मौत हो तो ऐसी। एक मिनट पहले तक जिन्हें कर्नाटक के बाहर बहुत अधिक नहीं जाना जाता था, उन्हें मरते ही पल भर में अनंत शोहरत हासिल हो गई। जगह-जगह मातमनुमा उल्लास-उत्सव मनाया जाने लगा। पिघलती मोमबत्तियां अगाध श्रद्धांजलि का भाव पैदा करने लगीं। देश की राजधानी दिल्ली में मातमपुरसी का आयोजन कर राजनीति की रोटियां सेंकी गईं और तमाम सेलिब्रिटी ने अपने जौहर दिखाए। क्या करें भाव भले मातम का न हो, माहौल तो मातम का था न।
#gaurilankesh कर्नाटक की पत्रकार की हत्या की खबरें टीवी पर कुछ यूं फ्लैश की गईं: कर्नाटक की पत्रकार #gaurilankesh की हत्या, गौरी हिन्दूवादी राजनीति की धुर विरोधी थीं और भाजपा की नीतियों का विरोध करती थीं। मेरे दस साल के कैरियर में खबर फ्लैश करने का यह नया और आधुनिक तरीका लगा। गौरी लंकेश के बारे में यही पूरी जानकारी थी और उन्हें इससे अधिक समझने का मौका न तो मानस को दिया गया और न ही पत्रकारों ने खुद इसमें अपनी दिलचस्पी दिखाई। मुझे भी उनके बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं थी। लगा कि किसी महिला की हत्या कर दी गई होगी। मुझे क्या पता था कि इसमें बहुत मसाला है और इतना मसाला है कि सोनिया गांधी भी कांग्रेस की गिरती लोकप्रियता को बचाने के लिए इसका इस्तेमाल करेंगी। पाकिस्तान और चीन मुद्दों पर सोनिया माइनो गांधी का बयान भले न आए पर #gaurilankesh की मौत में उन्हें देश की सुरक्षा का खतरा नजर आ गया। उनकी भी गलती नहीं है। वो कहते हैं न डूबते को तिनके का सहारा।
गौरी की हत्या को निंदनीय कहने की गलती नहीं करूंगा, क्योंकि कोई भी हत्या वंदनीय नहीं होती लेकिन उनकी मौत के बाद की खबरों को डिजाइन किया गया। ऐसा लग रहा था कि उनके मरने का ही इंतजार था और आरोपी या दोषी पहले ही घोषित कर दिए गए थे। हत्या हो गई और दोषी घोषित कर दिए गए। मातमनुमा उत्सव शुरू हो गया पूरे देश में। पत्रकारों का मातम राजनीतिक सभा में तब्दील हो गई। रोटियां सेंकी जाने लगीं। चूल्हे की आग पर तवा गरम था और लोग अपने-अपने हिस्से की रोटियां सेंकते चले गए। कुछ लोग अब भी सेंक रहे हैं। पुलिस को मौका ही नहीं मिल रहा है कि वो जांच करे और हत्यारों तक पहुंचे, क्योंकि पुलिस तो अंधा कानून फॉलो करती है।
ये सब तमाशेबाजी पुलिस के काम में रोड़े अटकाती है। पानसरे, दाभोलकर आदि के हत्या इसलिए नहीं पकड़े गए क्योंकि पुलिस को अपना काम करने ही नहीं दिया गया और चिल्ल-पों में सारा समय व्यर्थ हो गया। ये भी एक तरह की राजनीति है कि पुलिस को अपना काम न करने दो और रोड़े अटकाते रहो। इससे न आरोपी सामने आएगा और न ही सत्तापक्ष पर लगे आरोप धुलेंगे। तब तक कोई और लंकेश, पानसरे, दाभोलकर का नंबर आ जाएगा और रोटियां सिंकती रहेंगी। मौत पर मातम के बहाने उत्सव करने का फिर नया बहाना मिल जाएगा और राजनीति की दुकान चलती रहेगी।
#gaurilankesh कर्नाटक की पत्रकार की हत्या की खबरें टीवी पर कुछ यूं फ्लैश की गईं: कर्नाटक की पत्रकार #gaurilankesh की हत्या, गौरी हिन्दूवादी राजनीति की धुर विरोधी थीं और भाजपा की नीतियों का विरोध करती थीं। मेरे दस साल के कैरियर में खबर फ्लैश करने का यह नया और आधुनिक तरीका लगा। गौरी लंकेश के बारे में यही पूरी जानकारी थी और उन्हें इससे अधिक समझने का मौका न तो मानस को दिया गया और न ही पत्रकारों ने खुद इसमें अपनी दिलचस्पी दिखाई। मुझे भी उनके बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं थी। लगा कि किसी महिला की हत्या कर दी गई होगी। मुझे क्या पता था कि इसमें बहुत मसाला है और इतना मसाला है कि सोनिया गांधी भी कांग्रेस की गिरती लोकप्रियता को बचाने के लिए इसका इस्तेमाल करेंगी। पाकिस्तान और चीन मुद्दों पर सोनिया माइनो गांधी का बयान भले न आए पर #gaurilankesh की मौत में उन्हें देश की सुरक्षा का खतरा नजर आ गया। उनकी भी गलती नहीं है। वो कहते हैं न डूबते को तिनके का सहारा।
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गौरी की हत्या को निंदनीय कहने की गलती नहीं करूंगा, क्योंकि कोई भी हत्या वंदनीय नहीं होती लेकिन उनकी मौत के बाद की खबरों को डिजाइन किया गया। ऐसा लग रहा था कि उनके मरने का ही इंतजार था और आरोपी या दोषी पहले ही घोषित कर दिए गए थे। हत्या हो गई और दोषी घोषित कर दिए गए। मातमनुमा उत्सव शुरू हो गया पूरे देश में। पत्रकारों का मातम राजनीतिक सभा में तब्दील हो गई। रोटियां सेंकी जाने लगीं। चूल्हे की आग पर तवा गरम था और लोग अपने-अपने हिस्से की रोटियां सेंकते चले गए। कुछ लोग अब भी सेंक रहे हैं। पुलिस को मौका ही नहीं मिल रहा है कि वो जांच करे और हत्यारों तक पहुंचे, क्योंकि पुलिस तो अंधा कानून फॉलो करती है।
ये सब तमाशेबाजी पुलिस के काम में रोड़े अटकाती है। पानसरे, दाभोलकर आदि के हत्या इसलिए नहीं पकड़े गए क्योंकि पुलिस को अपना काम करने ही नहीं दिया गया और चिल्ल-पों में सारा समय व्यर्थ हो गया। ये भी एक तरह की राजनीति है कि पुलिस को अपना काम न करने दो और रोड़े अटकाते रहो। इससे न आरोपी सामने आएगा और न ही सत्तापक्ष पर लगे आरोप धुलेंगे। तब तक कोई और लंकेश, पानसरे, दाभोलकर का नंबर आ जाएगा और रोटियां सिंकती रहेंगी। मौत पर मातम के बहाने उत्सव करने का फिर नया बहाना मिल जाएगा और राजनीति की दुकान चलती रहेगी।

इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएंमुझे भी अजीब लगा जब एक नामी चैनल ने खबर फ्लैश किया कि भाजपा विरोधी पत्रकार की हत्या. शर्मनाक यह कि अपने को बुद्धिजीवी मानने वाले पत्रकार भी राजनीतिक वर्गीकरण से आनंद में हैं.
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