दिसंबर के दूसरे सप्ताह में कोर्ट से दो फैसले आए। दोनों हैरान करने वाले थे। एक फैसले में गांधी परिवार की ‘संप्रभुता’ को तगड़ी चुनौती मिली थी और दूसरे में हिट एंड रन मामले में सलमान खान बरी हो गए थे। दोनों फैसलों ने इसलिए हैरान किया कि देश में गांधी परिवार के बारे में ये माना जाता है कि वो किसी भी प्रकार की कार्रवाई से उपर है। दूसरा, अदालत द्वारा दोषी ठहराए गए सलमान खान एकाएक कैसे बेदाग हो सकते हैं।
खैर फैसले आए और छा गए। दोनों फैसलों के निहितार्थ तलाशे जाने लगे। तब तक संसद की कार्यवाही ने गति पकड़ी ही थी लेकिन कोर्ट के फैसले आने के बाद विधायिका का काम अवरूद्ध कर दिया गया। सोनिया गांधी का भी बयान आया- मैं इंदिरा गांधी की बहू हूं और मैं किसी से नहीं डरती। अगले दिन राहुल गांधी बोल पड़े - ये सारे फैसले राजनीतिक द्वेष में प्रधानमंत्री कार्यालय के दबाव में कराए जा रहे हैं। यह बयान सिर्फ एक बयान नहीं था और ऐसा बयान राहुल गांधी ही दे सकते थे। यह न्यायपालिका पर सीधा आक्षेप था। चूंकि परिवार को तगड़ी चुनौती मिली थी तो वे सुध बुध खो बैठे थे। अब चूंकि राहुल गांधी की तंग जिह्वा ने चाहे गलतबयानी ही की हो लेकिन कांग्रेसियों के लिए तो वह अंतिम लाइन होती है। मामला तूल पकड़ गया। इसी दौरान प्रधानमंत्री समेत तमाम मंत्रियों ने कांग्रेस पर न्यायपालिका को बदनाम करने की कोशिश की बात कह दी। बाकी विपक्षी दल भी कांग्रेस की रणनीति की आलोचना करने लगे तो पार्टी रक्षात्मक मुद्रा में आ गई। इस बीच शरद पवार ने यूपीए 2 का जिक्र करते हुए कह दिया कि सोनिया गांधी तब सुपर कैबिनेट के रूप में काम करती थीं। दबाव बना तो राहुल गांधी को बयान देना पड़ा कि पार्टी संशोधन होने पर जीएसटी का साथ देगी। इस दौरान सोशल मीडिया में सोनिया गांधी और राहुल गांधी की खूब किरकिरी हुई। इसी मुद्दे पर एक टीवी न्यूज कार्यक्रम में एंकर ने पूछा : क्या राहुल गांधी के लगाए गए आरोप सही हैं??? क्या है ये? एंकर साहिबा को पता नहीं कुछ पता भी था कि नहीं।
दूसरे फैसले की तो सीधे सीधे भर्त्सना होने लगी। टीवी, अखबार, सोशल मीडिया पर तीक्ष्ण बहस छिड़ गई। सलमान के बरी होने की वजह तलाशी जाने लगी। तत्कालीन मुख्यमंत्री और अब प्रधानमंत्री के साथ पतंग उड़ाने की तस्वीरें वायरल होने लगींं। लोग कहने लगे कि प्रधानमंत्री की नजदीकी काम आई है। टीवी चैनलों पर बाजाप्ता इस बारे में बहस होने लगी। हम क्या क्या सोचने लगे हैं? कौन सी पत्रकारिता कर रहे हैं? क्या दिल्ली से लेकर मुंबई तक के सभी जज प्रधानमंत्री के इशारे पर काम करते हैं? सलमान के केस में तथ्यों से छेड़छाड़ और अभियोजन पक्ष की लापरवाही मुद्दा नहीं बनी, प्रधानमंत्री के साथ सलमान का फोटो सेशन मुद्दा बन गया।
लोग भूल जाते हैं कि हमारे यहां कोर्ट रात को ढाई बजे भी न्याय का अंतिम कोना तलाश करता है। उस समय तो लोग सुप्रीम कोर्ट की दरियादिली और अपने देश की न्यायपालिका की खूबसूरती की दाद दे रहे थे और अब वहीं लोग अप्रत्याशित फैसला आने पर संवैधानिक संस्थाओं की किरकिरी कराने लगे। क्या वे मानकर बैठे थे कि गांधी परिवार के खिलाफ कोई फैसला नहीं आएगा और सलमान खान दोषी साबित हो ही जाएगा। इसी केस में सलमान खान दोषी साबित हो जाता तो कहा जाता कि वह मुसलमान है इसलिए उसे दोषी ठहराया गया। एक कहावत है : चित भी मेरी, पट भी मेरी और सिक्का मेरे बाप का।
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