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मोदी से ताकतवर हैं जेटली



वाकई बहुत नाइंसाफी है रे। दुस्साहस दिखाने के चलते भाजपा ने कीर्ति को तो आजाद कर दिया लेकिन शत्रु को ‘खामोश’ करने का कोई नुस्खा अभी पार्टी के पास नहीं दिखता। कीर्ति के तल्ख तेवर तो हफ्ते भर से टीवी की टीआरपी बढ़ा रहे हैं, वहीं शत्रु पिछले कई महीनों से अपना गुबार निकालकर मोदी लहर के गुब्बारे में सूई घोंप रहे हैं। कीर्ति के साथ-साथ राजनीति को जानने समझने वाले भी पार्टी के इस कदम से भौंचक हैं। जब पार्टी कीर्ति आजाद पर कार्रवाई कर सकती है तो शत्रुघ्न सिन्हा, आरके सिंह, भोला सिंह आदि नेताओं पर क्यों नहीं? इन नेताओं ने तो सीधे-सीधे नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को चुनौती दे दी थी। फिर भी इन पर रहमोकरम समझ से परे है। तो क्या यह मान लिया जाए कि भाजपा में नरेंद्र मोदी पर हमला करना आसान है और अरुण जेटली को निशाना बनाना मुश्किल।

अभी तक पत्रकार लोग कलम इस मुद्दे पर तोड़ रहे थे कि नरेंद्र मोदी काफी शक्तिशाली प्रधानमंत्री हैं। कोई इसके खिलाफ लिख रहा था तो कोई इसके समर्थन में था लेकिन सरकार द्वारा उठाए गए पिछले कुछ कदमों को देखें तो प्रतीत होता है कि अरुण जेटली पार्टी और सरकार के लिए मास्टरमाइंड के रूप में काम कर रहे हैं। भूमि विधेयक बिल, जिसे लेकर सरकार की काफी किरकिरी हुई थी वो अरुण जेटली के दिमाग की उपज थी। जीएसटी बिल, जिसका मुख्यमंत्री रहते नरेंद्र मोदी विरोध किया करते थे, उसके लिए आज भाजपा ही हाथ-पैर मार रही है। इसके पीछे भी अरुण जेटली का हाथ है। आप ही बताइए, वित्त मंत्रालय अपने आप में भारी भरकम मंत्रालय है लेकिन मंत्रिपरिषद फेरबदल में प्रधानमंत्री ने आश्चर्यजनक कदम उठाते हुए वित्त के अलावा सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का अतिरिक्त कार्यभार भी अरुण जेटली को सौंप दिया। उस समय लोग इसे अरुण जेटली की प्रतिभा पर प्रधानमंत्री का भरोसा मानकर चल रहे थे लेकिन इन सब बातों को एक सूत्र में पिरोया जाए तो तस्वीर काफी हद तक साफ हो जाती है। पार्टी पर विपक्षी दबाव बनाते हैं या कोई आरोप लगाते हैं तो अरुण जेटली के नेतृत्व में ही आधे दर्जन मंत्री जवाब देने आते हैं। संसद में प्रधानमंत्री के बाद यदि भाजपा की कोई सबसे ज्यादा अधिकृत आवाज है तो वो अरुण जेटली की आवाज। मोदी की अनुपस्थिति में अरुण जेटली की बात को ही पार्टी में तवज्जो दी जाती है।

मोदी सरकार बनने के बाद से ही बिहारी बाबू पार्टी के खिलाफ लगातार बयानबाजी करते रहे हैं। कभी वे नरम तेवर से पेश आते हैं तो कभी अपने स्टाइल में।  कभी वे पार्टी की हिमायत करते हैं तो कभी सीधे नरेंद्र मोदी पर हमला करने की हिमाकत भी। मंत्री न बनाने के खिलाफ वे टीस जाहिर करते रहते हैं। कभी वे केजवरीवाल से मिलते हैं तो कभी नीतीश कुमार को विकास पुरुष बताते हैं। ट्विटर पर भी वे पार्टी पर हमलावर रुख अपनाए हुए हैं। बिहार चुनाव के दौरान भी जब पार्टी को उनकी जरूरत थी तो या तो पार्टी ने उनका इस्तेमाल नहीं किया या फिर वे खुद से इस्तेमाल नहीं हुए। बल्कि पार्टी के खिलाफ लगातार बयानबाजी करते रहे। बिहरी बाबू कभी ठंडा तो कभी गरम  वाली नीति पर चल रहे हैं। इतना सब होने के बाद भी पार्टी उन पर कार्रवाई नहीं कर पा रही है। आखिर क्यों? पार्टी की कौन सी नस दबाए बैठे हैं बिहारी बाबू?

बिहार चुनाव में टिकट बंटवारे के मुद्दे पर पूर्व गृह सचिव और आरा से सांसद आरके सिंह भी पार्टी पर हमलावर रहे। उन्होंने टिकटों की खरीद बिक्री तक के आरोप लगाए। परोक्ष रूप से उन्होंने पार्टी नेतृत्व पर भी उन्होंने हमला किया पर उन पर भी पार्टी ने कोई कार्रवाई नहीं की।  बिहार चुनाव के बाद पार्टी नेता भोला सिंह भी पार्टी पर हमलावर रहे लेकिन उन पर भी कोई कार्रवाई नहीं की गई। इसके अलावा, हरियाणा में अनिल विज और मुख्यमंत्री में तनातनी किसी से छिपी नहीं है। अनिल विज भी कई बार मुख्यमंत्री के खिलाफ अपनी भड़ास निकालते रहते हैं लेकिन उन पर भी आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।

सवाल यह है कि क्या अरुण जेटली भाजपा में नरेंद्र मोदी से अधिक ताकतवर हैं? मोदी के खिलाफ बोलने पर पार्टी ने संज्ञान नहीं लिया लेकिन अरुण जेटली के खिलाफ मुंह खोलते ही कीर्ति पार्टी से बाहर हो गए। यह बात कुछ हजम नहीं हो रही है लेकिन हजम तो करना ही पड़ेगा। नहीं तो हाजमा खराब हो जाएगा। आपको नहीं मानना है, मत मानिए। आप कहते रहिए कि अरुण जेटली तो चुनाव हार गए थे, वो भी बुरी तरह। फिर भी प्रधानमंत्री मोदी को जेटली में क्या दिखा जो इतना महत्व दिए जा रहे हैं। इसका जवाब तो भाई प्रधानमंत्री ही दे सकते हैं। तब तक आप अपना माथा खुजलाते रहिए। सिर पीटते रहिए और भन्नाते रहिए।

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