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गुम होते जवाब


सवाल हावी हो रहे हैं और जवाब गुम। सवाल के जवाब में नए सवाल हैंपर जवाब नहीं है। छोटे सवाल के जवाब में बड़ा सवाल है। प्रश्नोत्तर की विधा प्रश्न और प्रश्न के खेल में दफन होती जा रही है। अब यह प्रश्न बड़ा हो चला है कि मेरा प्रश्न बड़ा है कि तुम्हारा। जवाब के कोई मायने नहीं हैं और जवाब कोई चाह भी नहीं रहा है।  ये कोई एक आदमी कर रहा है, एक संस्था कर रही है या फिर सरकार कर रही है, यह कहना गलत होगा। यह हम सब मिलकर कर रहे हैं। जो यह नहीं कर रहा है, हम उसका उपहास उड़ा रहे हैं, वैचारिक रूप से उस पर हमला बोल रहे हैं।  हम आपस में एक दूसरे की आवाज को दबाना चाहते हैं और अपनी आवाज को भी धार नहीं दे पा रहे हैं।

घोटाले का जवाब घोटाला है। मेरा घोटाला छोटा और तुम्हारा घोटाला बड़ा। मेरे राज्य में क्राइम कम और तुम्हारे राज्य में ज्यादा। मेरा राज्य अच्छा और तुम्हारा राज्य बुरा। मेरा अपराध छोटा और तुम्हारा अपराध फांसी पर चढ़ने लायक। बहस का दायरा इसी मेरे और तेरे में सिमटता जा रहा है। अखबार, टीवी और सोशल मीडिया के डिबेट में इसे लगातार बल मिल रहा है। तर्क गायब होता जा रहा है। जब सवाल नहीं होंगे तो तर्क कहां से होगा?  तर्क नहीं होगा तो अच्छा निष्कर्ष कैसे आएगा? किसी भी मुद्दे के पक्ष और विपक्ष में बहस का धु्रवीकरण हो रहा है। तीसरा पक्ष गायब होता जा रहा है। बीच का मत कोई मत नहीं है। इस बात को बल मिल रहा है कि या तो आप पक्ष में हैं या फिर विपक्ष में। अगर आप दोनों में से किसी तरफ नहीं हैं तो फिर आप कहीं नहीं हैं। यह अतिवाद है, जिसमें बीच का कोई रास्ता नहीं होता है।

सवाल यह है कि अखलाक को मार डालने की घटना के बाद क्यों किसी का मन विचलित नहीं होता?  यह तल्ख सवाल है, जो हम खुद से भी नहीं पूछ पा रहे हैं। गाय का मांस  खाने का आरोप लगाकर हम एक  आदमी को मार देते हैं और हमें कोई फर्क भी नहीं पड़ता। किस जमाने में हम जी रहे हैं आखिर। हम कबाइली हैं। घटना तो नई दिल्ली के पास हुईपर ऐसा लगा कि यह अफगानिस्तान के किसी शहर में हुई है। घटना का स्वरूप वैसा ही था, जैसा बोको हरम और सोमालियन डाकू अंजाम देते हैं। आईएसआईएस भी ऐसे ही घटनाओं को अंजाम देता है। खौफ और दहशत के छौंक सेपूरी तरह भरी हुई थी यह घटना। निर्भया के साथ वहशीपन होता है तो हम सड़कों पर निकल जाते हैं और अखलाक की मौत हमें झकझोर भी नहीं पाती। क्या अखलाक इतने का भी हकदार नहीं था? और क्या इतना करके हम अपने पापों का प्रायश्चित नहीं कर सकते थे? क्या अखलाक को मारने के बाद उठे सवालों का जवाब 1984 का दंगा है?

चौथा स्तंभ खासकर टीवी न्यूज चैनलों का रुख और भी घटिया हो चला है। जनसरोकार की खबर अब उनके लिए मायने नहीं रखती। रोजाना पक्ष और विपक्ष के बक बक को परोसना ही अब पत्रकारिता का धंधा रह गया है। हां, इतना एहसान वे जरूर करते हैं कि  बक बक को वे टाइम फ्रेम में परोसते हैं नहीं तो अझेल हो जाता। उसमें भी एंकर का सवाल जवाब कराने का तरीका और पूछने वाले सवालों की फेहरिस्त पर आप गौर करेंगे तो माथा पीट लेंगे। सवाल प्रायोजित भी होने लगे हैं। ऊपर इसका जिक्र करना रह गया था। कुछ एंकरों और नेताओं की ऑफ स्क्रीन बातचीत वायरल हो चुकीहै, जिसमें वे क्या बात करते हैं यह बताने की जरूरत नहीं है।  आप टीवी देखते हैं तो देखते रहिए। मना नहीं है पर अपना दिमाग भी लगाते रहिए, खपाते रहिए वरना आपकी सोच का बैंक बैलेंस ये टीवी वाले कब खंगाल लेंगे, आपको पता भी नहीं चलेगा। टीवी वाले हमें और आपको बांट रहे हैं। इनको भी तीसरा पक्ष पसंद नहीं है।

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