आज बुराई को जलाने का दिन है। मिटाने का दिन है। क्या कारण है कि हर साल बुराई को जलाया जाता है और वो फिर तनकर खड़ी हो जाती है। कारण यह है कि हम इसे प्रतीकात्मक रूप से करते हैं, मन से नहीं। आइए मन से बुराई को जलाएं। कुछ नहीं कर सकते तो एक मच्छर तो मार ही सकते हैं। .... तो आइये हम बुराई को भगाने का भगीरथ प्रयास शुरू करें।
शुरुआत देश के प्रधानमंत्री से करते हैं। वे दाल को सस्ता कर एक बुराई ख़त्म कर सकते हैं। साथ ही वे इस बात की ताकीद कर सकते हैं कि महंगाई नामक बुराई दाल या किसी अन्य पदार्थ को अब निशाना नहीं बना सकेगी। प्रधानमंत्री आज एक काम और कर सकते हैं कि अपने नेताओं और मंत्रियों की जुबान पर लगाम लगाने का काम कर सकते हैं। जुबान पर लगाम न लगा पाना बहुत बड़ी बुराई है। कहा जाता है कि जीभ पर लगा जख्म जल्दी ठीक हो जाता है पर जुबान से लगी चोट जिंदगी भर जख्म देती है।
अब बात करते हैं राहुल गांधी की। इनकी एक बहुत गन्दी आदत है बिना बताए गायब हो जाना। यह भी एक बुराई है। आज के दिन प्रण लेकर इन्हें इस बुराई से मुक्त होने की कोशिश करनी चाहिए। जो आदमी कांग्रेस पार्टी जैसे संगठन का उपाध्यक्ष हो, साथ ही अमेठी जैसे लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधि हो वो इतना गैर जिम्मेदार कैसे हो सकता है।
थोड़ी सी बुराई की चर्चा लालू यादव की भी कर लेते हैं। उनके अंदर वैसे तो कोई बुराई नहीं हैं। वे अपने आप में एक बुराई हैं। अब उनसे क्या अपील की जाए कि आप प्रण लेकर अपनी बुराई दूर करें। बल्कि आज समूचे बिहार को इस बुराई से दूर रहने का संकल्प लेना चाहिए। अब ये सोचने का वक़्त है कि बिना सत्ता में आये शैतान हावी हो गया है तो चुनाव जीतने के बाद तो वैसे ही होगा, जैसे राजा परीक्षित के दिमाग में शैतान घुस गया था।
अब बात करते हैं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की। उनके अंदर भी एक बुराई है- औकात से अधिक अपेक्षा पाल लेते हैं। 30 सांसद अकेले जिताने की औकात नहीं और सपना देख रहे हैं प्रधानमंत्री बनने का। इसी महत्वाकांक्षा में 20 साल पुराना गठबंधन तोड़ दिया और लोकसभा चुनाव में मुँह की खानी पड़ी। देखना यह है कि वे अब मुख्यमंत्री भी रह पाते हैं या नहीं। महत्वाकांक्षी होना अच्छी बात है पर अति महत्वाकांक्षी होना नुकसान कर जाता है। आज उन्हें अपने अति महत्वाकांक्षा को त्यागने का संकल्प लेना चाहिए।
बात करें मुलायम सिंह यादव की तो विधानसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत मिला लेकिन राज्य में साढ़े चार मुख्यमंत्री हो गए। बेटे को सत्ता तो सौंप दी लेकिन नकेल कस दिया। बेचारे अखिलेश कई मामलों में बाकी चार से हलके दिखते हैं। मुलायम की तुष्टिकरण की इस तरह की नीति भी अपने आप में बुराई है। उन्हें आज के दिन इससे छुटकारा लेने के लिए प्रण लेना चाहिए। ये जनाब ऐसे नेता हैं, जिन्हें सीबीआई का दर दिखाकर कोई भी ब्लैकमेल कर सकता है।
थोड़ी सी बात मायावती की भी हो जाए। दलितों की राजनीति कर कई बार सत्ता में आयीं पर दलितों का उद्धार नहीं हुआ। उलटे खुद सीबीआई के शिकंजे में फंस गयीं। आज के दिन उन्हें अपने अंदर की इस बुराई को जला देनी चाहिए।
