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संदेश

संविधान आपकी बपौती नहीं खड़गे साहब

‘संविधान में बदलाव किया गया तो देश में रक्तपात मचा देंगे।’ यही शब्द थे न लोकसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे का। खुद कांग्रेस पार्टी एक तिहाई से अधिक संविधान बदल चुकी है और जब खुद सत्त्ता से बाहर है तो इस तरह की चुनौती दे रही है। शायद कांग्रेस पार्टी यह मानती है कि संविधान पर सिर्फ और सिर्फ उसी का हक है और सिर्फ कांग्रेस पार्टी को ही संविधान में बदलाव का विशेषाधिकार है। आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि लागू होने के डेढ़ साल के भीतर ही 18 जून 1951 को पहला संविधान संशोधन किया गया। इसके दो साल बाद 01 मई 1953 को दूसरा संशोधन आया। आलम ये था कि इमरजेंसी से पहले तक कांग्रेस की सरकार संविधान में 35 संशोधन कर चुकी थी। इतना संशोधन तो सवा दो सौ साल पुराने अमेरिकी संविधान में अब तक नहीं हुए। अमेरिका के संविधान में अब तक मात्र 27 संशोधन ही हो पाए हैं। वहीं 1958 के बाद से अब तक फांस के संविधान में मात्र 22 संशोधन हुए हैं। स्विटजरलैंड का आंकड़ा तो दहाई से भी कम है। 1906 के बाद से अब तक वहां के संविधान में मात्र आठ संशोधन हो पाए हैं। बांग्लादेश के संविधान की उम्र हालांकि अपने देश के संविधान...

आपका शो का बिजनेस है, शो कीजिए, हमारा दिल मत तोड़िए

आधी रात तक उधेड़बुन में था। सोच रहा था कि महीने दिन पहले जो शब्द लोग बोल नहीं पाते थे वो अचानक आम बोलचाल की भाषा कैसे हो गई? कैसे उसे लेकर ट्वीट पर ट्वीट किया जा रहा है। फेसबुक पर पक्ष और विपक्ष में पोस्टों की अचानक बाढ़ आ गई है। इस पर बहस करते लोग अपना-पराया, भाई-भाई, गुरु शिष्य परंपरा को भी भूल जा रहे हैं। एक तरह का साइबर वार चल रहा है। टीवी की बहस जिस शब्द के बिना पूरी नहीं हो रही है उस शब्‍द का नाम है असहिष्णुता। वाकई बहुत ही असहिष्णु शब्द है ये। सुबह इसी शब्द के साथ नींद टूटी। हाथ मोबाइल को टटोलने लगा। सोचा कि इस विषय पर कुछ न कुछ नए पोस्ट या ट्वीट आए होंगे या रात के पोस्ट पर नए रिएक्शन आए होंगे। नोटिफिकेशन की लंबी लाइन लगी थी। एक एक कर देखने लगा। हर एक टवीट और हर एक पोस्ट पर तत्काल मन में रिएक्शन उभरते चले गए। आसपास का माहौल तो सहिष्णु था। बीवी चाय लेकर सामने थी और बच्चे अठखेलियां कर रहे थे। छोटी बेटी जय जय बजरंग बली वाला गाना गा रही थी। साथ ही बजरंगी भाईजान में मुन्नी के कैरेक्टर की मिमिक्री कर रही थी पर मेरा पूरा ध्यान मोबाइल पर टिका था। पत्नी के साथ चाय की चुस्की ली। रोज की...

