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झूठ की संवेदनाओं से आंसुओं का सैलाब न बहाइए













सीन एक 
राज्यसभा में कांग्रेस सांसद कुमारी शैलजा यह कहते हुए भावुक हो जाती हैं कि गुजरात के एक मंदिर में उन्हें इसलिए नहीं घुसने दिया गया, क्योंकि वह दलित हैं। वह रो पड़ती हैं और राज्यसभा में जोरदार हंगामा होता है।
क्या है सच : जिस मंदिर का जिक्र कुमारी शैलजा ने किया, वहां के विजिटर बुक में उन्होंने मंदिर की  तारीफ में कलम तोड़ दिए थे। भाजपा नेता अरुण जेटली ने इसका खुलासा किया तो न ही कांग्रेस पार्टी और न कुमारी शैलजा ने ही इसका खंडन किया।

सीन दो
सोमवार को संसद की कार्यवाही शुरू हुई तो कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने मुद्दा उठाया कि असम के एक मंदिर में आरएसएस वालों ने उन्हें नहीं घुसने दिया। इस पर भी सदन में काफी हंगामा हुआ और कांग्रेस के सदस्यों ने वाकआउट कर दिया।
क्या है सच :  शाम तक मंदिर के ट्रस्टी का भी बयान आ गया कि ऐसी कोई घटना ही नहीं हुई है। ट्रस्टी ने यह भी कहा कि मंदिर का संचालन ट्रस्ट करता है तो इसमें आरएसएस वाले कहां से आ गए।

यह नकारात्मक राजनीति है। 1800 ई. में अमेरिकी राष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनाव में इसका पहली बार इस्तेमाल किया गया था और इसका काफी व्यापक असर हुआ था। तब इसकी काफी आलोचना भी हुई थी। 1960 के दशक में अमेरिका में ही विज्ञापन की दुनिया में भी इसका प्रयोग किया गया था।  यह भी काफी सफल रहा  था पर इसकी भी काफी आलोचना हुई थी। भारत में अब इसका प्रयोग हो रहा है और सफल भी साबित हो रहा है। देश में इसकी शुरुआत करने का श्रेय तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी को जाता है। यूपीएस के शासनकाल में भाजपा ने भी इसका प्रयोग किया था और यही प्रयोग उसके लिए अब गले की हड्डी साबित हो रही है। फिलहाल देश में अरविंद केजरीवाल नकारात्मक राजनीति के पुरोधा बने हुए हैं और इसकी बदौलत ही उन्होंने शून्य से सत्ता तक का सफर तय किया है। इसलिए राजनीतिक दलों का इस ओर रुझान बढ़ गया है।

क्या है नकारात्मक राजनीति : नकारात्मक राजनीति को नकारात्मक प्रचार से समझा जा सकता है। कैसे दूसरों के प्रोडक्ट को खराब बताकर अपना प्रोडक्ट सेल किया जाता है। इसी तरह कैसे दूसरों के मुद्दो,  घोषणाओं में सौ कमियां निकालकर अपनी नीतियों की मार्केटिंग की जाती है।  इसमें झूठ, फरेब, मिर्च-मसाला आदि का भी सहारा लिया जाता है। जैसे : कुमारी शैलजा और राहुल गांधी ने आंसुओं का सहारा लिया। इसी तरह  गलत मुद्दों के आधार पर संसद को बंधक बना दिया गया। अपनी गलत बात मनवाने के लिए किसी सही मुद्दे को उससे जोड़कर उठाना भी नकारात्मक राजनीति है।

अरविंद केजरीवाल हैं पुरोधा : अन्ना आंदोलन के समय उमड़े जनसैलाब में क्षोभ और बदलाव के  भाव को अरविंद केजरीवाल ने पढ़ लिया था। अरविंद समझ गए थे कि वर्तमान व्यवस्था को जितना गाली दोगे, लोग उतने करीब आएंगे। उन्होंने भी  कई मिर्च मसाले का प्रयोग किया। कुछ सही मुद्दों की आड़ में उन्होंने 26 जनवरी को  झंडा न फहराने देने तक की चेतावनी दे डाली थी। उन्हें पता था कि वो जितना एक्सट्रीम पर जाएंगे, लोग उतना ही उनमें विश्वास करेंगे। वे सफल भी हुए। सत्ता में आने के बाद भी वे लगातार नकारात्मक राजनीति को धार दे रहे हैं। अपने ही एक मुद्दे को छोड़ वे दूसरे और तीसरे और चौथे मुद्दे को लगातार उठाकर जनता को सफलतापूर्वक भ्रमित करने में कामयाब हो रहे हैं।

केजरीवाल के शिष्य राहुल :  लोकसभा चुनाव और उसके बाद महाराष्ट्र, जम्मू कश्मीर, झारखंड और हरियाणा के चुनावों तक राहुल गांधी की अपनी दिशा थी, अपना लय था। अज्ञातवास के बाद से वे आक्रामक हुए हैं। इसे आक्रामकता की संज्ञा दी जा सकती है या दी जा रही है पर राजनीतिक विज्ञान में यह नकारात्मक राजनीति के शिष्य बनकर उभरे हैं। वे लगातार केजरीवाल की नकल कर रहे हैं।

बड़े चेहरे पर लगातार हमले : विज्ञापन की दुनिया हो या प्रचार की, बड़े ब्रांड पर लगातार हमलावर रुख बरकरार रखना भी नकारात्मक राजनीतिक का हिस्सा है। अरविंद केजरीवाल ने पहले ही इस बात को समझ लिया था। देर सबेर राहुल भी इसे समझ गए या कोई उन्हें समझा ले गया। प्रचार का सिद्धांत है कि बड़े ब्रांड पर हमला करो, खुद ही ब्रांड बन जाओगे।

इतिहास बताता है कि नकारात्मक राजनीति लंबे समय तक अपना प्रभाव नहीं छोड़ पाती। भाजपा हो, तृणमूल कांग्रेस हो, कांग्रेस हो या फिर आम आदमी पार्टी ही क्यों न हो। एक निश्चित समय तक लोग आपकी तरफ आकर्षित होंगे पर लंबे समय तक लोगों को जोड़े रखने के लिए सकारात्मक राजनीति ही काम आती है। उम्मीद है कि राजनीतिक दल जल्द ही इस बात को समझ जाएंगे। जो पार्टी सत्ता में होती है, उसके लिए एक मर्यादा की सीमा खुद ब खुद बंध जाती है पर अरविंद केजरीवाल के लिए वह सीमा भी खत्म हो गई है। बिहार के चुनाव मेंप्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी ने नकारात्मक प्रचार पर फोकस किया तो रिजल्ट आप देख ही सकते हैं। ऐसे कई उदाहरण हैं जो सीख दे सकते हैं। झूठ की संवदनाओं से आंसुओं का सैलाब न बहाइए,  आपका सच ही आपको ब्रांड बनाएगा।

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