मित्रों, मन की बात यह है कि मन बड़ा परेशान है। मैं मन की बात करता गया और आपलोग अनसुना करते गए। दिल्ली और बिहार मेरे हाथ से निकल गया। विरोधियों के साथ साथ अपनों की उँगलियाँ भी उठने लगी हैं। वे उँगलियाँ भी उठने लगी हैं, जो रोटी भी नहीं उठा पातीं। इसलिए व्यथित हूँ। अब आप लोग ही मेरा साथ नहीं देंगे तो कौन देगा? मित्रों, इस बार मन की बात को गौर से सुनिएगा। मैं रूस में था। वहां से काबुल होते हुए मुझे दिल्ली आना था। दिल्ली में वाजपेयी जी को जन्मदिन की बधाई देनी थी। काबुल में वहां की संसद को संबोधित करते हुए मैंने आतंकवाद पर इशारों में पकिस्तान को जमकर कोसा। फिर अचानक पाकिस्तान जाने का निर्णय ले लिया। संयोग से उसी दिन नवाज का जन्मदिन भी था। मई समझ सकता हूँ कि मेरे इस फैसले को लेकर क्या प्रतिक्रिया हुई होगी। क्या देश, क्या विदेश सभी हतप्रभ थे पर आपलोग तो जानते ही हैं कि इसी तरह मैंने बराक, शी और आबे को सरप्राइज़ दिया था। यह आज की विदेश नीति की मांग है। इसके परिणाम क्या होंगे, इसमें मैं नहीं जा रहा पर अटल जी की पहल को आगे बढ़ाते हुए मैंने उन्हें जन्मदिन का तोहफा देने की कोशिश की है। मित्र...