किलोमीटर/स्क्वायर किलोमीटर है, वहीं बिहार में यह औसत 0.44 पर आकर ठिठक जाती है।
शिक्षा व्यवस्था : शिक्षा की बात करें तो बिहार पूरे देश में नीचे से दूसरे पायदान पर है। नगालैंड और सिक्किम जैसे राज्य बिहार को शिक्षा के मामले में पछाड़ते नजर आ रहे हैं। अंडमान निकोबार द्वीपसमूह से भी हम मीलों पीछे हैं। शिक्षकों की भर्ती पिछले दस साल में नहीं हुई है। सिर्फ पैरा टीचर की बहाली हुई है। कई स्कूल तो पैरा टीचर और शिक्षामित्रों के भरोसे चल रहे हैं। प्रधानाध्यापकों की पूरी पीढ़ी समाप्त हो चुकी है। अब स्कूलों के प्रधानाचार्य या तो प्रभारी के रूप में हैं या फिर नाम के। कई स्कूलों के प्रधानाचार्यों को विताधिकार ही नहीं है और ढिढोरा पीट रहे हैं कि बिहार में शिक्षा व्यवस्था पटरी पर आ गई है। अब भी बिहार की साक्षरता दर 63.82 प्रतिशत है। लड़कियों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करने के उल्लेखनीय प्रयास हुए लेकिन जब स्कूलों में शिक्षक ही नहीं होंगे तो बच्चे क्या बोर्ड देखकर पढ़ाई करेंगे।
अपराध : नि:संदेह बिहार में नीतीश सरकार के शुरुआती दिनों में अपराध पर काफी हद तक अंकुश लगा। दोपहर बाद जिन इलाकों में दरवाजे लॉक हो जाते थे, वहां रात में भी आना जाना सुगम हो गया लेकिन बाद के दिनों में हालात खराब होते चले गए। हालांकि वैसा अब शायद ही होगा, जैसा लालू यादव के कार्यकाल में हुआ था लेकिन गुंडों के मनोबल तो बढ़ेंगे ही। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों में बिहार के अपराध को देखा जाए तो लालू राज की तुलना में रेप के केसों में गिरावट दर्ज की गई है लेकिन अपहरण और फिरौती के मामलों में पांच गुने का इजाफा हुआ है।
लिंगानुपात : अब बात करते हैं लिंगानुपात की। इसमें भी बिहार पूरे देश में 12वें स्थान पर है। 1084 लड़कियां/1000 लड़कों के साथ केरल पहले स्थान पर काबिज है। यहां तक कि झारखंड और छत्तीसगढ़ भी इस मामले में बिहार को पछाड़े हुए हैं। हिमाचल प्रदेश और ओडिशा जैसे छोटे राज्य भी बिहार से मीलों आगे हैं। ऐसे बहुत से मुद्दे हैं, जिन्हें रखकर विकास के दावे को खारिज किया जा सकता है।
सीधी सी बात है। बिहार की जाति व्यवस्था और उसकी व्यूह रचना आज भी लालू के इतर घूमती है। मुसलिम और यादव के साथ कुर्मी और कांग्रेस के परंपरागत मतदाताओं का फोरन पड़ जाने से एक विशालकाय जाति समूह एक सूत्र में बंधी और रिजल्ट सामने है। कहीं कोई विकास का फैक्टर नहीं है। न नरेंद्र मोदी का विकास और न ही नीतीश कुमार का विकास। अगर सुशासन और विकास फैक्टर ही होता तो नीतीश लालू के साथ जाने का कष्ट नहीं करते। वो तो मरता क्या न करता वाली कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं। उनके सामने कोई विकल्प नहीं था। आगे अगर नीतीश ने लालू के सामने समर्पण किया तो यह उनके लिए राजनीतिक आत्महत्या होगी और अगर उन्होंने लालू को ठेंगे पर रखा तो सरकार पांच साल नहीं चल पाएगी।
आप माने या न माने जे बासे के बीच में।
अब आते हैं बिहार के तथाकथित विकास की कहानी पर। कहा ये जा रहा है कि नीतीश ने बिहार को पटरी पर ला दिया। शासन प्रशासन सशक्त हो गया है। सड़कें दुरुस्त हो गई हैं। अपराधों में कमी आई है। शिक्षा व्यवस्था में सुधार आया है। कहना गलत नहीं होगा कि ऐसी खबरें पीआर बेस होती हैं। एक बात और भी कि लालू राज में कोई काम ही नहीं हुआ। उसके बाद कोई भी सरकार थोड़ी भी काम करती तो उसका नाम होता। नीतीश कुमार को इसी का फायदा मिला। आइए हकीकत भी जान लेते हैं। हालांकि अब नई सरकार गठित होने जा रही है और इन आंकड़ों का कोई मतलब भी नहीं है लेकिन लोगों के लिए यह जानना बहुत जरूरी है।
कहां है सुशासन
