सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

गर्व करते रहिए कि हम बिहारी हैं



बिहार का होना आपकी नियति है और पलायन आपकी मजबूरी फिर भी इतिहास के पन्नों के आधार पर गर्व करते रहिए कि आप बिहारी हैं। और कर भी क्या सकते हैं। एक इतिहास ही तो है गर्व करने लायक। वर्तमान की दशा किसी से छुपी नहीं है और भविष्य के बारे में क्या कहने। बोर्ड परीक्षाओं के रिजल्ट का मौसम है। हर राज्य में छात्रों के अंकपत्र में नंबरों की बाढ़ सी आ गई लगती है और बिहार के छात्रों में इस समय मातमी सन्नाटा पसरा है। घरों के चिराग रोशन होने से पहले बुझ से गए प्रतीत हो रहे हैं। फिर भी आप गर्व करते रहिए कि आप बिहारी हैं और इतिहास में तथागत तुलसी जैसे विद्वान भी उस धरती पर पैदा हुए हैं।

ऐसा नहीं है कि पहली बार बिहार बोर्ड का रिजल्ट का स्तर इतना गिरा है। 1996 का इम्तेहान कौन भूल सकता है, जब केवल 19% छात्र ही मै-ट्रिक पास कर पाए थे पर तब इस तरह का सन्नाटा और आक्रोश नहीं पसरा था। तब लोगों में इस बात की आस बंधी थी कि अब पढ़ाई का स्तर सुधरेगा और शिक्षा व्यवस्था को चार चांद लग जाएंगे, क्योंकि हाईकोर्ट के आदेश पर अभूतपूर्व सख्ती के बीच परीक्षा हुई थी। कुछ वर्षों तक परीक्षा व्यवस्था में लगातार सुधार देखा गया और रिजल्ट का स्तर पर बाद के दिनों में सुधरता चला गया वो भी सख्ती के बावजूद। कुछ वर्षों के बाद फिर ढीलाढाली वाला रवैया शुरू हो गया और यह लगातार अपने न्यूनतम स्तर पर पहुंचता गया। पिछले साल ही बिहार बोर्ड की टॉपर रूबी प्रकरण को कौन भूल सकता है। यह भ्रष्टतम शिक्षा व्यवस्था का सबसे भयावह चेहरा था। टीवी चैनलों और सोशल मीडिया पर रूबी प्रकरण पर देश भर में बिहार की शिक्षा व्यवस्था के प्रति तिरस्कारात्मक नजरिया कायम हो गया। तब भी बिहार के कुछ साथी इतिहास बोध कराते हुए गौरवान्वित हुए जा रहे थे। कोई राजेंद्र प्रसाद की दुहाई दे रहा था तो कोई तथागत तुलसी का। दरअसल, सरकारों द्वारा राज्य के लोगों के मानस में भर दिया गया कि बिहार उत्तम है और सर्वोत्तम है। प्रतियोगी परीक्षाओं में बिहार के छात्रों की सफलता के उदाहरण दिए जाने लगे। सिविल सेवा, डीयू, जेएनयू, अन्नमलई, एएमयू आदि विश्वविद्यालयों में बिहार के छात्रों की सर्वाधिक या अन्य राज्यों की तुलना में अधिक संख्या के खोखले दावे प्रस्तुत किए जाने लगे। ये दावे सच से मुंह मोड़ने जैसे थे। इस साल रिजल्ट आने के बाद भी लोग बिहार की प्रतिभा के भोथड़े दावे सोशल मीडिया पर साझा कर रहे हैं। ऐसे लोग अंध बिहारी कहे जा सकते हैं। आज ही दिल्ली विवि का निष्कर्ष सामने आया है कि वहां बिहार के छात्रों की संख्या लगातार घटती जा रही है और उत्तर प्रदेश अब वहां अपनी बादशाहत कायम करने के कगार पर है। फिर भी आप गर्व करिए कि आप बिहारी है।

