बिहार में दशहरा के बाद जो चुनाव का चरण शुरू होने जा रहा है, वो दोनों सियासी धड़ों के लिए महत्वपूर्ण है। भाजपा के लिए इन चरणों में अपना गढ़ बचाने की चुनौती है तो महागठबंधन को भाजपा के गढ़ में सेंधमारी करने का मौका। इस चरण में महत्वपूर्ण भूमिका उन प्रवासी बिहारियों की होगी, जो आम तौर पर बिहार से बाहर रहते हैं या रहने को मजबूर हैं क्योंकि घर में उन्हें कोई रोजगार हासिल नहीं है। इसकी टीस आमतौर पर हर बिहारी को रहती है। आमतौर पर दशहरा के बाद बिहार से बाहर रहने वाले लोग लौटकर दिवाली और छठ पर्व के लिए घर लौटते हैं। काफी तादाद में घर लौटे मतदाता भी बड़ी उलटफेर कर सकते हैं। प्रवासी बिहारी जिधर अपना वोट डालेंगे, उसका पलड़ा उतना ही मजबूत होगा। आगे के चरणों के चुनाव के लिए दोनों गठबंधनों की नजर प्रवासी बिहारियों पर टिकी है।
महाराष्ट्र के भुक्तभोगी : भाजपा प्रवासी बिहारियों को अपना वोटर मानती है पर महाराष्ट्र की सरकार ने वहां ऐसा कानून लागू किया है, जिसके अनुसार वहां ड्राइविंग लाइसेंस उन्हीं को मिलेगा, जो मराठी भाषी हैं। इस कारण लाखों बिहारी वहां प्रभावित हो रहे हैं और उनकी रोज-रोटी छिन रही है। ऐसे में महाराष्ट्र से लौटे प्रवासी बिहारी भाजपा का रुख करेंगे, इसकी उम्मीद कम है। महाराष्ट्र सरकार के फैसले से बिहार के लोग ठगा महसूस कर रहे हैं। इससे पहले भी राज ठाकरे की सेना वहां बिहारियों के साथ सितम ढाती चली आ रही है। यह फैसला भी शिवसेना और राज ठाकरे के दबाव में लिया गया बताया जा रहा है। इसके बाद भी भाजपा को उम्मीद है कि महाराष्ट्र से लौटे लोग उसे वोट देंगे तो यह उसकी दिक्कत है।
रिजिजू का बड़बोलापन : जुबान पर लगाम न लगा पाने वाले भाजपा नेताओं में गृह राज्यमंत्री किरिन रिजिजू का नाम भी जुड़ गया है। बिहार चुनाव के शबाव के बीच उन्होंने बयान दे डाला कि उत्तर भारतीय लोग नियम कानूनों की धज्जियां उड़ाते हैं। फिर क्या था, उनकी जुबां से बात निकली नहीं कि दूर तलक चली गई। महागठबंधन ने इसे हाथोंहाथ लपका और फिर सरकार को जनविरोधी करार देने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ा। इससे पहले विदेश राज्यमंत्री जनरल वीके सिंह ने दलितों के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। हालत ये हो गई कि राजनाथ सिंह को भाजपा नेताओं को फटकार तक लगानी पड़ी। बड़े आश्चर्य की बात है कि कैडर पार्टी होने का दावा करने वाली भाजपा अपने नेताओं के बड़बोलेपन पर कोई अंकुश नहीं लगा पा रही है। इससे भ्रम होता है कि कहीं ये बयानबाजी प्रायोजित तो नहीं है।
बिहार चुनाव अब निर्णायक दौर में प्रवेश कर गया है। जीत के दावे इधर से भी हो रहे हैं और उधर से भी लेकिन इसके लिए आठ नवंबर की दुपहरिया का इंतजार करना होगा। एनडीए जीता तो नरेंद्र मोदी अपनी प्राथमिकताओं की ओर बढ़ते चले जाएंगे और महागठबंधन जीता तो यह तय हो जाएगा कि नरेंद्र मोदी के एकत्व को देश स्वीकारने नहीं जा रहा है और आगे भाजपा को अपनी रणनीति में फेरबदल करना होगा। बिहार के बाद बंगाल और असम आदि राज्यों में भी चुनाव होने हैं, जहां बदली परिस्थिति में भाजपा के कदम दुरुह साबित होंगे।
सही कह रहे हैं सुनीलजी। बिहार के लोगों का दर्द सही बयां किया। बिहार के लोगों से रोजी-रोटी छीनने का हक महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को किसने दिया? क्या बिहारी इस देश नागरिक नहीं है? मोदी जी को समझना होगा कि खुद ईंमानदार होकर अगर आप गलत कार्यों और गलत लोगों को संरक्षण दे रहे या चुप्पी साधे हैं तो आप सबसे बड़े गुनाहगार हैं।
जवाब देंहटाएंसही कह रहे हैं सुनीलजी। बिहार के लोगों का दर्द सही बयां किया। बिहार के लोगों से रोजी-रोटी छीनने का हक महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को किसने दिया? क्या बिहारी इस देश नागरिक नहीं है? मोदी जी को समझना होगा कि खुद ईंमानदार होकर अगर आप गलत कार्यों और गलत लोगों को संरक्षण दे रहे या चुप्पी साधे हैं तो आप सबसे बड़े गुनाहगार हैं।
जवाब देंहटाएंसही कह रहे हैं सुनीलजी। बिहार के लोगों का दर्द सही बयां किया। बिहार के लोगों से रोजी-रोटी छीनने का हक महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को किसने दिया? क्या बिहारी इस देश नागरिक नहीं है? मोदी जी को समझना होगा कि खुद ईंमानदार होकर अगर आप गलत कार्यों और गलत लोगों को संरक्षण दे रहे या चुप्पी साधे हैं तो आप सबसे बड़े गुनाहगार हैं।
जवाब देंहटाएं