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संदेश

चुनाव और चुनौतियां

#आमचुनाव का साल है। एक को खोने का डर है तो दूसरे के लिए पाने की चुनौती है। दोनों का अपना अपना अंतर्द्वंद्व है, जिससे जूझते हुए जितना है। चुनाव से पहले कोई यह नहीं कह सकता कि किसका पलड़ा भारी है और किसका नहीं। अभी तो इस 'महाभारत' का 'पांचजन्य' फूंका जाना भी शेष है। शब्दबाण चलेंगे, जुबानें लड़खड़ाएंगी, फिसलेंगी, सवाली-जवाबी होगी, उड़नखटोला धूल उड़ाएंगी, पार्टियां रैली-रैली खेलेंगी, जनता समझेगी-बुझेगी। फिर फैसले की घड़ी आएगी। सांस धुकुर-धुकुर चलेगी। आघात लगेगा, प्रतिघात होगा। कोई राजा होगा और कोई रंक होगा। कोई सड़क पर तो कोई संसद में होगा। कोई मजलिस में होगा तो कोई मंत्री होगा। फिर चुनाव आएंगे, चुनौतियां भी आएंगी-जाएंगी। सिर्फ चुनाव और चुनावी मुद्दे को लेकर ऐसा होता है, यह सच नहीं है। हां, राजनीति का कैनवास जरूर बडा हो गया है। तभी तो गैर राजनीतिक मुद्दा भी राजनीति का केंद्र बन जाता है। प्रश्न का औरा बढ़ गया है और उत्तर उतना ही सतही प्रतीत हो रहा है। देश में इस समय #kathua कांड, #Unnav कांड, #AMU कांड, #Collegium कांड, #Kaveriwater, पश्चिम बंगाल में #Panchayatchunav, बिहार ...

चार 'पी' से देश में आ गया है भूचाल

वैसे तो अपने देश में किसी भी बात पर भूचाल आ जाता है। हालिया घटनाक्रम को देखें तो एक पकौड़ा भी देश मे भूचाल लाने के लिए काफी है। मुद्दों की दरिद्रगी और चर्चा में बने रहने की छटपटाहट ने विपक्षियों को पकौड़े पर सियासत करने को मजबूर कर दिया है। दूसरी ओर, बजट के बाद लगातार लुढ़कते और फिर संभलते बाजार को पंजाब नेशनल बैंक घोटाले से बड़ा झटका लगा है। इन सबके बीच अब तक अनाम-गुमनाम दक्षिण भारतीय अभिनेत्री प्रिया अचानक अपनी आंखों के करामात से नई सनसनी बनकर उभरती हैं और हर भारतीयों के मोबाइल में ठौर बना लेती हैं। कुल मिलाकर चार 'पी' ने यहां तहलका मचा रखा है: पद्मावत, पकौड़ा, प्रिया और पंजाब नेशनल बैंक। सबसे पहले बात करते हैं पद्मावत की। कुछ दिनों पहले तक पद्मावत ने देश की राजनीति को हिलाकर रख दिया था। संजय लीला भंसाली की इस फिल्म (पहले पद्मावती और बाद में पद्मावत) ने उत्तर और मध्य भारत के लगभग सभी राज्यों की राजनीति को प्रभावित करके रख दिया। हिंसक आंदोलन हुए और सुप्रीम कोर्ट तक को इसमें दखल देना पड़ा था। उसके बाद भी कई राज्यों में शुरुआती दौर में फ़िल्म का प्रदर्शन नहीं हो सका। कुछ राज्य...