दरअसल, समाजवादी सरकार और चुनावी साल एक साथ हो तो बोर्ड के रिजल्ट अकसर रिकार्ड बनाने वाले होते हैं। दो साल पहले बिहार बोर्ड की परीक्षा में नकल की फोटो इतनी वायरल हुई कि यूएनओ में बिहार की शिक्षा व्यवस्था के चर्चा सुनने को मिले। वह साल चुनाव का था और जाहिर सी बात है चुनावी साल में समाजवादी लोग परीक्षा व्यवस्था में सख्ती का जोखिम मोल नहीं ले सकते। यह भी याद रखना चाहिए कि व्यापक समाजवादी गठबंधन की बात जब आकार ले रही थी तब मुलायम सिंह यादव ने नीतीश कुमार को परीक्षा में सख्ती न बरतने की नेक सलाह दी थी। उत्तर प्रदेश में जब समाजवादी सरकार थी, तब भी हालात वहीं थे। मुलायम पहली बार मुख्यमंत्री बने थे, तब तो नकल अध्यादेश को ही ठंडे बस्ते में डाल दिया था।
अब आते हैं बिहार की शिक्षा व्यवस्था पर। अब तक वहां कोई वर्ल्ड क्लास क्या, राज्य स्तरीय शिक्षा का प्लेटफॉर्म मौजूद नहीं है। स्कूलों में आधारभूत सुविधाएं तो भूल ही जाइए, कॉलेजों में लैब तक नहीं हैं। लैंब जहां हैं भी वहां अकसर ताले लगे रहते हैं। साइंस स्ट्रीम में प्रवेश लेकर छात्र कोचिंगों के शरणागत हो जाते हैं। कोई भी विश्वविद्यालय तय सत्र समय में परीक्षा नहीं करा पाता। विकास की बातें होती हैं तो रोड तक आकर सिमट जाती है। शिक्षा तो वहां विकास के पैमाने में आता ही नहीं है। शिक्षक रिटायर होते जा रहे हैं। अधिकांश स्कूल शिक्षामित्रों के हवाले है। शिक्षकों की भर्ती के नाम पर निकाय शिक्षक, पंचायत शिक्षक, नगर शिक्षक भर्ती किए जा रहे हैं। इनमें से कोई पद फुलटाइमर नहीं है। छात्र मैट्रिक में जाता है, उससे पहले ही घरवाले सोचने लगते हैं कि उसे दिल्ली भेजना है या कहीं और। उत्तर प्रदेश से सटे जिलों के छात्र बीएचयू को आसान ऑप्शन मानते हैं नहीं तो इलाहाबाद और दिल्ली का रुख कर लेते हैं। नौकरी और रोजगार को तो कोई पुरसाहाल ही नहीं है। रोजगार के लिए पलायन इस कदर है कि 1000 ट्रेन और चला दी जाए तो भी सीट शायद ही आसानी से मिल पाए। विश्वास न हो तो एक बार बिहार जाने और बिहार से आने वाले ट्रेन में सफर करके देख लीजिए। हर तीसरे घर का कोई न कोई तड़ीपार है या अंग्रेजी में कहें तो नॉन रेजिडेंट बिहारी। होली और छठ पर ही घर और घरवालों के दर्शन हो पाते हैं। दूसरी ओर, अहं इस कदर है कि बिहार की प्रतिष्ठा धुमिल न होने पाए। अरे काहे का अहं भइया।

समाजशास्त्र कहता है कि व्यक्ति से समाज बनता है और समाज से राज्य। व्यक्ति का विकास होगा तो समाज का और समाज का होगा तो राज्य का। दुर्भाग्यवश बिहार में व्यक्ति का ही विकास नहीं हुआ, बाकी समाज और राज्य का क्या खाक होगा। समाजशास्त्र बिहार में फेल है और वो भी समाजवादी सरकार में। फिर भी आप गर्व करते रहिए कि आप बिहारी हैं। 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

#gaurilankesh : मौत हो तो ऐसी

मौत हो तो ऐसी। एक मिनट पहले तक जिन्हें कर्नाटक के बाहर बहुत अधिक नहीं जाना जाता था, उन्हें मरते ही पल भर में अनंत शोहरत हासिल हो गई। जगह-जगह मातमनुमा उल्लास-उत्सव मनाया जाने लगा। पिघलती मोमबत्तियां अगाध श्रद्धांजलि का भाव पैदा करने लगीं। देश की राजधानी दिल्ली में मातमपुरसी का आयोजन कर राजनीति की रोटियां सेंकी गईं और तमाम सेलिब्रिटी ने अपने जौहर दिखाए। क्या करें भाव भले मातम का न हो, माहौल तो मातम का था न। #gaurilankesh कर्नाटक की पत्रकार की हत्या की खबरें टीवी पर कुछ यूं फ्लैश की गईं: कर्नाटक की पत्रकार #gaurilankesh की हत्या, गौरी हिन्दूवादी राजनीति की धुर विरोधी थीं और भाजपा की नीतियों का विरोध करती थीं। मेरे दस साल के कैरियर में खबर फ्लैश करने का यह नया और आधुनिक तरीका लगा। गौरी लंकेश के बारे में यही पूरी जानकारी थी और उन्हें इससे अधिक समझने का मौका न तो मानस को दिया गया और न ही पत्रकारों ने खुद इसमें अपनी दिलचस्पी दिखाई। मुझे भी उनके बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं थी। लगा कि किसी महिला की हत्या कर दी गई होगी। मुझे क्या पता था कि इसमें बहुत मसाला है और इतना मसाला है कि स...

