आजकल पूरे देश में गाय पर राजनीति गरमाई हुई है। राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग के बीच गाय एक तरह से राजनीतिक प्राणी हो गई है। यह खुद वोट तो नहीं दे सकती लेकिन वोट दिला जरूर सकती है। और किसी भी पशु या जानवर में गाय जैसा राजनीतिक चरित्र न मिल रहा है और न ही ढूंढा जा रहा है। यह एक समाज विशेष के लिए मां है और दूसरे समाजों के लिए मात्र गोश्त। अजीब इत्तेफाक है। हम बाघों को बचाने का प्रयास कर रहे हैं। शेरों को बचाने में लगे हुए हैं। करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। तमाम वन्यजीव को बचाने के लिए कई अभियान कई स्तरों पर चलाए जा रहे हैं और गाय को बचाने की बात आती है तो कहा जाता है कि कट्टरवाद को हवा दी जा रही है।
आजकल गाय के बारे में नित्त नई जानकारी आ रही है। यह जानकारी किसी पशु वैज्ञानिक या शोधकर्ताओं की तरफ से नहीं, बल्कि हमारे राजनेताओं की जिह्वा से निकल रही है। जानकारी भी ऐसी कि क्या कहा जाए। हालिया जानकारी मिली है कि ऋषि-मुनि भी गाय का मांस खाते थे। इस जानकारी से अभी तक मानव जाति अनभिज्ञ थी। तमाम शोधों के बाद भी ये जानकारी अब तक नहीं जुटाई जा सकी थी लेकिन राजनीतिक जीवन में वो भी चुनाव के समय ऐसी जानकारियां हमारा सामान्य ज्ञान खूब बढ़ा रही हैं।
गाय के बारे में और अधिक जानकारी चाहिए तो बिहार चुनाव में डूब जाएँ। नित्त नई जानकारी मिलेगी। चुनाव के समय पूरे विश्व में किसी पशु विशेष पर इतनी चर्चा कभी नहीं हुई होगी। गाय दूध देती है। गाय वोट देती है। यही नहीं चुनाव हराने और जिताने में भी इस पशु का बहुत बड़ा रोल है लेकिन इतना अधिक महत्व होने के बाद भी गोमांस का व्यापार रुक नहीं रहा है। हालांकि गाय के कटान का भी अपना अलग महत्व है। गाय दो समानान्तर धर्मों को एक दूसरे के सामने तनकर खड़े होने का माद्दा पैदा करती है।
गाय के पक्ष में किसी ने कुछ भी कह दिया तो बवाल ही बवाल। क्यों भई? इसीलिए न कि गाय पहले सिर्फ दूध देती थी। अब वोट भी देने लगी है। साथ ही गाय विदेशों से डॉलर भी लाने में सहायक साबित हो रही है। अब इस पर अंकुश लगेगा तो हंगामा बरपेगा न। गायों को मारने के पक्ष में तो यहां तक कहा जा रहा है कि पुराने कबाइली जमाने में हिन्दू भी गोमांस खाते थे। हालांकि इस बात में तमाम विरोधाभास है। कभी कभी तो यह बात वामपंथ विचारधारा की साजिश मात्र लगती है। चलो एक बारगी मान भी लें कि आदिम युग में लोग गाय खाते थे तो भी क्या हमें शनै शनै कम हो रही गायों की संख्या का भी ख्याल नहीं रखना चाहिए।
आजकल गाय के बारे में नित्त नई जानकारी आ रही है। यह जानकारी किसी पशु वैज्ञानिक या शोधकर्ताओं की तरफ से नहीं, बल्कि हमारे राजनेताओं की जिह्वा से निकल रही है। जानकारी भी ऐसी कि क्या कहा जाए। हालिया जानकारी मिली है कि ऋषि-मुनि भी गाय का मांस खाते थे। इस जानकारी से अभी तक मानव जाति अनभिज्ञ थी। तमाम शोधों के बाद भी ये जानकारी अब तक नहीं जुटाई जा सकी थी लेकिन राजनीतिक जीवन में वो भी चुनाव के समय ऐसी जानकारियां हमारा सामान्य ज्ञान खूब बढ़ा रही हैं।
गाय के बारे में और अधिक जानकारी चाहिए तो बिहार चुनाव में डूब जाएँ। नित्त नई जानकारी मिलेगी। चुनाव के समय पूरे विश्व में किसी पशु विशेष पर इतनी चर्चा कभी नहीं हुई होगी। गाय दूध देती है। गाय वोट देती है। यही नहीं चुनाव हराने और जिताने में भी इस पशु का बहुत बड़ा रोल है लेकिन इतना अधिक महत्व होने के बाद भी गोमांस का व्यापार रुक नहीं रहा है। हालांकि गाय के कटान का भी अपना अलग महत्व है। गाय दो समानान्तर धर्मों को एक दूसरे के सामने तनकर खड़े होने का माद्दा पैदा करती है।
गाय के पक्ष में किसी ने कुछ भी कह दिया तो बवाल ही बवाल। क्यों भई? इसीलिए न कि गाय पहले सिर्फ दूध देती थी। अब वोट भी देने लगी है। साथ ही गाय विदेशों से डॉलर भी लाने में सहायक साबित हो रही है। अब इस पर अंकुश लगेगा तो हंगामा बरपेगा न। गायों को मारने के पक्ष में तो यहां तक कहा जा रहा है कि पुराने कबाइली जमाने में हिन्दू भी गोमांस खाते थे। हालांकि इस बात में तमाम विरोधाभास है। कभी कभी तो यह बात वामपंथ विचारधारा की साजिश मात्र लगती है। चलो एक बारगी मान भी लें कि आदिम युग में लोग गाय खाते थे तो भी क्या हमें शनै शनै कम हो रही गायों की संख्या का भी ख्याल नहीं रखना चाहिए।
samaj ke aakh par parda pada hain isliye vah netao ke baato mein aati hain. neta to kursi ke liye apne zameer ki vali bhi de dete hain sir ji
जवाब देंहटाएंsamaj ko aaina dikhane ki zaroorat hai. andhe samaj ko aaina dikhana usko bura lagega par sachch ek baar ke kadvi lagti hai
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