सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

जो दिखा वो सच नहीं है!!!!




















ऐसा बहुत कम होता है कि जो दिखता है, वो सच नहीं होता लेकिन ऐसा होता है, यह भी एक सच है। सच न हो तब भी सच मान लीजिए कि यह एक सच है। बैक गियर लगाते हुए हम फिर मालदा और पूर्णिया की घटना को याद करना चाहेंगे। उस घटना में जो दिखाया गया, वो सच नहीं था। रोहित वेमुला की मौत के पीछे के कारणों को अनुमानित रूप से सच मान लिया गया, जबकि देखा किसी ने नहीं था। यहां हम कह सकते हैं कि जो नहीं दिखता, वो सच होता है। अब आते हैं दृश्य माध्यमों से खेले जाने वाले खेल पर। एक चैनल ने दिखाया कि जेएनयू में अफजल की बरसी मनाई गई और उस दौरान राष्ट्रविरोधी नारे लगाए गए। अगले ही दिन ऐसे ही एक कार्यक्रम में दिल्ली प्रेस क्लब में देशविरोधी नारों को हवा दी गई। बवाल मचना लाजिमी था, क्योंकि यहां सरकार वर्सेज अन्य नहीं, देश वर्सेज गद्दारों का हिट शो चल रहा था। लिहाजा न चाहते हुए भी अन्य चैनलों को इसे फॉलो करना पड़ा।

शतरंज में शह के बाद मात होता है लेकिन इस प्रकरण में मात के बाद शह का खेल खेला गया। बाकी चैनल मात खा गए लिहाजा उस न्यूज चैनल को सवालों के घेरे में लाने और गद्दारों को शह देने की भरसक कोशिश की गई। इसमें राष्ट्रविरोधी लाइन को भी नजरंदाज किया गया। एक वरिष्ठ पत्रकार ने अपने पोस्ट में लिखा: जेएनयू के उस कार्यक्रम में उस चैनल का रिपोर्टर क्या कर रहा था? वह अकेला ही वहां क्यों था? ऐसे कार्यक्रम न्यूज चैनल कब से कवर करने लगे? बाकी चैनलों के पत्रकार वहां क्यों नहीं थे? चैनल ने इस घटना को उजागर किया तो क्यों किया? इन सवालों के माध्यम से देश की एकता और अखंडता के प्रति संवेदना से भी खिलवाड़ किया गया। ये सवाल वैसे ही हैं, जैसे एक निर्लज्ज वकील बलात्कार पीड़िता से भांति-भांति के सवाल पूछता है। दरअसल वह वकील जिरह के दौरान सवाल नहीं पूछ रहा होता है, वह उस पीड़िता को भड़का रहा होता है, उकसा रहा होता है। वह वकील तब तक उस पीड़िता से सवाल करता है, जब तक पीड़िता लाज का दामन  छोड़ आक्रामक न हो जाए। वरिष्ठ पत्रकार महोदय की मंशा भी दरअसल वैसी ही प्रतीत हो रही थी। उन्होंने एकबारगी यह नहीं कहा कि जेएनयू में जो हुआ, वह राष्ट्रद्रोह था और उस पर सरकार को सख्त कदम उठाए जाने चाहिए।

तीन दृश्य आपके सामने है: मालदा-पूर्णिया, रोहित वेमुला और जेएनयू प्रकरण। मालदा और पूर्णिया में वीडियो सामने था पर कहा गया कि वो सही नहीं था। रोहित वेमुला में कोई वीडियो नहीं था। उसमें कहा गया कि सरकार के इशारों पर हत्या की गई। अधिकांश ने तो आत्महत्या पर भी सवाल उठाए। तीसरा प्रकरण जेएनयू सामने है। तमाम वीडियो आ रहे हैं। रोज एक नया वीडियो आ रहा है। कल तक किसी के पास वीडियो नहीं था पर अब हर चैनल का अपना अलग एक्सक्लूसिव वीडियो है। हर चैनल का अपना अलग सीन है। किसी वीडियो में शाम का सीन है तो किसी में दोपहर और किसी में सुबह का। दूसरी ओर सभी अपने अपने वीडियो पर हकीकत का मुहर ठोके पड़े हैं। एंकर चीख-चीखकर कह रहा है- हमारा वीडियो ओरिजिनल है। जाहिर है बाकियों का वीडियो फर्जी है। इसमें एक और बात गौर करने वाली है। एक वीडियो में राष्ट्रद्रोह होते देखा जा सकता है और बाकियों में राष्ट्रद्रोह का आरोपी भय, भूख और भ्रष्टाचार से आजादी की बात कर रहा है। अर्थार्थ क्या है, आपको बताने की जरूरत नहीं है।

