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छिछोर है कन्‍हैया

कन्‍हैया छिछोर है, बदतमीज है, आवारा है लेकिन कुछ लोग मजबूर हैं कन्‍हैया की तारीफ करने के लिए। क्‍या करें बेचारे, सामने कोई बड़ा चेहरा ही नहीं है। नीतीश कुमार जीत जाते हैं तो उनमें अपना चेहरा देखने की कोशिश, ममता जीत जाएंगी तो उनमें एक चेहरा ढूंढने की कोशिश, केजरीवाल एक चलता-फिरता चेहरा हैं ही, रोहित वेमुला भी चेहरा हो जाते हैं। कन्‍हैया और उमर खालिद भी एक विकल्‍प हैं या फिर विकल्‍पहीनता के मारे हुए लोगों का चेहरा हैं। दूसरी ओर, स्‍वमेव राहुल गांधी पापड़ की तरह सतह पर हैं ही, जिनके इर्द गिर्द हमेशा बरी थोपने की कोशिश की जाती है। जब जो लोग सफल हो जाते हैं, वे राहुल गांधी और बाकियों को वैसे ही कोसते रहते हैं, जैसे अरविंद केजरीवाल। जो लोग सफल नहीं हो पाते, वे राहुल गांधी में ही अपना चेहरा ढूंढते रहते हैं। विकल्‍पहीनता के मारे लोगों को क्‍या कहें, जिस आवारा कन्‍हैया को पेशाब करने का सऊर नहीं है उसे राष्‍टृीय राजनीति के परिप्रेक्ष्‍य में खड़ा करने की कोशिश करते हैं। दिल्‍ली विवि की एक असिस्‍टेंट प्रोफेसर ने खुलासा किया है कि जेएनयू कैंपस में कन्‍हैया बेतरतीब तरीके से पेशाब कर रहा था। ...

कन्हैया जेलगमनम्

द्वापर युग में कन्हैया के पापा जेल गए थे। तब कंस का राज था। अब कलयुग में स्वयं 'कन्हैया' को ये दिन देखना पड़ रहा है। अभी यहाँ मोदीराज है। तब स्थितियां अलग थीं और अब के हालात अलग। नाम का लोचा फंस रहा है। कन्‍हैया यहां कथित तौर पर खलनायक है पर समय बीतने के साथ उसकी खलनायकी संजय दत्‍त की तरह निखरकर नायक वाली बन रही है। काफी अंतर्विराेध है। सब कुछ द्वापर युग की तरह तय नहीं है, जैसा कि हम ग्रंथों और टीवी चैनलों के माध्‍यम से जान पाए हैं। वर्षों बाद जब इस समय का इतिहास लिखा जाएगा तो लोगों के विचारों में मोदी और कन्‍हैया को लेकर वो साम्‍य नजर नहीं आएगा। नौ फरवरी की रात ऐतिहासिक हो गई है। उस रात के अंधेरे से एक चिराग पैदा हुआ है। उस चिराग की चकाचौंध विचित्र है। उसकी विचित्रता आधा गिलास खाली और आधा भरा हुआ टाइप है। हाल में बनी उसकी छवि सर्वस्‍वीकार्य नहीं है। अब तक यह तय नहीं हो पाया है कि उसका उभार प्राकृत्रिक है या कृत्रिम। उभार के बाद का उभार तो कृत्रिम है यानी मीडिया की माइकें और लाइट, कैमरा और एक्‍शन फेयर एंड लवली टाइप हैं। हाल में एक नेता ने संसद में फेयर एंड लवली का जोर शोर ...

जो दिखा वो सच नहीं है!!!!

ऐसा बहुत कम होता है कि जो दिखता है, वो सच नहीं होता लेकिन ऐसा होता है, यह भी एक सच है। सच न हो तब भी सच मान लीजिए कि यह एक सच है। बैक गियर लगाते हुए हम फिर मालदा और पूर्णिया की घटना को याद करना चाहेंगे। उस घटना में जो दिखाया गया, वो सच नहीं था। रोहित वेमुला की मौत के पीछे के कारणों को अनुमानित रूप से सच मान लिया गया, जबकि देखा किसी ने नहीं था। यहां हम कह सकते हैं कि जो नहीं दिखता, वो सच होता है। अब आते हैं दृश्य माध्यमों से खेले जाने वाले खेल पर। एक चैनल ने दिखाया कि जेएनयू में अफजल की बरसी मनाई गई और उस दौरान राष्ट्रविरोधी नारे लगाए गए। अगले ही दिन ऐसे ही एक कार्यक्रम में दिल्ली प्रेस क्लब में देशविरोधी नारों को हवा दी गई। बवाल मचना लाजिमी था, क्योंकि यहां सरकार वर्सेज अन्य नहीं, देश वर्सेज गद्दारों का हिट शो चल रहा था। लिहाजा न चाहते हुए भी अन्य चैनलों को इसे फॉलो करना पड़ा। शतरंज में शह के बाद मात होता है लेकिन इस प्रकरण में मात के बाद शह का खेल खेला गया। बाकी चैनल मात खा गए लिहाजा उस न्यूज चैनल को सवालों के घेरे में लाने और गद्दारों को शह देने की भरसक कोशिश की...

