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संदेश

#gaurilankesh : मौत हो तो ऐसी

मौत हो तो ऐसी। एक मिनट पहले तक जिन्हें कर्नाटक के बाहर बहुत अधिक नहीं जाना जाता था, उन्हें मरते ही पल भर में अनंत शोहरत हासिल हो गई। जगह-जगह मातमनुमा उल्लास-उत्सव मनाया जाने लगा। पिघलती मोमबत्तियां अगाध श्रद्धांजलि का भाव पैदा करने लगीं। देश की राजधानी दिल्ली में मातमपुरसी का आयोजन कर राजनीति की रोटियां सेंकी गईं और तमाम सेलिब्रिटी ने अपने जौहर दिखाए। क्या करें भाव भले मातम का न हो, माहौल तो मातम का था न। #gaurilankesh कर्नाटक की पत्रकार की हत्या की खबरें टीवी पर कुछ यूं फ्लैश की गईं: कर्नाटक की पत्रकार #gaurilankesh की हत्या, गौरी हिन्दूवादी राजनीति की धुर विरोधी थीं और भाजपा की नीतियों का विरोध करती थीं। मेरे दस साल के कैरियर में खबर फ्लैश करने का यह नया और आधुनिक तरीका लगा। गौरी लंकेश के बारे में यही पूरी जानकारी थी और उन्हें इससे अधिक समझने का मौका न तो मानस को दिया गया और न ही पत्रकारों ने खुद इसमें अपनी दिलचस्पी दिखाई। मुझे भी उनके बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं थी। लगा कि किसी महिला की हत्या कर दी गई होगी। मुझे क्या पता था कि इसमें बहुत मसाला है और इतना मसाला है कि स...

#Nitish #Laloo से और #sharad भयभीत थे #nitish से

इधर #Nitish महागठबंधन से पीछा छुड़ाकर एनडीए में जाने का बहाना तलाश रहे थे, उधर #Sharad Yadav यादव #Nitish से भयभीत होकर अलग रास्ता अख्तियार करने में जुटे थे। दोनों की अपनी वाजिब वजहें थीं। दरअसल शरद यादव को दूसरे जॉर्ज फर्नांडीस बन जाने का भय सता रहा था। खासकर पार्टी के अध्यक्ष पद से हटाए जाने के बाद से वे खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे थे। इधर नीतीश कुमार को भी लालू के साथ काम करने में उतना मजा नहीं आ रहा था। वे खुलकर उस तरह बैटिंग नहीं कर पा रहे थे, जिस तरह एनडीए के साथ रहकर वे किया करते थे। नीतीश के साथ रहकर लालू प्रसाद यादव दिनोंदिन मजबूत होते जा रहे थे। हालांकि केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई और घेरेबंदी से उन पर शिकंजा कसता जा रहा था पर राजनीतिक रूप से इसका कोई नुकसान लालू प्रसाद को न होकर नीतीश कुमार को हो रहा था। उनका एमवाई (मुस्लिम+यादव) समीकरण फिर से मजबूत हो रहा था। मजाकिया अंदाज में लालू प्रसाद नीतीश कुमार पर तंज भी कस देते थे और उसे बाद में अपने हिसाब से संशोधित भी कर लेते थे। इससे वे अपने वोटरों को संदेश देने में कामयाब हो रहे थे और नीतीश की लगातार छीछालेदर ...