बेचारा आमिर खान

हमें नाज है आमिर खान पर। कितना रिस्क लेकर इंडिया में रह रहा है बेचारा। ऊपर से पत्नी की बात भी नहीं मानी। ये तो डबल रिस्क हो गया। इतना बड़ा स्टार और इतना बड़ा रिस्क। बेचारा क्या करे। पत्नी की मानेगा तो हीरोपंथी ख़त्म हो जायेगी। नहीं मानेगा तो गृहस्थी ख़त्म। अब आप ही बताओ पत्नी की बात मानकर सीरिया, नाइजीरिया, अरब, इराक, ईरान, पाकिस्तान, तुर्की आदि देशों में जाकर क्या करेगा। फ्रांस पर हमले के बाद यूरोप में जो सहिष्णुता बढ़ी है उसके कारण यूरोप नहीं जा सकते। अमेरिका और कनाडा में तो इतनी  सहिष्णुता है कि वहां अक्सर खान बंधुओं को नंगे होकर स्कैनर से गुजरना पड़ता है। पत्नियां यही तो मौलिक और व्यवहारिक ज्ञान नहीं समझ पातीं। एक तो ऐसे ही इतना बड़ा रिस्क लेकर आदमी चल रहा है ऊपर से देश छोड़ने का टेंशन। राय देना बड़ा आसान है और उस पर अमल करना उतना ही मुश्किल। बेचारे की सभी पिक्चर इस समय 500 करोड़ के क्लब में शामिल होती चली जा रही हैं और किरण है कि देश छोड़ने की बात कर रही है। पत्नी को इतना भी जुल्म नहीं करना चाहिए। हीरो है वो देश का। एक ढेला भी उस पर गिरा तो देश में असहिष्णुता फ़ैल जायेगी। और एक भ...

भाजपा का ‘विचित्र किन्तु सत्य’

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भाजपा के बारे में टिप्पणी की थी : विचित्र किन्तु सत्य। उस समय तो वह टिप्पणी राजनीतिक थी और उसे राजनीतिक दृष्टि से ही देखा गया था पर बदले हालात में यह टिप्पणी कम से कम भाजपा के बारे में सत्य साबित हो रही है। भाजपा के लिए पहला विचित्र किन्तु सत्य है पत्रकारों की माइक। माइक देखते ही भाजपा नेता बौरा जाते हैं और अपनी हद भूल जाते हैं। माइक के सामने सब बोलते हैं। कोई भी यह नेता नहीं कहता कि यह बात हमारे हद से बाहर है। यह विचित्र किन्तु सत्य या तो अनुशासनहीनता है या फिर पार्टी की रणनीति। दोनों ही स्थितियों में पार्टी के लिए यह हास्यास्पद है, क्योंकि भाजपा पार्टी विद डिफरेंस और अत्यधिक अनुशासन का ढिंढोरा पीटती रही है। अनुशासनहीनता है तो फिर पार्टी को कार्रवाई करनी चाहिए और अगर यह रणनीति का हिस्सा है तो यह रणनीति बदलनी चाहिए। भाजपा के दूसरे और विचित्र किन्तु सत्य हैं शॉटगन शत्रुघ्न सिन्हा। लगता है कि पार्टी के पास उनको चुप कराने का कोई उपाय नहीं बचा है। वे लगातार पार्टी नेतृत्व को एक तरह से चुनौती दे रहे हैं कि अगर दम है तो कार्रवाई करके दिखा। शायद ही क...

हमले अच्छे हैं!

ये कैसा इत्तेफाक है कि जिस आतंकवाद (टेररिज्म) से फ्रांस इस पूरे साल त्रस्त रहा, वहीं पर टेररिज्म शब्द इजाद किया गया था। टेररिज्म लैटिन शब्द टेरर से बना है, जिसका अर्थ भयभीत करना होता है। दरअसल फ्रांस में 1793 से 1794 के बीच के शासन को रिजिन ऑफ टेरर कहा जाता है। उस समय फ्रांस पर जैकोबिन का शासन था। उसके शासन को गाली देने के लिए तब के लोग इस शब्द का प्रयोग करने लगे। इस शब्द को और चर्चा उस समय मिली, जब 1869 में रूस के सर्गेई नेकावेव ने खुद पीपल्स रिट्रीब्यूशन की स्थापना कर खुद को टेररिस्ट घोषित कर लिया। यह वह वर्ष था, जब हमारे राष्ट्रपिता और अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी पैदा हुए थे। आज टेररिज्म शब्द अंतरराष्ट्रीय पटल पर काफी मशहूर शब्द है। क्यों? क्योंकि अब शक्तिशाली और दादा कहे जाने वाले देश भी इससे भयभीत हो चले हैं। पहले उनके लिए इस शब्द का कोई अर्थ ही नहीं था, क्योंकि आतंकवादियों की पहुंच इन तक नहीं थी लेकिन जब अंतरराष्ट्रीय आतंक के गुरु ओसामा बिन लादेन ने अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश पर भी हमला बोल दिया तब माना गया कि आतंकवाद जैसा भी कुछ होता है। विश्व बिरादरी में हाहाकार मच गय...