सड़क : कहा जा रहा है कि बिहार में सड़कों के मामलों में उल्लेखनीय प्रगति हुई है और यह सही भी है। लेकिन यह उतना भी सही नहीं है जितना प्रचारित किया गया। सड़कों की दुर्दशा मध्य बिहार में काफी हद तक सुधरी। गांव-गांव सड़क बन गए। जहां सड़कों की हालत खस्ता था, वो सब दुरुस्त हो गए। दिल्ली से पटना का दौरा करने वाले पत्रकार इन्हीं सड़कों को देखकर मंत्रमुग्ध हो जाते थे। उत्तर बिहार में सड़कों की हालत सुधारने की जहमत न नीतीश सरकार ने उठाई और न इस पर दिल्ली से आने वाले पत्रकारों की नजर पड़ी। नतीजा पूरा उत्तर बिहार सड़कों के मामलों में ठगा महसूस कर रहा है। कागजों में भी देखें तो जहां सड़क बनाने का राष्ट्रीय औसत 0.66 किलोमीटर/स्क्वायर किलोमीटर है, वहीं बिहार में यह औसत 0.44 पर आकर ठिठक जाती है।
शिक्षा व्यवस्था : शिक्षा की बात करें तो बिहार पूरे देश में नीचे से दूसरे पायदान पर है। नगालैंड और सिक्किम जैसे राज्य बिहार को शिक्षा के मामले में पछाड़ते नजर आ रहे हैं। अंडमान निकोबार द्वीपसमूह से भी हम मीलों पीछे हैं। शिक्षकों की भर्ती पिछले दस साल में नहीं हुई है। सिर्फ पैरा टीचर की बहाली हुई है। कई स्कूल तो पैरा टीचर और शिक्षामित्रों के भरोसे चल रहे हैं। प्रधानाध्यापकों की पूरी पीढ़ी समाप्त हो चुकी है। अब स्कूलों के प्रधानाचार्य या तो प्रभारी के रूप में हैं या फिर नाम के। कई स्कूलों के प्रधानाचार्यों को विताधिकार ही नहीं है और ढिढोरा पीट रहे हैं कि बिहार में शिक्षा व्यवस्था पटरी पर आ गई है। अब भी बिहार की साक्षरता दर 63.82 प्रतिशत है। लड़कियों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करने के उल्लेखनीय प्रयास हुए लेकिन जब स्कूलों में शिक्षक ही नहीं होंगे तो बच्चे क्या बोर्ड देखकर पढ़ाई करेंगे।
अपराध : नि:संदेह बिहार में नीतीश सरकार के शुरुआती दिनों में अपराध पर काफी हद तक अंकुश लगा। दोपहर बाद जिन इलाकों में दरवाजे लॉक हो जाते थे, वहां रात में भी आना जाना सुगम हो गया लेकिन बाद के दिनों में हालात खराब होते चले गए। हालांकि वैसा अब शायद ही होगा, जैसा लालू यादव के कार्यकाल में हुआ था लेकिन गुंडों के मनोबल तो बढ़ेंगे ही। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों में बिहार के अपराध को देखा जाए तो लालू राज की तुलना में रेप के केसों में गिरावट दर्ज की गई है लेकिन अपहरण और फिरौती के मामलों में पांच गुने का इजाफा हुआ है।
लिंगानुपात : अब बात करते हैं लिंगानुपात की। इसमें भी बिहार पूरे देश में 12वें स्थान पर है। 1084 लड़कियां/1000 लड़कों के साथ केरल पहले स्थान पर काबिज है। यहां तक कि झारखंड और छत्तीसगढ़ भी इस मामले में बिहार को पछाड़े हुए हैं। हिमाचल प्रदेश और ओडिशा जैसे छोटे राज्य भी बिहार से मीलों आगे हैं। ऐसे बहुत से मुद्दे हैं, जिन्हें रखकर विकास के दावे को खारिज किया जा सकता है।
सीधी सी बात है। बिहार की जाति व्यवस्था और उसकी व्यूह रचना आज भी लालू के इतर घूमती है। मुसलिम और यादव के साथ कुर्मी और कांग्रेस के परंपरागत मतदाताओं का फोरन पड़ जाने से एक विशालकाय जाति समूह एक सूत्र में बंधी और रिजल्ट सामने है। कहीं कोई विकास का फैक्टर नहीं है। न नरेंद्र मोदी का विकास और न ही नीतीश कुमार का विकास। अगर सुशासन और विकास फैक्टर ही होता तो नीतीश लालू के साथ जाने का कष्ट नहीं करते। वो तो मरता क्या न करता वाली कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं। उनके सामने कोई विकल्प नहीं था। आगे अगर नीतीश ने लालू के सामने समर्पण किया तो यह उनके लिए राजनीतिक आत्महत्या होगी और अगर उन्होंने लालू को ठेंगे पर रखा तो सरकार पांच साल नहीं चल पाएगी।