बिना जनाधार वाला घाघ सरदार

नीतीश की समता पार्टी चुनाव लड़ती है। लगभग पूरा सफाया हो जाता है। फिर भाजपा से गठबंधन करते हैं और सीनियर पार्टनर और मुख्यमंत्री के दावेदार बनते हैं। नीतीश की जदयू 2014 का लोकसभा चुनाव अकेले लड़ती है। पूरी तरह खारिज हो जाती है। फिर लालू से गंठबंधन करते हैं। सीनियर पार्टनर और मुख्यमंत्री पद के दावेदार बनते हैं। महागठबंधन में सरकार चलाने से उनकी छवि पर छींटें पड़ते हैं और वे इन छींटों से बचने के लिए धुर विरोधी नरेंद्र मोदी की भाजपा की गोद में जा बैठते हैं। बिहार में चुनाव की दो धुरी भाजपा और लालू ही हैं लेकिन सरदार नीतीश बनते हैं. बिना जनाधार वाला सरदार. लोग रामविलास को मौकापरस्ती से जोड़ते हैं। सफल मौकपरस्ती के लिए दो बातों का होना जरूरी है। समय देखकर आप किसी से भी जुड़ जायें और आपको हर कोई खुद से जोड़ ले. नीतीश समय-समय पर सबसे जुड़े और समय-समय पर हर कोई उन्हें खुद से जोड़ने को तैयार रहता है लेकिन उन पर मौकापरस्त का टैग नहीं लगा। इसे घाघ राजनीतिज्ञ होना कहते हैं। बिना जनाधार वाला घाघ सरदार। नीतीश मुसलमानों की बात करते हैं और भाजपा के लंबे समय तक साझीदार रहे। नीतीश सवर्णों की भी...

मोनिका का दर्द और मेरा पत्रकारीय संतोष

मानसून की पहली बारिश में तन-मन से तर-बतर होकर ऑफिस पहुंचा ही था। रोज की तरह कम्प्यूटर ऑन किया। ब्राउजर पर जाकर एक के बाद एक पहले मेल आईडी, व्हाट्सएप, फेसबुक आदि पर लॉगइन किया। फेसबुक ओपन करते ही सामने जो तस्वीर थी, वो अधूरी होने के बाद भी जानी-पहचानी सी लगी। पोस्ट जागरण इंस्टीट्यूट में मेरी जूनियर रही मोनिका शेखर का था। चेहरे पर नाखुन के निशान काफी कुछ बयां कर रहे थे। उस पर ट्रेन में सीट के विवाद में उस समय हमला हुआ था, जब वह सीवान से नई दिल्ली के सफर पर थी। गोरखपुर और गोंडा के बीच हुए हमले के बाद भी ट्रेन की स्क्वायड से लेकर लखनऊ, बरेली, मुरादाबाद और यहां तक कि नई दिल्ली की रेल पुलिस पंगु बनी रही और एफआईआर दर्ज करने में आनाकानी करती रही। यह हाल तब था, जब कहीं से कोई राहत न मिलने पर मोनिका ने रेल मंत्री को ट्वीट किया था। मोनिका के पोस्ट को देखने के बाद मुझे लगा कि उसके लिए कुछ करना चाहिए। तब तक मैं मुत्तमईन नहीं था कि वह ट्रेन मेरे कार्यक्षेत्र बरेली से होकर गुजरी होगी। उधेड़बुन के बीच मैं अपना काम करता रहा पर ध्यान खामख्वाह उस पोस्ट पर चला ही जा रहा था। मैं बार-बार उसे पोस्ट क...

#Nitish को समझना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है

बिहार की राजनीति एक बार फिर से करवट ले रही है। महागठबंधन के नेताओं के रोज आ रहे नए-नए बयान सुर्खियां बन रहे हैं। आम के मौसम में जनता परिवार के बीच खटास बढ़ती जा रही है। हर एक बयान के बाद डैमेज कंट्रोल की कोशिश हो रही है तब तक एक नया बयान आ जाता है। रिश्‍ते तल्‍ख हो रहे हैं और बदलाव की आहट हर रोज सुबह के साथ महसूस हो रही है और शाम को फिर समन्‍वय की कोशिश हो रही होती है। छटपटाहट सभी को है पर पहल कौन करे। जाहिर है पहल नीतीश कुमार को ही करनी होगी क्‍योंकि लालू यादव ऐसा करने से रहे। केंद्र के बाद अब वे किसी भी कीमत पर बिहार की सत्‍ता से विमुख होना नहीं चाहेंगे। ऐसा नहीं है कि महागठबंधन में आई दरार का एकमात्र कारण राष्‍ट्रपति चुनाव ही है। इसकी खिचड़ी तब से पक रही थी, जब नीतीश कुमार को यह भान हो गया कि लालू प्रसाद यादव के साथ सरकार चलाने में उनकी ही मिट़टी पलीद होनी है। उनकी ही छवि को बट़टा लगेगा, क्‍योंकि लालू यादव जो कर रहे हैं वो उनके लिए नैसर्गिक है। उनका वोट बैंक भी यही चाहता है। इसलिए उन्‍हें कोई नुकसान नहीं है। नुकसान हर हाल में नीतीश कुमार को ही होना है। पिछले चुनाव में भी उन्...

