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मैं निर्भया हूं

मैं निर्भया हूं। आपकी अपनी निर्भया। सर्द रातों में वहशी दरिंदों की शिकार निर्भया। वहशीपन भी ऐसा कि क्या कहूं। खैर, मैं दुनिया से रुखसत हो गई लेकिन फिर भी आप सबके बीच हूं। दिखावे के लिए ही सही, ‘16 दिसंबर’ अब सिर्फ एक फिल्म का नाम नहीं रहा। अब यह मेरे और मेरे जैसे कितनी पीड़िताओं के साथ हुए पाप का प्रायश्चित करने का एक दिन बन गया है। आप सब कितने अपनेपन से इस दिन मुझे याद करते हैं। इसी बहाने लड़कियों की सुरक्षा के नए-नए संकल्प लेते हैं। मुझे खुशी है कि मैं हजारों-लाखों लड़कियों की सुरक्षा के उपाय करने का जरिया बन गई हूं। मैं समझती हूं कि मेरा जीवन सफल हो गया। मेरी कुर्बानी जाया नहीं गई और कुछ अच्छे कामों को पूरा करने का बहाना बन गई है। जैसा कि आप सब जानते हैं, मेरे साथ वहशीपन करने वाले दरिंदों में से तब एक नाबालिग भी था। मेरे साथ हुए पाप में वह बराबर का साझीदार था। आजकल वह  चर्चाओं में है। टीवी, सोशल मीडिया और अखबारों में अभी एक बहस चल पड़ी है। उसे छोड़ा जाना चाहिए कि नहीं। उसने जो पाप किया था, उसकी सजा तो अधिक है पर नाबालिग होने के कारण उसे सजा कम हुई और वह बाहर निकल रहा...

ये जो रावण है.....

सीता हरण ब्रह़मांड का सबसे पहला हाईटेक अपहरण कांड था। एक स्‍त्री के अपहरण के लिए उस समय के तीव्रतम पुष्‍पक विमान का प्रयोग किया गया था। आज अपहरण कितना सस्‍ता और आसान हो गया है। राह चलते आदमी को गन्‍ने के खेत में खींच लो और मीलों पैदल टहलाओ। बाइक पर बैठाकर ले जाओ। वैन से अपहरण काफी चलन में है लेकिन इस रावण ने तो अपहरण को और भी सरल करके दिखा दिया। रिक्‍शे से अपहरण, सुनने में थोड़ा अजीब जरूर लग रहा है पर इसका अपना अलग प्रतीकात्‍मक महत्‍व है। वो लंकेश था, लंकाधीश था, कुबेर का भाई था। दूसरी ओर यह सिर्फ और सिर्फ रावण है। यह रावण शानो-शौकत में भरोसा नहीं रखता। वैभव के नाम पर इस रावण के पास पहनावा-पोशाक के साथ रिक्‍शा और उसका चालक है लेकिन इसकी सोच जमीनी है। लंकापति रावण ने रंजिश में सीता का अपहरण किया था। उस दौरान वह दंभ में चूर था पर इस रावण के चेहरे पर दंभ नहीं है। पुष्‍पक विमान पर रावण और सीता के अलावा और कोई नहीं था पर इस रिक्‍शे पर रावण और सीता के अलावा रिक्‍शाचालक है। रिक्‍शाचालक अपना काम तल्‍लीनता से कर रहा है। रावण के चेहरे पर अपना एक भाव है पर सीता इसमें वाकई अबला नारी बन बैठी है...

