बिहार की राजनीति एक बार फिर से करवट ले रही है। महागठबंधन के नेताओं के रोज आ रहे नए-नए बयान सुर्खियां बन रहे हैं। आम के मौसम में जनता परिवार के बीच खटास बढ़ती जा रही है। हर एक बयान के बाद डैमेज कंट्रोल की कोशिश हो रही है तब तक एक नया बयान आ जाता है। रिश्ते तल्ख हो रहे हैं और बदलाव की आहट हर रोज सुबह के साथ महसूस हो रही है और शाम को फिर समन्वय की कोशिश हो रही होती है। छटपटाहट सभी को है पर पहल कौन करे। जाहिर है पहल नीतीश कुमार को ही करनी होगी क्योंकि लालू यादव ऐसा करने से रहे। केंद्र के बाद अब वे किसी भी कीमत पर बिहार की सत्ता से विमुख होना नहीं चाहेंगे।
ऐसा नहीं है कि महागठबंधन में आई दरार का एकमात्र कारण राष्ट्रपति चुनाव ही है। इसकी खिचड़ी तब से पक रही थी, जब नीतीश कुमार को यह भान हो गया कि लालू प्रसाद यादव के साथ सरकार चलाने में उनकी ही मिट़टी पलीद होनी है। उनकी ही छवि को बट़टा लगेगा, क्योंकि लालू यादव जो कर रहे हैं वो उनके लिए नैसर्गिक है। उनका वोट बैंक भी यही चाहता है। इसलिए उन्हें कोई नुकसान नहीं है। नुकसान हर हाल में नीतीश कुमार को ही होना है। पिछले चुनाव में भी उन्हें कोई खास फायदा नहीं हुआ था। महागठबंधन का फायदा लालू प्रसाद और कांग्रेस ने ही उठाया। #Nitish को तो 30 से अधिक सीटों का भारी नुकसान ही हुआ था।
पहले सर्जिकल स्ट्राइक और फिर नोटबंदी का समर्थन नीतीश कुमार ने यूं ही नहीं किया था। यह सब रणनीति के तहत किया गया ताकि आगे की राह आसान हो जाए। नोटबंदी के बाद नीतीश कुमार ने बेनामी संपत्ति के खिलाफ कानून बनाने के लिए केंद्र सरकार को ललकारा था। जानकार बताते हैं कि वो ललकार केंद्र के लिए नहीं, लालू प्रसाद के लिए थी। लालू प्रसाद के परिवार पर बेनामी संपत्ति के नए और कठोर कानून की गाज गिर ही गई। नीतीश के ही ललकार पर केंद्र ने बेनामी संपत्ति के खिलाफ कठोर कानून बनाया और लालू प्रसाद के परिवार की एनसीआर व देश में कई जगहों पर संपत्तियां जब्त कर ली गई। अब जो लालू प्रसाद और उनकी पार्टी की बौखलाहट सामने आ रही है, वो भी राष्ट्रपति चुनाव को लेकर नहीं, बल्कि बेनामी संपत्ति जब्त होने के विरोधस्वरूप है। इसी बीच खबर आई कि सरकार अस्पताल के डॉक्टरों ने लालू के घर जाकर कई दिनों तक इसलिए इलाज किया, क्योंकि तेजस्वी यादव स्वास्थ्य मंत्री हैं। इन मुद़दों को लेकर भी नीतीश असहज होते चले गए। वे कुछ न बोलें पर रणनीतिक रूप से उन्होंने लालू प्रसाद को मात देने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। महागठबंधन रहेगा या टूटेगा, यह सिर्फ और सिर्फ नीतीश कुमार ही जानते हैं और वे ही इसे बरकरार रख सकते हैं या तोड़फोड़ कर सकते हैं। दरअसल दोनों पक्ष एक-दूसरे के विरोध की पराकाष्ठा का इंतजार कर रहे हैं। खबर है कि राष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस और राजद के कुछ विधायक क्रॉस वोटिंग कर सकते हैं। अगर ऐसा हुआ तो यह महागठबंधन की कब्र में आखिरी कील साबित होगा। उससे पहले जीएसटी को भी नीतीश कुमार ने समर्थन दे दिया है और 30 जून की रात को संसद के सेंटल हॉल में आयोजित होने वाले समारोह में अपने सांसदों को शामिल होने से रोकने की कोई पहल नहीं की है। दूसरी ओर, कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दल उस समारोह का बहिष्कार करने जा रहे हैं।
हां, राजनीति के जानकारों को एक बात हमेशा परेशान करती रहेगी कि जब नीतीश को रास्ता अलग ही चुनना था तो उन्होंने सोनिया गांधी से विपक्षी एकता की पहल करने का आग्रह क्यों किया था। उसके बाद सोनिया गांधी के भोज में नीतीश कुमार शामिल नहीं हुए और अगले ही दिन वे प्रधानमंत्री के भोज में शामिल हो गए। उनका एक कदम आगे और दो कदम पीछे वाली रणनीति सभी को स्तब्ध किए हुए है। खुद सोनिया गांधी भी नीतीश कुमार के चकमे से हैरान-परेशान हैं। समय के साथ नीतीश कुमार यह भेद खोलेंगे या फिर शायद इतिहासकार इसका अध्ययन कर निष्कर्ष निकाल पाएं।
बहरहाल, बिहार की राजनीति इस समय चर्चा में है। देखना यह होगा कि नीतीश कुमार ने लंगड़ी मारी और एनडीए में हो लिए तो फिर जीतनराम मांझी, पप्पू यादव आदि नेताओं का क्या होगा। जाहिर है पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने मांझी को मसीहा करार दिया था। पप्पू यादव जेड प्लस की सुरक्षा लिए घूम रहे हैं। उपेंद्र कुशवाहा की रणनीति क्या होगी, क्योंकि नीतीश कुमार से अलग होकर उन्होंने रालोसपा बनाई थी। खुद भाजपा के वे नेता जो नीतीश कुमार से दूरी बनाए रहते थे, उनका क्या होगा। सबसे बड़ा सवाल, शरद यादव का क्या होगा, क्योंकि वे अब एनडीए के साथ उतने सहज महसूस नहीं कर रहे या नीतीश करने नहीं दे रहे। अब शरद यादव का वो कद नहीं रह जाएगा, जो पहले होता था क्योंकि वो कद अब नीतीश खुद लेना चाहेंगे। कहीं ऐसा न हो कि शरद यादव अगले जार्ज फर्नांडिस बन जाएं। आगे देखते जाइए, समझते जाइए कि राजनीति भी क्या चीज होती है।
नीतीश कुमार सिर्फ बिहार की ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी अहम स्थान रखते हैं। नीतीश के इस कदम से दूरगामी बदलाव का संदेश दिख रहा है।
जवाब देंहटाएंसटीक बात
जवाब देंहटाएंसही लिखा है। नीतीश के केंद्र समर्थक बोल से महागठबंधन की नींव हिलने लगी हैं।वो जनता परिवार के साथ असहज महसूस कर रहे हैं। नीतीश की अगली रणनीति ही निर्धारित करेगी कि महागठबंधन रहेगा या महाविखंडन में तब्दील हो जाएगा।
जवाब देंहटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएंNitish is very good politician and i m agree that unko samjhana muskil hai. His life is a lesson.
जवाब देंहटाएंBasut Shandar, Sushan babu ko sach me samjhna mushkil hai...
जवाब देंहटाएं