गर्व करते रहिए कि हम बिहारी हैं

बिहार का होना आपकी नियति है और पलायन आपकी मजबूरी फिर भी इतिहास के पन्नों के आधार पर गर्व करते रहिए कि आप बिहारी हैं। और कर भी क्या सकते हैं। एक इतिहास ही तो है गर्व करने लायक। वर्तमान की दशा किसी से छुपी नहीं है और भविष्य के बारे में क्या कहने। बोर्ड परीक्षाओं के रिजल्ट का मौसम है। हर राज्य में छात्रों के अंकपत्र में नंबरों की बाढ़ सी आ गई लगती है और बिहार के छात्रों में इस समय मातमी सन्नाटा पसरा है। घरों के चिराग रोशन होने से पहले बुझ से गए प्रतीत हो रहे हैं। फिर भी आप गर्व करते रहिए कि आप बिहारी हैं और इतिहास में तथागत तुलसी जैसे विद्वान भी उस धरती पर पैदा हुए हैं। ऐसा नहीं है कि पहली बार बिहार बोर्ड का रिजल्ट का स्तर इतना गिरा है। 1996 का इम्तेहान कौन भूल सकता है, जब केवल 19% छात्र ही मै-ट्रिक पास कर पाए थे पर तब इस तरह का सन्नाटा और आक्रोश नहीं पसरा था। तब लोगों में इस बात की आस बंधी थी कि अब पढ़ाई का स्तर सुधरेगा और शिक्षा व्यवस्था को चार चांद लग जाएंगे, क्योंकि हाईकोर्ट के आदेश पर अभूतपूर्व सख्ती के बीच परीक्षा हुई थी। कुछ वर्षों तक परीक्षा व्यवस्था में लगातार सुधार देखा ...

#EVM! हम शर्मिंदा हैं

हां, हम शर्मिंदा हैं। हों भी क्यों न। साफ-सुथरा कई मतदान कराने के बाद भी तुम्हारे दामन पर इतने दाग जो लगाए जा रहे हैं। 1998 के बाद से अब तक तुमने चुनाव को निष्पक्ष और बेदाग बनाने के लिए जो अतुलनीय योगदान दिया, उसे हम भुला बैठे और स्वार्थ की खातिर तुम्हारी उपयोगिता पर ही सवाल उठा दिया। तुम्हारे कारण चुनाव आयोग को विदेशों यहां तक कि अमेरिका जैसे हाइटेक देश में प्रसिद्धि मिली और हमारे चुनाव आयुक्त गाहे-बगाहे वहां सम्मानित होते रहे। कैसे भूल सकते हैं तुम्हारे योगदान को। बूथ कैप्चरिंग को तुमने खत्म ही कर दिया। अब चुनाव में धांधली बीते जमाने की बात हो गई है। तुमने क्या नहीं किया। जो आज तुम पर उंगली उठा रहे हैं, उन्हें भी कभी तुम्हारे कारण सत्ता का स्वाद हासिल हो सका, वो भी अपने बलबूते। 2004, 2009 के आम चुनाव, 2007 और 2012 के विधानसभा चुनाव, दिल्ली और बिहार में विधानसभा चुनाव के बाद उन्हीं लोगों को सत्ता मिली थी, जो आज तुम पर कीचड़ उछाल रहे हैं पर आज जब उन्हें करारी हार मिली है तो तुम पर लांछन लगा रहे हैं। तुम्हारे चरित्र पर घटिया इल्जाम लगा रहे हैं। तुम्ही पर क्यों ये तो पूरी जनमानस ...