यहां चलता है धनबल और बाहुबल का जोर
जुबाने नही, यहां गोलियां करती हैं फैसला
कैसे होगा शांतिपूर्वक चुनाव यहां
बिहार में सोमवार से विधानसभा चुनाव का आगाज हो रहा है। महीनों से यहां का माहौल गरमाया हुआ है लेकिन चुनावी चरण में प्रवेश करते ही वातावरण और गरमाता जाएगा। चुनाव लड़ने वाले तन, मन और धन से प्रचार में जुटे हैं, वहीं उनके पक्ष में प्रचार करने के लिए दिल्ली और पटना से नेताओं की फौज पूरे राज्य के माहौल को गरमा रही है। नेताओं की बेचारगी उनके चेहरे से दिख रही है। हाथ जोड़े हुए, जिसको कभी पास फटकने नहीं दिया, उसका पैर छुते हुए, गली-गली खाक छानते हुए नेता एक-एक वोट को अपने खाते में जमा करने के लिए पसीने बहा रहे हैं। ध्यान रहे, यह पश्चाताप नहीं है जो उन्होंने पांच साल मजे लेकर काटे और अपने वादे भूल बैठे। यह बेचारगी जनता को एक बार फिर बेवकूफ बनाकर सत्ताशीन होने की लालसा के अलावा कुछ भी नहीं है। अगर पांच साल वे एसी रूम से निकलकर जनता के बीच के बने रहते तो उन्हें ये दिन देखना ही नहीं पड़ता।
अब मुद्दे की बात करते हैं। बिहार में पिछला विधानसभा चुनाव इस मुद्दे पर लड़ा गया था कि सरकार अपराधियों पर नकेल कसने में सफल रही है। दावे में दम भी था पर इस बार हालात एकदम उलट हैं। चुनाव का चरित्र रक्तचरित्र में तब्दील होता जा रहा है। चुनाव घोषित होने से पहले पटना में गांधी मैदान के पास भाजपा नेता की सरेशाम हत्या की गई थी। चुनाव घोषित होने के बाद पटना जिला भाजपा महिला मोर्चा अध्यक्ष कविता देवी के पति लुलन शर्मा की हत्या कर दी गई। अभी हाल में फलवारी के एएसपी राकेश कुमार और उनके बॉडीगार्ड सुरेश गोप को गोलियां दागी गईं। दोनों पटना मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में उपचाराधीन हैं। ये तो पटना और उसके आसपास की दुर्दांत घटनाएं हैं, जो तुरंत ही मीडिया हाइप पा जाती हैं। इसके अलावा राजधानी से सुदूर इलाकों में ऐसी कई घटनाएं रोजाना हो रही हैं। चुनाव के नाम पर मारकाट मची है। सीतामढ़ी शहर के भीड़ भरे चौराहे बसुश्री चौक के पास दो अपराधियों ने पत्रकार अजय विद्रोही की गोली मारकर हत्या कर दी। उसके बाद लोगों के आक्रोश को देखते हुए एएसपी अभियान और नगर कोतवाल मौके से भाग निकले। दूसरी ओर, बिहारशरीफ के नगरनौसा थानाध्यक्ष अवधेश कुमार को अपराधियों ने गोलियों से भून दिया। वे गया के डुमरा गांव के रहने वाले थे। तीन साल पहले ही उनकी शादी हुई थी।
दुनिया जानती है कि चुनाव आयोग को बिहार में सफलतापूर्वक चुनाव संचालन कराने में कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं। टीएन शेषन से लेकर डा. नसीम जैदी तक सभी यह बात कह चुके हैं कि बिहार में शांतिपूर्वक चुनाव संपन्न कराना एक चुनौती है। वे अनायास ही नहीं बोल रहे हैं। उन्हें बिहार चुनाव के रक्तचरित्र के बारे में पता है। चुनाव घोषित होने के साथ ही तय हो जाता है कि किसको-किसको मारना है। कुछ वर्षों तक शांति रहने के बाद हाल के दिनों में जो घटनाएं घटी हैं, वे दर्शा रही हैं कि बिहार फिर से रक्तचरित्र को अपना रहा है।
चुनाव तो पूरी दुनिया में होते हैं। फिर बिहार का चुनाव इतना खास क्यों हो जाता है। क्यों मीडिया खासकर विदेशी मीडिया बिहार चुनाव पर इतना फोकस करती है। क्यों टीवी पत्रकारों की टोली बड़े पैमाने पर वहां खाक छानती रही है। वो भी तो भारत देश का ही एक हिस्सा मात्र है। फिर क्यों टीवी पत्रकार चिल्ला चिल्लाकर कह रहे हैं कि इस चुनाव का असर पूरे देश की राजनीति पर पड़ेगा। बिहार में चुनावी मौसम में लोया जिरगा की याद आ जाती है। जैसे कबीलाई इलाकों में लोया जिरगा (एक तरह की पंचायत) में कहा नहीं मानने पर तुरंत माहौल रक्तरंजित हो जाता है, वैसे ही बिहार में चुनाव का इतिहास रक्तरंजित होता आया है। अफसोस है कि इस बार भी बिहार उसी रक्तचरित्र की शरण में चला गया, जिसे पांच साल पहले उसने त्याग दिया था। पांच साल में बिहार पांच कदम आगे नहीं बढ़ा और रक्तचरित्र के चोले को ओढ़ लिया।
