नारंग और जेजे जैसे नाम किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं। दोनों नाम बॉलीवुडिया खलनायकी के पर्याय रहे हैं। समय बदला, चरित्र बदला। आज नारंग मात्र कुछ ही लोगों के लिए हीरो बन पाया। जेजे के उन्मादियों ने नारंग को सिर्फ इसलिए दुनिया से रुखसत कर दिया कि वह बांगलादेश पर भारत की विजय के उल्लास को पचा नहीं पाया था। अपराध तो उसका संगीन था, इसमें कोई दो राय नहीं। नादानी में नारंग खुद ही अपनी जान का दुश्मन बन गया। उसका यही एकमात्र अपराध भी नहीं था। उसका सबसे बड़ा अपराध तो यह था कि उसके नाम के आगे न कोई दलित उपनाम था और न ही मुसलिम। सो हो गया बेचारे का खेल खत्म। अगर वह दलित और मुसलमान होता तो लालबत्ती गाडि़यों का रेला उसके घर के आगे लाइन लगा रहे होते। तमाम पुरस्कारों की मां बहन हो गई होती अब तक। कई लोग देश से यह कहकर कि निकल जाते कि यहां कोई सुरक्षित नहीं है। पर अफसोस, वह इन किसी मानकों को पूरा नहीं करता था।
नारंग बॉलीवुडिया खलनायकी से चरित्र अभिनेता के रोल में आ चुका था। जिन्दाल, बख्तावर, जोजो, मोगैंबो, डा डैंग, तात्या से अलग नारंग देशभक्ति दिखा रहा था। अब जनमानस तो नारंग को खलनायक ही जानती है, लिहाजा नारंग की करतूत देशभक्तों को रास नहीं आई और नारंग को छठी का दूध याद दिला दिया। घटना देश की राजधानी में घटी। अब राजधानी से बाहर इस तरह की काई घटना होती हो प्रकाश में आती। राजधानी के जाम में बेचारे पत्रकार फंसकर रह गए और नारंग को वो कुछ भी हासिल नहीं हुआ, जिसका वह हकदार नहीं था। अन्य सुदूर राज्यों की घटना होती तो नेता लोग प्लेन से चले जाते लेकिन जाम से निपटकर जाना तो समय को बर्बाद ही करना था न। उसमें भी जेजे और नारंग की दुश्मनी से किसी को क्या फायदा, ऐसे समय में जब नारंग अपना केंचुल उतार चुका था और जेजे की वादशाहत बढ़ती जा रही है। कहां जेजे और कहां नारंग। हुदहुद तूफान पीडि़तों का हाल जानने नहीं गए लोग रोहित वेमुला के आत्महत्या करने पर वहां जाने के लिए नंबर लगाते नजर आए, क्यों कि प्राथमिक सूचना के आधार पर वह दलित था, जो बाद में पिछड़ा करार दे दिया गया।
नारंग की हत्या नीरस निकली। इसमें किसी का कोई इंटरेस्ट नहीं था। ठीक वैसे ही जैसे केरल की हिंसा नीरत दिखती है। इन सब घटनाओं में पीड़ा का कोई स्थान नहीं होता। स्थान होता है उस पीड़ा के केंचुल का। अब केंचुल दलित का है, मुसलमान का है या और कोई वोट बैंक और बुद़धू गिरोह का तो उसकी महता पता चलती है या फिर कन्हैया जैसे तथाकथित दलित प्रेमी भूमिहार होना चाहिए, जो भारत तेरे टुकड़े होंगे जैसे नारे गढ़ सकता है। नारंग का क्या, जिसे हम सिर्फ फिल्मों में देखे और सुन सके हैं। कोई अफजल प्रेमी गैंग का आदमी भी नहीं था नारंग या इंशाल्लाह, इंशाल्लाह करने वाला भी नहीं था।
अपने देश में यह सुविधा है कि आपके जीते जी आपको वो हक नहीं मिलेगा, जो मरने पर मिल सकता है। आप सोच भी नहीं सकते कि मरने के बाद आप देश, राज्य या समाज के लिए कितने काबिल हो सकते हैं। आज ए राजा की मौत हो जाए तो राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की भी बाध्यता है कि वे यह बात कहें कि राजा ने जो स्थान छोड़ा है, उसे भरा नहीं जा सकता लेकिन नारंग बेचारा मरने के बाद भी कुछ लोगों के लिए खलनायक ही रह गया, क्योंकि उसकी गलती अक्षम्य थी।
नारंग, तुम समय को नहीं पहचान सके। कहां तो तुम्हें भारत की जीत पर मातम मनाना चाहिए था। कहां तुम जेजे के आदमियों के बीच में जीत का जश्न मनाने की भूल कर बैठे। देशभक्ति तो यहां मुर्ख दिखाते हैं। अभी आप कहीं भी देशभक्ति की बात कर दीजिए, लोग आपको मुर्ख समझेंगे। देशद्रोहियों को देखो, कैसे दामाद की तरह पाला जा रहा है। जिस कन्हैया के घर में खाने के लाले के दावे किए जा रहे थे, वो जेल से निकला फॉर्च्युनर में लेकिन वोट की राजनीति ऐसी है कि कन्हैया रहेगा गरीब ही। नारंग के साथ तो बुरा न मानो होली है चरितार्थ हो गई। वह चला गया और छोड़ गया एक संदेश- दलित पैदा होओ, मुसलिम बनो पर भारतीय नहीं। भारतीय हो भी गए तो इतराओ नहीं। ऐसा करना जानलेवा हो सकता है।

behtrin
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