बिहार चुनाव के बाद

बिहार में चुनाव का शोर खत्म हो चुका है। परिणाम आ चुके हैं। भारी बहुमत से चुनी गई नई सरकार छठ के बाद शपथ लेने जा रही है। बिहार की नईनवेली सरकार को ढेरों बधाई। "राज्य का चुनाव पर असर पूरे देश में" का स्लोगन इस राज्य के महत्व को दर्शाता है। इस चुनाव के समय कई तरह के घटनाक्रम सामने आए। पहले डीएनए और फिर पैकेज को लेकर विवाद जोड़ पकड़ा। चुनाव नजदीक आया तो  बीफ खाने की आशंका में अखलाक  का मारा जाना, गोहत्या, हरियाणा में दलितों के बच्चों को जलाने, एक दलित की थाने में रहस्यमय हालात में मौत, भाजपा नेताओं की अनर्गल बयानबाजी, महाराष्ट्र मेंटैक्सी और ऑटो ड्राइवरों को लाइसेंस मराठी भाषा जानने पर ही देने की घोषणा, बिहार से तमाम लोगों को घूमने के लिए महाराष्ट्र ले जाना, छोटा राजन की गिरफ्तारी, पाकिस्तान के खिलाफ बयानबाजी, मोहन भागवत का आरक्षण संबंधी बयान, लालू के मुंह में शैतान का घुसना, मोदी को ब्रहमपिशाच बताना आदि घटनाएं एक के बाद एक हुईं। बिहार चुनाव ने इन सभी मुद्दों को खुद में समेट लिया। इसका परिदृश्य राष्ट्रीय हो गया। कुछ तो बिहार का राजनीतिक चरित्र ही ऐसा है और कुछ बना दिया गया। ...

भाजपा को बिहार चुनाव हारना ही था

आप बिहार चुनाव में मिली करारी हार के लिए भाजपा की रणनीति को दोष दीजिए। अमित शाह के बिहार में कैंप करने का मजाक उड़ा लीजिए। मोदी की ताबड़तोड़ रैली की खिल्ली उड़ा लीजिए। मोदी के पैकेज देने के तरीकों पर सवाल उठाइए। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण की समीक्षा संबंधी बयान पर सारा ठीकरा फोड़ दीजिए। गाय और अखलाक विवाद को भी बिहार चुनाव परिणाम से जोड़कर मजा ले लीजिए पर इतना जान लीजिए कि ये सब नहीं होता तब भी बिहार चुनाव का परिणाम यही आने वाला था। हां, थोड़ा कम और अधिक होने की गुंजाइश हो सकती थी। ये सोचने से कि अगर ऐसा होता तो वैसा होता और वैसा होता तो ऐसा होगा, गलत होगा। बिहार में जाति आधारित चुनाव होते रहे हैं। यह चुनाव भी विशुद्ध जातीय आधार पर लड़ा गया। महागठबंधन ने जाति आधारित व्यूह रचना की तो एनडीए ने संप्रदाय आधारित। गलत और सही पर न जाइए। चुनावों में हर पार्टी की अपनी अपनी रणनीति होती है, जो गलत भी होती है और सही भी। खैर ये सब देखना चुनाव आयोग का सिरदर्द है। महागठबंधन की व्यूह रचना, जो लोकसभा चुनाव के बाद से ही मूर्त रूप लेने लगी थी, वो प्रथम दृष्टया ही प्रभावी लग रही थी। आधार वोट के रूप मे...