एक तरफ वोटों का सूखा तो दूसरी तरफ मतदान का सावन

ऐसा लग रहा था कि हम वोटों के सूखे वाले क्षेत्र से मतदान की बारिश वाले इलाके में पहुंच गए। एक तरफ बूथ वोटरों के लिए तरस रहे थे तो दसूरी तरफ बूथों पर मतदाताओं की लंबी लाइन। शहर के कुछ बूथों का दौरा करने के बाद हम मिनी बाईपास होते हुए सीबीगंज, मथुरापुर और परसाखेड़ा की तरफ बढ़ रहे थे। रास्ते का एक-एक बूथ हमें शहर और देहात का अंतर समझा रहा था। मौसम भी मेहरबान था। ऐसा लग रहा था कि गुनगुनी धूप ठंड में दुबके लोगों को बाहर निकलकर वोट डालने के लिए उत्साहित कर रही है। मिनी बाईपास से गुजरते वक्त साफ नजर आ रहा था कि खांटी शहरी लोगों की अपेक्षा देहात के लोग कितने जागरूक होते हैं। इस रोड पर जहां कई किलोमीटर तक सन्नाटा पसरा हुआ था, वहीं जीके मांटेसरी स्कूल पर बने बूथ पर लगी भीड़ का कोलाहल उस सन्नाटे को खत्म कर रहा था। प्रत्याशियों के बस्ते पर जुटी भीड़ वोटर लिस्ट में खुद को तलाश रही थी। आगे हमें आईटीआई के पास बने बूथ के आसपास भी खासी भीड़ दिखी। रास्ते में जो भी बूथ मिले, वहां मतदाताओं की संख्या शहरी मतदाताओं को आईना दिखा रही थी। सीबीगंज, मथुरापुर और परसाखेड़ा होते हुए हम केंद्रीय मंत्री संतोष ...

#gaurilankesh : मौत हो तो ऐसी

मौत हो तो ऐसी। एक मिनट पहले तक जिन्हें कर्नाटक के बाहर बहुत अधिक नहीं जाना जाता था, उन्हें मरते ही पल भर में अनंत शोहरत हासिल हो गई। जगह-जगह मातमनुमा उल्लास-उत्सव मनाया जाने लगा। पिघलती मोमबत्तियां अगाध श्रद्धांजलि का भाव पैदा करने लगीं। देश की राजधानी दिल्ली में मातमपुरसी का आयोजन कर राजनीति की रोटियां सेंकी गईं और तमाम सेलिब्रिटी ने अपने जौहर दिखाए। क्या करें भाव भले मातम का न हो, माहौल तो मातम का था न। #gaurilankesh कर्नाटक की पत्रकार की हत्या की खबरें टीवी पर कुछ यूं फ्लैश की गईं: कर्नाटक की पत्रकार #gaurilankesh की हत्या, गौरी हिन्दूवादी राजनीति की धुर विरोधी थीं और भाजपा की नीतियों का विरोध करती थीं। मेरे दस साल के कैरियर में खबर फ्लैश करने का यह नया और आधुनिक तरीका लगा। गौरी लंकेश के बारे में यही पूरी जानकारी थी और उन्हें इससे अधिक समझने का मौका न तो मानस को दिया गया और न ही पत्रकारों ने खुद इसमें अपनी दिलचस्पी दिखाई। मुझे भी उनके बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं थी। लगा कि किसी महिला की हत्या कर दी गई होगी। मुझे क्या पता था कि इसमें बहुत मसाला है और इतना मसाला है कि स...

#Nitish #Laloo से और #sharad भयभीत थे #nitish से

इधर #Nitish महागठबंधन से पीछा छुड़ाकर एनडीए में जाने का बहाना तलाश रहे थे, उधर #Sharad Yadav यादव #Nitish से भयभीत होकर अलग रास्ता अख्तियार करने में जुटे थे। दोनों की अपनी वाजिब वजहें थीं। दरअसल शरद यादव को दूसरे जॉर्ज फर्नांडीस बन जाने का भय सता रहा था। खासकर पार्टी के अध्यक्ष पद से हटाए जाने के बाद से वे खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे थे। इधर नीतीश कुमार को भी लालू के साथ काम करने में उतना मजा नहीं आ रहा था। वे खुलकर उस तरह बैटिंग नहीं कर पा रहे थे, जिस तरह एनडीए के साथ रहकर वे किया करते थे। नीतीश के साथ रहकर लालू प्रसाद यादव दिनोंदिन मजबूत होते जा रहे थे। हालांकि केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई और घेरेबंदी से उन पर शिकंजा कसता जा रहा था पर राजनीतिक रूप से इसका कोई नुकसान लालू प्रसाद को न होकर नीतीश कुमार को हो रहा था। उनका एमवाई (मुस्लिम+यादव) समीकरण फिर से मजबूत हो रहा था। मजाकिया अंदाज में लालू प्रसाद नीतीश कुमार पर तंज भी कस देते थे और उसे बाद में अपने हिसाब से संशोधित भी कर लेते थे। इससे वे अपने वोटरों को संदेश देने में कामयाब हो रहे थे और नीतीश की लगातार छीछालेदर ...