अब आते हैं तकनीक के ‘कमाल’ पर। तकनीक का अधिक इस्तेमाल भी विनाश के रास्ते पर ले जाता दिख रहा है। ये कैसी तकनीक है कि असली नकली हो जाता है और नकली असली। हमारे और आपके विचारों के टकराने का गेटवे बन गया है तकनीक। फोटोशॉप्ड फोटो और एडिटेड वीडियो जनमानस की भावनाओं से खूब खिलवाड़ कर रहे हैं। इस पर अंकुश लगाने के प्रयास होते दिख नहीं रहे हैं। तकनीक के फर्जी प्रयोग के रूप  में ऐसा लावा इकट्ठा हो रहा है, जो एक दिन ज्वालामुखी बनकर भड़क उठेगा और हम सब उस विनाश के शिकार हो जाएंगे। विचारों का टकराव मेरिट पर होना चाहिए। उचित  मंच पर होना चाहिए। इसमें थोड़ी से छेड़खानी भी भयानक रूप धारण कर लेती है। आज हम जिस मोड़ पर खड़े हैं, वो इसी का नतीजा है। अपने बुद्धि विवेक पर संयम रखें। वर्चुअल दुनिया को वर्चुअल ही मानें। यथार्थ मानते ही आप धोखे का शिकार होंगे और आपका आक्रोश अपनी मंजिल और शिकार खोजने लगेगा।

बाकी तो जो है वो हइये है जे बासे के बीच में। 

टिप्पणियाँ

  1. सच तो मीलों दूर कहीं असहाय सा दुबका पड़ा है।

    जवाब देंहटाएं
  2. न्यूज़ चैनल खुद ही जज हैं, खुद ही वकील भी। अब यह सड़ांध बास मारने लगी है

    जवाब देंहटाएं
  3. It in nice. No favor, no fear. Truly impartial. But some facts are ready to be clear and transparent. You should raise that point which you feel true. Everyone should take a stand here,so that these things can be discouraged and suppressed. By the way, well done

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

#gaurilankesh : मौत हो तो ऐसी

मौत हो तो ऐसी। एक मिनट पहले तक जिन्हें कर्नाटक के बाहर बहुत अधिक नहीं जाना जाता था, उन्हें मरते ही पल भर में अनंत शोहरत हासिल हो गई। जगह-जगह मातमनुमा उल्लास-उत्सव मनाया जाने लगा। पिघलती मोमबत्तियां अगाध श्रद्धांजलि का भाव पैदा करने लगीं। देश की राजधानी दिल्ली में मातमपुरसी का आयोजन कर राजनीति की रोटियां सेंकी गईं और तमाम सेलिब्रिटी ने अपने जौहर दिखाए। क्या करें भाव भले मातम का न हो, माहौल तो मातम का था न। #gaurilankesh कर्नाटक की पत्रकार की हत्या की खबरें टीवी पर कुछ यूं फ्लैश की गईं: कर्नाटक की पत्रकार #gaurilankesh की हत्या, गौरी हिन्दूवादी राजनीति की धुर विरोधी थीं और भाजपा की नीतियों का विरोध करती थीं। मेरे दस साल के कैरियर में खबर फ्लैश करने का यह नया और आधुनिक तरीका लगा। गौरी लंकेश के बारे में यही पूरी जानकारी थी और उन्हें इससे अधिक समझने का मौका न तो मानस को दिया गया और न ही पत्रकारों ने खुद इसमें अपनी दिलचस्पी दिखाई। मुझे भी उनके बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं थी। लगा कि किसी महिला की हत्या कर दी गई होगी। मुझे क्या पता था कि इसमें बहुत मसाला है और इतना मसाला है कि स...