राम मंदिर निर्माण के लिए बरस रहा पैसा

  इस समय पूरा देश राममय हो गया है. राम भक्‍ति में सराबोर देशवासियों ने मात्र 72 घंटों में 246 करोड़ रुपये दान के रूप में दिया है. छोटा हो गया बड़ा, इस दान के कार्य में अधिकांश देशवासी अपना योगदान दे रहा है. राम मंदिर के लिए हर घंटे 3.41 करोड़ रुपये जमा हो रहे हैं. अगर इसे मिनट में बांटे तो एक मिनट में 57 लाख रुपये जमा हो रहे हैं.  42 दिन तक चंदा इकट्ठा करने का काम. चलेगा और इसकी रकम एसबीआई, पीएनबी और बैंक ऑफ बड़ौदा में जमा की जा रही है. बैंकों के कुल 46000 ब्रांचों से पूरे देश को कवर किया जाएगा. 15 से 31 जनवरी तक रशीद काटकर चंदा जुटाया जाएगा. एक से 27 फरवरी तक कूपन के जरिए चंदा जुटाया जाएगा. चंदे के लिए 10, 100 और 1000 रुपये के कूपन जारी किए जाएंगे. 100 रुपये के 8 करोड़ कूपन छापे जाएंगे तो 10 रुपये के 4 करोड़ और 1000 रुपये के चंदे के लिए 12 लाख कूपन छापे जाएंगे.  विहिप और आरएसएस से जुड़े 40,00,000 कार्यकर्ताओं को दी गई है. इसके लिए 10 लाख टोली बनाई गई है, हर चार टोली पर एक कलेक्‍टर बनाया गया है, जिसकी जिम्‍मेदारी बैंक में पैसा जमा कराने की होगी. अब तक का सबसे बड़ा 11 कर...

दिल्ली में हिंसा का 'सालाना जलसा'

दिल्‍ली में हिंसा अब सालाना जलसे की तरह हो गई है. पिछले साल नागरिकता कानून के नाम पर दिल्‍ली को भड़काया गया तो इस बार किसान आंदोलन के नाम पर दिल्‍ली को दहलाया गया. संभव है कि अगले साल कोई और बहाने से किसी और को आगे कर अपना उल्‍लू सीधा किया जाए. कुल मिलाकर सरकार को नवंबर के बाद सचेत हो जाना चाहिए, क्‍योंकि इसकी क्रोनोलॉजी समझना बेहद जरूरी है. वो तो खैर मनाइए कोरोना महामारी का कि दिल्‍ली का दंगा कंट्रोल हो गया, नहीं तो हम वो देखने वाले थे, जो कभी सोच भी नहीं सकते थे. ये जो तस्‍वीरें आप देख रहे हैं, वो आपको विचलित करने के लिए काफी हैं. गणतंत्र दिवस जैसे गौरवशाली दिन, जब हमें दुनिया को अपना गौरव दिखाना होता है, उस दिन को आंदोलन के नाम पर राष्‍ट्रीय शर्म बना दिया गया. एक तरफ जवान दुनिया के सामने अपना फौलादी इरादा जाहिर कर रहे थे तो दूसरी ओर, दिल्‍ली को दहलाने के लिए कुछ साजिशें कुछ कर गुजरने के लिए बेकरार हो रही थीं. तभी तो तय समय से पहले कई जगहों पर दिल्‍ली पुलिस की बैरिकेडिंग तोड़ने की खबरें आने लगीं. यह पहले से तय था कि आज का दिन भारी साबित होने वाला है, फिर भी सरकार और दिल्‍ली पुलि...