#आमचुनाव का साल है। एक को खोने का डर है तो दूसरे के लिए पाने की चुनौती है। दोनों का अपना अपना अंतर्द्वंद्व है, जिससे जूझते हुए जितना है। चुनाव से पहले कोई यह नहीं कह सकता कि किसका पलड़ा भारी है और किसका नहीं। अभी तो इस 'महाभारत' का 'पांचजन्य' फूंका जाना भी शेष है। शब्दबाण चलेंगे, जुबानें लड़खड़ाएंगी, फिसलेंगी, सवाली-जवाबी होगी, उड़नखटोला धूल उड़ाएंगी, पार्टियां रैली-रैली खेलेंगी, जनता समझेगी-बुझेगी। फिर फैसले की घड़ी आएगी। सांस धुकुर-धुकुर चलेगी। आघात लगेगा, प्रतिघात होगा। कोई राजा होगा और कोई रंक होगा। कोई सड़क पर तो कोई संसद में होगा। कोई मजलिस में होगा तो कोई मंत्री होगा। फिर चुनाव आएंगे, चुनौतियां भी आएंगी-जाएंगी। सिर्फ चुनाव और चुनावी मुद्दे को लेकर ऐसा होता है, यह सच नहीं है। हां, राजनीति का कैनवास जरूर बडा हो गया है। तभी तो गैर राजनीतिक मुद्दा भी राजनीति का केंद्र बन जाता है। प्रश्न का औरा बढ़ गया है और उत्तर उतना ही सतही प्रतीत हो रहा है। देश में इस समय #kathua कांड, #Unnav कांड, #AMU कांड, #Collegium कांड, #Kaveriwater, पश्चिम बंगाल में #Panchayatchunav, बिहार ...