दिल्ली में हिंसा का 'सालाना जलसा'

दिल्‍ली में हिंसा अब सालाना जलसे की तरह हो गई है. पिछले साल नागरिकता कानून के नाम पर दिल्‍ली को भड़काया गया तो इस बार किसान आंदोलन के नाम पर दिल्‍ली को दहलाया गया. संभव है कि अगले साल कोई और बहाने से किसी और को आगे कर अपना उल्‍लू सीधा किया जाए. कुल मिलाकर सरकार को नवंबर के बाद सचेत हो जाना चाहिए, क्‍योंकि इसकी क्रोनोलॉजी समझना बेहद जरूरी है. वो तो खैर मनाइए कोरोना महामारी का कि दिल्‍ली का दंगा कंट्रोल हो गया, नहीं तो हम वो देखने वाले थे, जो कभी सोच भी नहीं सकते थे. ये जो तस्‍वीरें आप देख रहे हैं, वो आपको विचलित करने के लिए काफी हैं. गणतंत्र दिवस जैसे गौरवशाली दिन, जब हमें दुनिया को अपना गौरव दिखाना होता है, उस दिन को आंदोलन के नाम पर राष्‍ट्रीय शर्म बना दिया गया. एक तरफ जवान दुनिया के सामने अपना फौलादी इरादा जाहिर कर रहे थे तो दूसरी ओर, दिल्‍ली को दहलाने के लिए कुछ साजिशें कुछ कर गुजरने के लिए बेकरार हो रही थीं. तभी तो तय समय से पहले कई जगहों पर दिल्‍ली पुलिस की बैरिकेडिंग तोड़ने की खबरें आने लगीं. यह पहले से तय था कि आज का दिन भारी साबित होने वाला है, फिर भी सरकार और दिल्‍ली पुलि...

हमले अच्छे हैं!

ये कैसा इत्तेफाक है कि जिस आतंकवाद (टेररिज्म) से फ्रांस इस पूरे साल त्रस्त रहा, वहीं पर टेररिज्म शब्द इजाद किया गया था। टेररिज्म लैटिन शब्द टेरर से बना है, जिसका अर्थ भयभीत करना होता है। दरअसल फ्रांस में 1793 से 1794 के बीच के शासन को रिजिन ऑफ टेरर कहा जाता है। उस समय फ्रांस पर जैकोबिन का शासन था। उसके शासन को गाली देने के लिए तब के लोग इस शब्द का प्रयोग करने लगे। इस शब्द को और चर्चा उस समय मिली, जब 1869 में रूस के सर्गेई नेकावेव ने खुद पीपल्स रिट्रीब्यूशन की स्थापना कर खुद को टेररिस्ट घोषित कर लिया। यह वह वर्ष था, जब हमारे राष्ट्रपिता और अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी पैदा हुए थे। आज टेररिज्म शब्द अंतरराष्ट्रीय पटल पर काफी मशहूर शब्द है। क्यों? क्योंकि अब शक्तिशाली और दादा कहे जाने वाले देश भी इससे भयभीत हो चले हैं। पहले उनके लिए इस शब्द का कोई अर्थ ही नहीं था, क्योंकि आतंकवादियों की पहुंच इन तक नहीं थी लेकिन जब अंतरराष्ट्रीय आतंक के गुरु ओसामा बिन लादेन ने अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश पर भी हमला बोल दिया तब माना गया कि आतंकवाद जैसा भी कुछ होता है। विश्व बिरादरी में हाहाकार मच गय...