शुरुआत देश के प्रधानमंत्री से करते हैं। वे दाल को सस्ता कर एक बुराई ख़त्म कर सकते हैं। साथ ही वे इस बात की ताकीद कर सकते हैं कि महंगाई नामक बुराई दाल या किसी अन्य पदार्थ को अब निशाना नहीं बना सकेगी। प्रधानमंत्री आज एक काम और कर सकते हैं कि अपने नेताओं और मंत्रियों की जुबान पर लगाम लगाने का काम कर सकते हैं। जुबान पर लगाम न लगा पाना बहुत बड़ी बुराई है। कहा जाता है कि जीभ पर लगा जख्म जल्दी ठीक हो जाता है पर जुबान से लगी चोट जिंदगी भर जख्म देती है।
अब बात करते हैं राहुल गांधी की। इनकी एक बहुत गन्दी आदत है बिना बताए गायब हो जाना। यह भी एक बुराई है। आज के दिन प्रण लेकर इन्हें इस बुराई से मुक्त होने की कोशिश करनी चाहिए। जो आदमी कांग्रेस पार्टी जैसे संगठन का उपाध्यक्ष हो, साथ ही अमेठी जैसे लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधि हो वो इतना गैर जिम्मेदार कैसे हो सकता है।
थोड़ी सी बुराई की चर्चा लालू यादव की भी कर लेते हैं। उनके अंदर वैसे तो कोई बुराई नहीं हैं। वे अपने आप में एक बुराई हैं। अब उनसे क्या अपील की जाए कि आप प्रण लेकर अपनी बुराई दूर करें। बल्कि आज समूचे बिहार को इस बुराई से दूर रहने का संकल्प लेना चाहिए। अब ये सोचने का वक़्त है कि बिना सत्ता में आये शैतान हावी हो गया है तो चुनाव जीतने के बाद तो वैसे ही होगा, जैसे राजा परीक्षित के दिमाग में शैतान घुस गया था।
अब बात करते हैं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की। उनके अंदर भी एक बुराई है- औकात से अधिक अपेक्षा पाल लेते हैं। 30 सांसद अकेले जिताने की औकात नहीं और सपना देख रहे हैं प्रधानमंत्री बनने का। इसी महत्वाकांक्षा में 20 साल पुराना गठबंधन तोड़ दिया और लोकसभा चुनाव में मुँह की खानी पड़ी। देखना यह है कि वे अब मुख्यमंत्री भी रह पाते हैं या नहीं। महत्वाकांक्षी होना अच्छी बात है पर अति महत्वाकांक्षी होना नुकसान कर जाता है। आज उन्हें अपने अति महत्वाकांक्षा को त्यागने का संकल्प लेना चाहिए।
बात करें मुलायम सिंह यादव की तो विधानसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत मिला लेकिन राज्य में साढ़े चार मुख्यमंत्री हो गए। बेटे को सत्ता तो सौंप दी लेकिन नकेल कस दिया। बेचारे अखिलेश कई मामलों में बाकी चार से हलके दिखते हैं। मुलायम की तुष्टिकरण की इस तरह की नीति भी अपने आप में बुराई है। उन्हें आज के दिन इससे छुटकारा लेने के लिए प्रण लेना चाहिए। ये जनाब ऐसे नेता हैं, जिन्हें सीबीआई का दर दिखाकर कोई भी ब्लैकमेल कर सकता है।
थोड़ी सी बात मायावती की भी हो जाए। दलितों की राजनीति कर कई बार सत्ता में आयीं पर दलितों का उद्धार नहीं हुआ। उलटे खुद सीबीआई के शिकंजे में फंस गयीं। आज के दिन उन्हें अपने अंदर की इस बुराई को जला देनी चाहिए।

बहुत बढ़िया श्रीमान मिश्रा जी। ब्लॉग शुरू करने के लिए बधाई और धन्यवाद भी कि आपके ओजस्वी विचार हम लोगों तक पहुंचते रहेंगे। शुरुआत लाजवाब है तो आगे के अंदाज की कल्पना भी की जा सकती है। विषय सामयिक है और कैरेक्टर का चयन भी।
जवाब देंहटाएंअरविंद ओझा
धन्यवाद ओझा जी। ऐसे ही हौसला बढ़ाए रखिए।
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