आप माने या न माने जे बासे के बीच में।
Bilkul Sahi aaklan kiya hai jatiya factor ne role play kiya hai
जवाब देंहटाएंवोट पिछली बार भी नीतीश के नाम पर पड़े और इस बार भी। अगर जाति ही मुद्दा होती तो मांझी और पासवान की नैय्या नहीं डूबनी चाहिए थी। मिथिला और भागलपुर के इलाकों में बड़ी संख्या में मौजूद तथाकथित फॉरवर्ड वोटर्स पूरी तरह से बीजेपी के साथ जाने चाहिए थे। अगर नीतीश बीजेपी के साथ बढ़िया प्रदर्शन करें तो वोट जातिवाद के खिलाफ और अगर बीजेपी के खिलाफ अच्छा करें तो जातिवाद। मानिये या नहीं मानिये सर बीजेपी के भी कई सपोर्टर्स नीतीश को ही सीएम देखना चाहते थे। कई पोल में भी नीतीश सबके पसंदीदा उम्मीदवार के रूप में उभरे थे।
जवाब देंहटाएंमांझी और पासवान के वोटर कहीं भी निर्णायक स्थिति में नहीं होते। अगर ऐसा होता तो पासवान के साथ हमेशा 10 से 20 विधायक होते। दलित वोट हर जगह वैल्यू एडीशन की तरह है। बिना किसी के साथ जुड़े वे जीत नहीं दिला सकते। और महादलित तो नीतीश को ही नेता मानते हैं मांझी को नहीं। क्योंकि नीतीश ने ही महादलितों की श्रेणी बनाई थी। भागलपुर में अगर फॉरवर्ड वोटर निर्णायक भूमिका में होते तो शाहनवाज हुसैन लोकसभा चुनाव में नहीं हारते। उस चुनाव में तो तथाकथित मोदी लहर चल रही थी। रही बात नीतीश के भाजपा और राजद के साथ होने की तो पसमांदा मुसलमान हमेशा नीतीश को पसंद करते रहे हैं। पसमांदा मुसलमानों के उदारवादी वोटर हैं। ऐसा नहीं है कि यादवों ने कभी नीतीश को अपना नेता माना हो या फिर यादव भाजपा में शिफ़ट हो गए हों। हां, लालू यादव के जेल जाने के बाद से यादव भटक जरूर गए थे। एक बार और हरियाणा में यही स्थिति थी बिहार की तरह। वहां भी सीएम के रूप में कोई चेहरा नहीं था। उस समय हुड़डा ही सबसे लोकप्रिय मुख्यमंत्री के रूप में पसंद किए जाते थे। जब किसी को मौका ही नहीं मिलेगा तो कैसे लोग लोकप्रिय चेहरा मानेंगे।
हटाएंसिद़धार्थ जी, कमेंट के लिए शुक्रिया। ऐसे ही मनोबल बढ़ाए रखिए।
हटाएंKul milakr ye kha ja sakta hai bihar ki janta ek ese gande nale me fas chuki hai jisse wo bahr nikalna hi nhi chati.....Or ji kuch 5-10% nikalna bhi chate hai to unke pass itne vote nhi hote jo shi candidate ko jeet dila sake....Or rhi shi kasar upper cast ke log kr dete hai joki vote krte hi nhi hai kyoki unki san jo km ho jayega.
हटाएंहर चुनाव में जीत के फैक्टर अलग अलग होते हैं। विकास, जाति, काम-धंधे के साथ हर चुनाव में किसी एक का टैम्पो जरूर बनता है और लोग उसी को वोट देने लगते हैं। जैसी हवा लोकसभा चुनाव मे मोदी की रही। कोई नहीं कह रहा था मोदी को इतनी सीट मिलेंगी, कुछ इसी तरह की हवा दिल्ली में चली। बस मोदी ओर उनकी टीम गलतियां करती गईं और नीतीश का माहौल बनता गया।
जवाब देंहटाएंसुनील जी, अमित शाह सहित मोदी जी के चंगू-मंगू उनका बेड़ा गर्क करके रहेंगे. जुबान पर काबू रखेंगे नहीं, मोदी के किए सारे काम धुल जाएंगे.
जवाब देंहटाएंइस बात से सहमत हूं। बड़बोलेपन पर लगाम लगाना पड़ेगा। नीतीश लालू को भी इतना बड़ा मैंडेंट संभालने के लिए बड़े पापड़े बेलने पड़ेंगे। उनदोनों को भी सावधान रहना होगा। ये बातें सभी पर लागू होती है।
हटाएंबिहार में मुस्लिम 25 प्रतिशत नहीं हैं. 16.5 प्रतिशत के आसपास है. 100 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम सात से 10 प्रतिशत ही हैं. इन सौ सीटों में 75 के करीब महागठबंधन को गयी है.
जवाब देंहटाएंyou r absolutely right.sarkar banti aur bigadatie hin log vahi rah jate. isliye isaan ko sahi kaam karna chiy.
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