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बिहार चुनाव जीतने में जुबां बनी बाधा

बिहार में एनडीए की हार क्या दिल्ली के इर्द-गिर्द हुई घटनाओं से तय होगी। एक से एक घटनाएं हो रही हैं जिसमें बेशक एनडीए सरकारों का कोई हाथ नहीं है पर जिम्मेदारी से वे बच नहीं सकते। खास बात यह है कि  बिहार में भाजपा दलितों को ही साधने में लगी हुई है। इसी कारण वहां पार्टी ने दो दलित नेताओं राम विलास पासवान और जीतन राम मांझी पर दांव लगाया है लेकिन हरियाणा की घटनाओं से ये दोनों ही नेता बिदक गए हैं। हरियाणा में हुई दलित परिवारों के साथ लगातार हुई दूसरी घटना से भारतीय जनता पार्टी अपनों के निशाने पर आ गई है। इसके बाद केंद्र और राज्य सरकार के मंत्रियों की बयानबाजी ने आग में घी का काम किया है। दूसरी ओर, बिहार में इन्हीं सब घटनाओं और बयानवीरों का बखान कर महागठबंधन अपनी पैठ बनाने में जुट गया है। जुबान के जले : ऐसे तो नेताओं की बयानबाजी अपने आप में अनोखी मानी जाती है। जानते वे ए के बारे में हैं और बताते जेड के बारे में। ऐसी बयानबाजी से ही नेता बिरादरी एक दूसरे को आगे-पीछे करने में लगी रहती है। एक नेता बयान देने वाला होता है तो दूसरा लपकने वाला। इसी तरह नेता बिरादरी एक-दूसरे की टांग खींचने म...

आओ बुराई को ख़त्म करें

आज बुराई को जलाने का दिन है। मिटाने का दिन है। क्या कारण है कि हर साल बुराई को जलाया जाता है और वो फिर तनकर खड़ी हो जाती है। कारण यह है कि हम इसे प्रतीकात्मक रूप से करते हैं, मन से नहीं। आइए मन से बुराई को जलाएं। कुछ नहीं कर सकते तो एक मच्छर तो मार ही सकते हैं। .... तो आइये हम बुराई को भगाने का भगीरथ प्रयास शुरू करें। शुरुआत देश के प्रधानमंत्री से करते हैं। वे दाल को सस्ता कर एक बुराई ख़त्म कर सकते हैं। साथ ही वे इस बात की ताकीद कर सकते हैं कि महंगाई नामक बुराई दाल या किसी अन्य पदार्थ को अब निशाना नहीं बना सकेगी। प्रधानमंत्री आज एक काम और कर सकते हैं कि अपने नेताओं और मंत्रियों की जुबान पर लगाम लगाने का काम कर सकते हैं। जुबान पर लगाम न लगा पाना बहुत बड़ी बुराई है। कहा जाता है कि जीभ पर लगा जख्म जल्दी ठीक हो जाता है पर जुबान से लगी चोट जिंदगी भर जख्म देती है। अब बात करते हैं राहुल गांधी की। इनकी एक बहुत गन्दी आदत है बिना बताए गायब हो जाना। यह भी एक बुराई है। आज के दिन प्रण लेकर इन्हें इस बुराई से मुक्त होने की कोशिश करनी चाहिए। जो आदमी कांग्रेस पार्टी जैसे संगठन का उपाध्यक्ष हो, सा...

बिहार चुनाव का रक्तचरित्र

यहां चलता है धनबल और बाहुबल का जोर जुबाने नही, यहां गोलियां करती हैं फैसला कैसे होगा शांतिपूर्वक चुनाव यहां बिहार में सोमवार से विधानसभा चुनाव का आगाज हो रहा है।  महीनों से यहां का माहौल गरमाया हुआ है लेकिन चुनावी चरण में प्रवेश करते ही वातावरण और गरमाता जाएगा। चुनाव लड़ने वाले तन, मन और धन से प्रचार में जुटे हैं, वहीं उनके पक्ष में प्रचार करने के लिए दिल्ली और पटना से नेताओं की फौज पूरे राज्य के माहौल को गरमा रही है। नेताओं की बेचारगी उनके चेहरे से दिख रही है। हाथ जोड़े हुए, जिसको कभी पास फटकने नहीं दिया, उसका पैर छुते हुए, गली-गली खाक छानते हुए नेता एक-एक वोट को अपने खाते में जमा करने के लिए पसीने बहा रहे हैं। ध्यान रहे, यह पश्चाताप नहीं है जो उन्होंने पांच साल मजे लेकर काटे और अपने वादे भूल बैठे। यह बेचारगी जनता को एक बार फिर बेवकूफ बनाकर सत्ताशीन होने की लालसा के अलावा कुछ भी नहीं है। अगर पांच साल वे एसी रूम से निकलकर जनता के बीच के बने रहते तो उन्हें ये दिन देखना ही नहीं पड़ता। अब मुद्दे की बात करते हैं। बिहार में पिछला विधानसभा चुनाव इस मुद्दे पर लड़ा गया था कि सरकार अ...

गाय वोट देती है

आजकल पूरे देश में गाय पर राजनीति गरमाई हुई है। राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग के बीच गाय एक तरह से राजनीतिक प्राणी हो गई है। यह खुद वोट तो नहीं दे सकती लेकिन वोट दिला जरूर सकती है। और किसी भी पशु या जानवर में गाय जैसा राजनीतिक चरित्र न मिल रहा है और न ही ढूंढा जा रहा है। यह एक समाज विशेष के लिए मां है और दूसरे समाजों के लिए मात्र गोश्त। अजीब इत्तेफाक है। हम बाघों को बचाने का प्रयास कर रहे हैं। शेरों को बचाने में लगे हुए हैं। करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। तमाम वन्यजीव को बचाने के लिए कई अभियान कई स्तरों पर चलाए जा रहे हैं और गाय को बचाने की बात आती है तो कहा जाता है कि कट्टरवाद को हवा दी जा रही है। आजकल गाय के बारे में नित्त नई जानकारी आ रही है। यह जानकारी किसी पशु वैज्ञानिक या शोधकर्ताओं की तरफ से नहीं, बल्कि हमारे राजनेताओं की जिह्वा से निकल रही है।  जानकारी भी ऐसी कि क्या कहा जाए। हालिया जानकारी मिली है कि ऋषि-मुनि भी गाय का मांस खाते थे। इस जानकारी से अभी तक मानव जाति अनभिज्ञ थी। तमाम शोधों के बाद भी ये जानकारी अब तक नहीं जुटाई जा सकी थी लेकिन राजनीतिक जीवन में वो भी...