बिना जनाधार वाला घाघ सरदार

नीतीश की समता पार्टी चुनाव लड़ती है। लगभग पूरा सफाया हो जाता है। फिर भाजपा से गठबंधन करते हैं और सीनियर पार्टनर और मुख्यमंत्री के दावेदार बनते हैं। नीतीश की जदयू 2014 का लोकसभा चुनाव अकेले लड़ती है। पूरी तरह खारिज हो जाती है। फिर लालू से गंठबंधन करते हैं। सीनियर पार्टनर और मुख्यमंत्री पद के दावेदार बनते हैं। महागठबंधन में सरकार चलाने से उनकी छवि पर छींटें पड़ते हैं और वे इन छींटों से बचने के लिए धुर विरोधी नरेंद्र मोदी की भाजपा की गोद में जा बैठते हैं। बिहार में चुनाव की दो धुरी भाजपा और लालू ही हैं लेकिन सरदार नीतीश बनते हैं. बिना जनाधार वाला सरदार. लोग रामविलास को मौकापरस्ती से जोड़ते हैं। सफल मौकपरस्ती के लिए दो बातों का होना जरूरी है। समय देखकर आप किसी से भी जुड़ जायें और आपको हर कोई खुद से जोड़ ले. नीतीश समय-समय पर सबसे जुड़े और समय-समय पर हर कोई उन्हें खुद से जोड़ने को तैयार रहता है लेकिन उन पर मौकापरस्त का टैग नहीं लगा। इसे घाघ राजनीतिज्ञ होना कहते हैं। बिना जनाधार वाला घाघ सरदार। नीतीश मुसलमानों की बात करते हैं और भाजपा के लंबे समय तक साझीदार रहे। नीतीश सवर्णों की भी...

मोनिका का दर्द और मेरा पत्रकारीय संतोष

मानसून की पहली बारिश में तन-मन से तर-बतर होकर ऑफिस पहुंचा ही था। रोज की तरह कम्प्यूटर ऑन किया। ब्राउजर पर जाकर एक के बाद एक पहले मेल आईडी, व्हाट्सएप, फेसबुक आदि पर लॉगइन किया। फेसबुक ओपन करते ही सामने जो तस्वीर थी, वो अधूरी होने के बाद भी जानी-पहचानी सी लगी। पोस्ट जागरण इंस्टीट्यूट में मेरी जूनियर रही मोनिका शेखर का था। चेहरे पर नाखुन के निशान काफी कुछ बयां कर रहे थे। उस पर ट्रेन में सीट के विवाद में उस समय हमला हुआ था, जब वह सीवान से नई दिल्ली के सफर पर थी। गोरखपुर और गोंडा के बीच हुए हमले के बाद भी ट्रेन की स्क्वायड से लेकर लखनऊ, बरेली, मुरादाबाद और यहां तक कि नई दिल्ली की रेल पुलिस पंगु बनी रही और एफआईआर दर्ज करने में आनाकानी करती रही। यह हाल तब था, जब कहीं से कोई राहत न मिलने पर मोनिका ने रेल मंत्री को ट्वीट किया था। मोनिका के पोस्ट को देखने के बाद मुझे लगा कि उसके लिए कुछ करना चाहिए। तब तक मैं मुत्तमईन नहीं था कि वह ट्रेन मेरे कार्यक्षेत्र बरेली से होकर गुजरी होगी। उधेड़बुन के बीच मैं अपना काम करता रहा पर ध्यान खामख्वाह उस पोस्ट पर चला ही जा रहा था। मैं बार-बार उसे पोस्ट क...