सियाचिन के हनुमान

बेवफा हुआ सियाचिन का मौसम बर्फ की चादर कब्र बन गई कब्र से जिन्दा निकले हनुमंथप्पा दुनिया की आँखें फटी की फटी रह गईं देश ने दवा की, देशवासियों ने दुआ जान की भीख मांगने निकलीं माँ, बहन व बुआ कैसे बचते 'हनुमान' जब कुदरत ही बेवफा हो गए सियाचिन तो बचा लेंगे हम दुश्मन की छाती पर चढ़ लेंगे हम पा लेंगे विजय कोहराम मचाकर मगर राम से 'हनुमान' तो बेवफा हो गए जीवाश्म छोड़ चले 'हनुमान' भले ही पर बताओ कब 'हनुमान' मरे हैं 'हनुमान' अजर हैं, अमर हैं दिल में हैं 'हनुमान', मन में हैं 'हनुमान' बोलो जय जय जय हनुमान बोलो जय जय जय हनुमान रचयिता: सुनील मिश्र 'सुनील'

क्‍योंकि दलित शब्‍द बिकता है

div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"> देश भर में यह बहस चल पड़ी है कि रोहित वेमुला दलित था या नहीं। सत्तापक्ष कह रहा है कि वह दलित नहीं था और विपक्ष उसके दलित होने पर अपना वीटो लगा रहा है। चिंता की बात तो यह है कि सामाजिक चिंतक, विश्लेषक और पत्रकार भी इस बहस का हिस्सा बन गए हैं। इस देश में किसी की मौत सनसनी नहीं है। सनसनी है उसका दलित होना या न होना। रोहित की आत्महत्या के बाद तो हमें अपने सिस्टम की खामियों को दुरुस्त करने को लेकर बहस छेड़नी चाहिए थी पर अफसोस! हम तो अभी इस जाल में फंसे हैं कि दलित मरा या गैरदलित। कोई नहीं कह रहा कि एक छात्र मरा, एक इंसान मरा, एक मां का बेटा मरा या फिर एक बहन का भाई मरा। इंसान होना, एक छात्र होना, एक मां का बेटा होना, एक बहन का भाई होना किसी के लिए मायने नहीं रखता। मायने रखता है उसका दलित होना या न होना। क्‍योंकि दलित शब्‍द बिकता है। ये किस तरह की मातमपुरसी है? चलो राजनीति करनी है, अपनी जमीन मजबूत करनी है या तलाश करनी है या खोई जमीन हासिल करनी है तो शौक से करो लेकिन इतना मत गिर जाओ। विपक्षी नेताओं को दलित ...

राजनीति की रोटी

पिछले पोस्ट में आपने पढ़ा था कि दादरी का जवाब मालदा और पूर्णिया है तो पठानकोट का क्या? दादरी पर सरकार कठघरे में थी तो मालदा और पूर्णिया में विपक्ष। प्रधानमंत्री की पकिस्तान यात्रा के तुरं बाद रिटर्न गिफ्ट में मिली पठानकोट की घटना के बाद सरकार फिर कठघरे में थी। सरकार के लिए संक्रांति के समय अच्छी खबर पाकिस्तान से आई कि जैश के मुखिया को गिरफ्तार कर लिया गया है पर समय के साथ इस खबर की हवा निकल गई। सरकार अब तक कठघरे में थी ही कि एक और अशुभ समाचार ने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया। हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में रोहित नाम के दलित छात्र ने आत्महत्या कर ली। राजनीतिज्ञों के लिए इस तरह की घटनाएं तो राजनीति चमकाने का जरिया होती हैं। हैदराबाद इस समय नेताओं के लिए हॉट केक बना हुआ है। मेरी राजनीति अच्छी है और तुम्हारी खराब की तर्ज़ पर एक नेता जा रहा है तो दूसरा आ रहा है। पठानकोट की घटना के बाद से अब तक सरकार कठघरे में है। सरकार के लिए नए साल में कोई खुशखबरी नहीं आई है। इसलिए सरकार अभी तक रक्षात्मक मुद्रा में ही है। हालाँकि दिखाने के लिए वह आक्रामक तेवर अपनाए हुए है। जैसे ही पठानकोट, हैदरा...

क्‍या दादरी का जवाब है मालदा तो पठानकोट का क्‍या?

पठानकोट की दहशत, मालदा में उत्पात और पूर्णिया में उपद्रव के बाद क्या? दहशत का यह ‘कारवां’ क्या ऐसे ही थम जाएगा, कदापि नहीं। दहशत की दुकान ऐसे बंद नहीं होती। कुछ और शहर तय कर लिए गए होंगे। लिस्ट बहुत लंबी है। यह अलग बात है कि घटना होने के बाद ही हमें और आपको पता चलेगा। किस शहर का नाम आगे है और किसका पीछे, यह शहर के दुर्भाग्य पर निर्भर करता है। मन अशांत है, लोग शांत हैं। एके हंगल साहब होते तो पूछते- इतना सन्नाटा क्यों पसरा है भाई? अब वे नहीं हैं तो चलो मैं ही पूछ लेता हूं। कैसी विचाराग्नि है? घटना को चुन-चुनकर धधकती है। सोशल साइट पर पक्ष और विपक्ष है। तीसरा पक्ष गायब है। अजीब तरह का माहौल हो गया है। पठानकोट के समय मुंबई हमले की छुई-अनछुई बातों को बेपर्दा किया जा रहा है। मालदा की तुलना दादरी की घटना से हो रही है। फोटोशॉप का खूब प्रयोग हो रहा है और एकदम से विश्वास किया जाने वाला झूठ पैदा किया जा रहा है। आप समझ रहे हैं कि यह सतही और उच्छृंखल लोग ही कर रहे हैं लेकिन आप गलत हैं। बड़े लोग खासकर उच्च पदों पर आसीन वर्ग के लोग ऐसा कर रहे हैं। बड़े-बड़े पत्रकार इस पेशे में लग गए हैं। ऐसा सिर्फ एक...