मैं निर्भया हूं। आपकी अपनी निर्भया। सर्द रातों में वहशी दरिंदों की शिकार निर्भया। वहशीपन भी ऐसा कि क्या कहूं। खैर, मैं दुनिया से रुखसत हो गई लेकिन फिर भी आप सबके बीच हूं। दिखावे के लिए ही सही, ‘16 दिसंबर’ अब सिर्फ एक फिल्म का नाम नहीं रहा। अब यह मेरे और मेरे जैसे कितनी पीड़िताओं के साथ हुए पाप का प्रायश्चित करने का एक दिन बन गया है। आप सब कितने अपनेपन से इस दिन मुझे याद करते हैं। इसी बहाने लड़कियों की सुरक्षा के नए-नए संकल्प लेते हैं। मुझे खुशी है कि मैं हजारों-लाखों लड़कियों की सुरक्षा के उपाय करने का जरिया बन गई हूं। मैं समझती हूं कि मेरा जीवन सफल हो गया। मेरी कुर्बानी जाया नहीं गई और कुछ अच्छे कामों को पूरा करने का बहाना बन गई है। जैसा कि आप सब जानते हैं, मेरे साथ वहशीपन करने वाले दरिंदों में से तब एक नाबालिग भी था। मेरे साथ हुए पाप में वह बराबर का साझीदार था। आजकल वह चर्चाओं में है। टीवी, सोशल मीडिया और अखबारों में अभी एक बहस चल पड़ी है। उसे छोड़ा जाना चाहिए कि नहीं। उसने जो पाप किया था, उसकी सजा तो अधिक है पर नाबालिग होने के कारण उसे सजा कम हुई और वह बाहर निकल रहा...