जुबाने नही, यहां गोलियां करती हैं फैसला
कैसे होगा शांतिपूर्वक चुनाव यहां
बिहार में सोमवार से विधानसभा चुनाव का आगाज हो रहा है। महीनों से यहां का माहौल गरमाया हुआ है लेकिन चुनावी चरण में प्रवेश करते ही वातावरण और गरमाता जाएगा। चुनाव लड़ने वाले तन, मन और धन से प्रचार में जुटे हैं, वहीं उनके पक्ष में प्रचार करने के लिए दिल्ली और पटना से नेताओं की फौज पूरे राज्य के माहौल को गरमा रही है। नेताओं की बेचारगी उनके चेहरे से दिख रही है। हाथ जोड़े हुए, जिसको कभी पास फटकने नहीं दिया, उसका पैर छुते हुए, गली-गली खाक छानते हुए नेता एक-एक वोट को अपने खाते में जमा करने के लिए पसीने बहा रहे हैं। ध्यान रहे, यह पश्चाताप नहीं है जो उन्होंने पांच साल मजे लेकर काटे और अपने वादे भूल बैठे। यह बेचारगी जनता को एक बार फिर बेवकूफ बनाकर सत्ताशीन होने की लालसा के अलावा कुछ भी नहीं है। अगर पांच साल वे एसी रूम से निकलकर जनता के बीच के बने रहते तो उन्हें ये दिन देखना ही नहीं पड़ता।
अब मुद्दे की बात करते हैं। बिहार में पिछला विधानसभा चुनाव इस मुद्दे पर लड़ा गया था कि सरकार अपराधियों पर नकेल कसने में सफल रही है। दावे में दम भी था पर इस बार हालात एकदम उलट हैं। चुनाव का चरित्र रक्तचरित्र में तब्दील होता जा रहा है। चुनाव घोषित होने से पहले पटना में गांधी मैदान के पास भाजपा नेता की सरेशाम हत्या की गई थी। चुनाव घोषित होने के बाद पटना जिला भाजपा महिला मोर्चा अध्यक्ष कविता देवी के पति लुलन शर्मा की हत्या कर दी गई। अभी हाल में फलवारी के एएसपी राकेश कुमार और उनके बॉडीगार्ड सुरेश गोप को गोलियां दागी गईं। दोनों पटना मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में उपचाराधीन हैं। ये तो पटना और उसके आसपास की दुर्दांत घटनाएं हैं, जो तुरंत ही मीडिया हाइप पा जाती हैं। इसके अलावा राजधानी से सुदूर इलाकों में ऐसी कई घटनाएं रोजाना हो रही हैं। चुनाव के नाम पर मारकाट मची है। सीतामढ़ी शहर के भीड़ भरे चौराहे बसुश्री चौक के पास दो अपराधियों ने पत्रकार अजय विद्रोही की गोली मारकर हत्या कर दी। उसके बाद लोगों के आक्रोश को देखते हुए एएसपी अभियान और नगर कोतवाल मौके से भाग निकले। दूसरी ओर, बिहारशरीफ के नगरनौसा थानाध्यक्ष अवधेश कुमार को अपराधियों ने गोलियों से भून दिया। वे गया के डुमरा गांव के रहने वाले थे। तीन साल पहले ही उनकी शादी हुई थी।
दुनिया जानती है कि चुनाव आयोग को बिहार में सफलतापूर्वक चुनाव संचालन कराने में कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं। टीएन शेषन से लेकर डा. नसीम जैदी तक सभी यह बात कह चुके हैं कि बिहार में शांतिपूर्वक चुनाव संपन्न कराना एक चुनौती है। वे अनायास ही नहीं बोल रहे हैं। उन्हें बिहार चुनाव के रक्तचरित्र के बारे में पता है। चुनाव घोषित होने के साथ ही तय हो जाता है कि किसको-किसको मारना है। कुछ वर्षों तक शांति रहने के बाद हाल के दिनों में जो घटनाएं घटी हैं, वे दर्शा रही हैं कि बिहार फिर से रक्तचरित्र को अपना रहा है।
चुनाव तो पूरी दुनिया में होते हैं। फिर बिहार का चुनाव इतना खास क्यों हो जाता है। क्यों मीडिया खासकर विदेशी मीडिया बिहार चुनाव पर इतना फोकस करती है। क्यों टीवी पत्रकारों की टोली बड़े पैमाने पर वहां खाक छानती रही है। वो भी तो भारत देश का ही एक हिस्सा मात्र है। फिर क्यों टीवी पत्रकार चिल्ला चिल्लाकर कह रहे हैं कि इस चुनाव का असर पूरे देश की राजनीति पर पड़ेगा। बिहार में चुनावी मौसम में लोया जिरगा की याद आ जाती है। जैसे कबीलाई इलाकों में लोया जिरगा (एक तरह की पंचायत) में कहा नहीं मानने पर तुरंत माहौल रक्तरंजित हो जाता है, वैसे ही बिहार में चुनाव का इतिहास रक्तरंजित होता आया है। अफसोस है कि इस बार भी बिहार उसी रक्तचरित्र की शरण में चला गया, जिसे पांच साल पहले उसने त्याग दिया था। पांच साल में बिहार पांच कदम आगे नहीं बढ़ा और रक्तचरित्र के चोले को ओढ़ लिया।
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