झूठ की संवेदनाओं से आंसुओं का सैलाब न बहाइए

सीन एक  राज्यसभा में कांग्रेस सांसद कुमारी शैलजा यह कहते हुए भावुक हो जाती हैं कि गुजरात के एक मंदिर में उन्हें इसलिए नहीं घुसने दिया गया, क्योंकि वह दलित हैं। वह रो पड़ती हैं और राज्यसभा में जोरदार हंगामा होता है। क्या है सच : जिस मंदिर का जिक्र कुमारी शैलजा ने किया, वहां के विजिटर बुक में उन्होंने मंदिर की  तारीफ में कलम तोड़ दिए थे। भाजपा नेता अरुण जेटली ने इसका खुलासा किया तो न ही कांग्रेस पार्टी और न कुमारी शैलजा ने ही इसका खंडन किया। सीन दो सोमवार को संसद की कार्यवाही शुरू हुई तो कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने मुद्दा उठाया कि असम के एक मंदिर में आरएसएस वालों ने उन्हें नहीं घुसने दिया। इस पर भी सदन में काफी हंगामा हुआ और कांग्रेस के सदस्यों ने वाकआउट कर दिया। क्या है सच :  शाम तक मंदिर के ट्रस्टी का भी बयान आ गया कि ऐसी कोई घटना ही नहीं हुई है। ट्रस्टी ने यह भी कहा कि मंदिर का संचालन ट्रस्ट करता है तो इसमें आरएसएस वाले कहां से आ गए। यह नकारात्मक राजनीति है। 1800 ई. में अमेरिकी राष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनाव में इसका पहली बार इस्तेमाल किया गया थ...

कोर्ट नहीं देखता, आरोपी सोनिया हैं या सलमान

दिसंबर के दूसरे सप्ताह में कोर्ट से दो फैसले आए। दोनों हैरान करने वाले थे।  एक फैसले में गांधी परिवार की ‘संप्रभुता’ को तगड़ी चुनौती मिली थी और दूसरे में हिट एंड रन मामले में सलमान खान बरी हो गए थे। दोनों फैसलों ने इसलिए हैरान किया कि देश में गांधी परिवार के बारे में ये माना जाता है कि वो किसी भी प्रकार की कार्रवाई से उपर है। दूसरा, अदालत द्वारा दोषी ठहराए गए सलमान खान एकाएक कैसे बेदाग हो सकते हैं। खैर फैसले आए और छा गए। दोनों फैसलों के निहितार्थ तलाशे जाने लगे। तब तक संसद की कार्यवाही ने गति पकड़ी ही थी लेकिन कोर्ट के फैसले आने के बाद विधायिका का काम अवरूद्ध कर दिया गया। सोनिया गांधी का भी बयान आया- मैं इंदिरा गांधी की बहू हूं और मैं किसी से नहीं डरती। अगले दिन राहुल गांधी बोल पड़े - ये सारे फैसले राजनीतिक द्वेष में प्रधानमंत्री कार्यालय के दबाव में कराए जा रहे हैं। यह बयान सिर्फ एक बयान नहीं था और ऐसा बयान राहुल गांधी ही दे सकते थे। यह न्यायपालिका पर सीधा आक्षेप था। चूंकि परिवार को तगड़ी चुनौती मिली थी तो वे सुध बुध खो बैठे थे। अब चूंकि राहुल गांधी की तंग जिह्वा ने चाहे गलतबया...

रफ्तार भी कोई चीज है

रफ्तार के बाजार में हमने कितनी लेट एंट्री मारी है? ऐसे लग रहा है जैसे आधा से अधिक सिलेबस खत्म होने के बाद किसी छात्र ने क्लास में एडमिशन लिया है। हम खुद को 21वीं सदी का देश मान रहे हैं, पूरे विश्व का नेतृत्व करने का दंभ भर रहे हैं। अमेरिका, चीन और जापान को पीछे छोड़ने की बात कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमेरिका, चीन, रूस, फ्रांस और ब्रिटेन के सामने खड़े होने को बेकरार हैं लेकिन.....। यह लेकिन बहुत बड़ा लेकिन है। क्या हम अमेरिका और बाकी देशों के बराबर खड़े भी हो पाए हैं। क्या विश्व हमें अपना नेता केवल इसलिए मान ले कि हमारे यहां कभी कोहिनूर था और हमारे देश को सोने की चिड़िया कहा जाता था। या केवल इस बात के लिए विश्व हमें नमन करे कि यहां कभी नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय होते थे। क्या हम इसलिए सरदार हो गए हैं कि हमारे पास विश्व की दूसरी सबसे अधिक जनसंख्या है। अगर आप ऐसा सोच रहे हैं तो गलत हैं। हम ऐसा तभी कर पाएंगे जब हम उनकी बराबरी करेंगे, विकास करेंगे। हमारा रहन-सहन भी विश्वस्तरीय होना चाहिए। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक हम नाहक मूंगेरीलाल के हसीन सपने देखते रहेंगे। ...

मुसलमान बुद्धिजीवी ही मुस्लिमों के सबसे बड़े दुश्मन

ये बात हम क्यों कह रहे हैं? इसको समझना होगा। किसी भी मुस्लिम बुद्धिजीवी से बात करो तो वो कौम की बात पहले करता है, समाज या व्यक्ति विशेष की बात बाद में। मुस्लिमों में यह बात भर दी गयी है कि कौम की तरक्की में ही उनकी तरक्की है। कोई मुस्लिम बुद्धिजीवी यह बात कहने का साहस नहीं करता कि व्यक्ति की तरक्की में समाज की तरक्की है और समाज की तरक्की में देश की तरक्की है। कौम की तरक्की की बात करने से चंद कठमुल्ले फायदा उठा ले जाते हैं और आम मुसलमान इसी बात से खुश हो जाता है कि उसके कौम की तरक्की की बात हो रही है। उसे तनिक भी भान नहीं होता कि वह ठग लिया गया। टीवी पर भी मुसलमानों के मसाइल पर किसी प्रोफेसर या समाजशास्त्री को चर्चा के लिए नहीं बुलाया जाता। वहां पर भी कठमुल्लों का सिक्का चलता है। मुसलमानों से बाहर की दुनिया भी मानकर चलती है कि कठमुल्ले ही मुस्लिम मसाइल पर बेहतर चर्चा कर सकते हैं। जाहिर है कोई विद्वान वो बात नहीं कर पायेगा जो कठमुल्ला कर सकता है और धर्म के नाम पर बरगला सकता है। इसी कारण सीरिया, यमन, फलिस्तीन आदि देशों में हुई घटनाएं अपने यहाँ स्वाभाविक रूप से सुर्खियां बन जाती है...

....क्योंकि हम देश के लिए खाते हैं

हम कांग्रेस के लोग कांग्रेस को सत्यनिष्ठा से बिना किसी लाग-लपेट और स्वार्थ के संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न और कानून से ऊपर, गांधी परिवार की बपौती पार्टी मानते हैं और श्रीमती सोनिया गांधी को न सिर्फ पार्टी बल्कि देश की राजमाता और श्रीमान राहुल गांधी को युवराज घोषित करते हैं तथा यह भी तय करते हैं कि इन दोनों पर किसी तरह की क़ानूनी कार्यवाई होने पर हम देश भर विरोध प्रदर्शन करेंगे और संसद की कार्यवाही को बाधित कर देंगे, क्योंकि हम इनदोनो को कानून से ऊपर मानते हैं। हम एतद् द्वारा इस प्रस्तावना को अंगीकृत, अधिष्ठापित और आत्मार्पित करते हैं। हम कांग्रेस के लोग सर्वसम्मति से इसी प्रस्तावना को मूल आधार मानते हैं। यह प्रस्तावना पार्टी को एक सूत्र में बांधती है। हमारी पार्टी में राजमाता या युवराज के खिलाफ बोलना राजनितिक आत्महत्या माना जाता है। विडम्बना की बात है कि देश की सबसे पुराणी पार्टी और स्वाधीनता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका होने पर भी आज कांग्रेस के बारे में उल्टा सीधा कहा जा रहा है। आजादी की खुमारी इतनी जल्दी उतार जायेगी ये तो हम कांग्रेसियों ने सोचा ही नहीं था। मजाक था क्या एओ ह्यूम की प...