महागठबंधन तो होगा, चाहे कुर्बानी किसी को देनी पड़े। फिलहाल कुर्बानी कांग्रेस को ही देनी होगी, क्योंकि क्षेत्रीय दल अपने हिस्से में से शायद ही कटौती करें। महागठबंधन की सबसे ज्यादा जरूरत भी कांग्रेस को ही है। उस दल का, जिसका कभी जम्मू कश्मीर से लेकर तमिलनाडु और गुजरात से लेकर मिजोरम तक एकाधिकार हुआ करता था, वह अब पंजाब और पुड्डुचेरी तक सिमट कर रह गई है। यही उसकी छटपटाहट है और यही सबसे बड़ी कमजोरी। यही कारण है कि सभी क्षेत्रीय दल उसे आंख दिखा रहे हैं। कांग्रेस किसी तरह 2019 का चुनाव जीतना चाहेगी, क्योंकि यह राहुल गांधी के लिए बतौर अध्यक्ष पहला आम चुनाव होगा और जीत ही उन्हें स्थापित करेगी। हालांकि हार से उनकी अध्यक्षी को आंच नहीं आएगी पर संभव है कि पंजाब जैसे राज्य की सत्ता भी हाथ से निकल जाए। कांग्रेस की एक छटपटाहट यह भी है कि मोदी सरकार में उसे सम्मानित विपक्ष का भी दर्जा हासिल नहीं हुआ। इसलिए कांग्रेस को महागठबंधन का जहर कबूल होगा, पर मोदी शासन का हलाहल कदापि मंजूर नहीं। कांग्रेस जानती है कि मोदी सरकार का बने रहना उसके अस्तित्व के लिए बहुत बड़ा खतरा है, इसलिए वह कोई भी जोखिम उठाने को तैयार है।
तेलंगाना, ओडिसा, केरल आदि राज्यों में महागठबंधन नहीं होगा पर, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, प. बंगाल, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, असम और जम्मू कश्मीर आदि राज्यों में महागठबंधन अपना असर दिखा सकता है। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में महागठबंधन का व्यापक असर दिख सकता है। इसकी बानगी विगत चुनावों में देखी जा चुकी है। अब सवाल है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को लड़ने के लिए कितनी सीटें मिलेंगी। सपा और बसपा अभी से आंख दिखा रहे हैं। शायद ये दोनों पार्टियां आपस में 35-35 सीटें बांटेंगी। रालोद भी पांच सीटों पर चुनाव लड़ना चाहेगा। बची सात सीटों से कांग्रेस को संतोष करना होगा। दूसरी ओर, बिहार में राजद 40 में से कम से कम 20 सीटों पर चुनाव लड़ेगा और बाकी 20 सीटें आठ दलों को बांटी जाएंगी। इसमें भी कांग्रेस का हिस्सा 7-10 के बीच का होगा। जाहिर है इन दो महत्वपूर्ण राज्यों से कांग्रेस की सीटें मुश्किल से दहाई का आंकड़ा छुएगी, जबकि दोनों राज्यों को मिलाकर 120 से अधिक सीटें हैं। देखना दिलचश्प होगा कि प. बंगाल में कांग्रेस तृणमूल और वाम मोर्चा को गठबंधन के लिए राजी कर पाती है या नहीं। हालांकि तृणमूल महागठबंधन के पक्ष में बोलती रही है, लेकिन वाम मोर्चा अभी आनाकानी करता रहा है। दूसरी ओर, माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी भी इसके पक्ष में हैं, लेकिन वे पार्टी में प्रकाश करात वाले धड़े को नहीं समझा पा रहे हैं। झारखंड में मामला 50-50 का लग रहा है। में कांग्रेस बदरुद्दीन अजमल की पार्टी के साथ जा सकती है। वहां पिछले विधानसभा चुनाव में ही दोनों साथ चुनाव लड़ने वाले थे, लेकिन किसी कारणवश ऐसा नहीं हो पाया , जिसका दोष दोनों पार्टियां एक दूसरे को देती रही हैं।
ओडिसा में त्रिशंकु लड़ाई होगी , जिसमें या तो भाजपा या फिर नवीन पटनायक की पार्टी जीतेगी। कांग्रेस वहां सभी सीटों पर चुनाव लड़ ले, यहीं बहुत है। आंध्र प्रदेश में समीकरण इस बार बदले हुए हैं। पिछले चुनाव में भाजपा की साथी रही तेलुगुदेशम इस बार कांग्रेस के साथ होगी तो वाईएसआर कांग्रेस भाजपा के साथ होगी। देखना होगा कि भाजपा के खिलाफ जहर उगलने वाले असद्दुदीन ओवैसी महागठबंधन में जाते हैं या नहीं। हालांकि कांग्रेस उनपर भाजपा को मदद देने का आरोप लगाती रही है। तेलंगाना में चंद्रशेखर या तो एनडीए में जाएंगे या कही नहीं जाएंगे, यूपीए में तो कदापि नहीं जाएंगे। आंध्र और तेलंगाना में कांग्रेस विभाजन का श्रेय लूटने में भी नाकामयाब रही है। कर्नाटक में सिद्धरमैया कांग्रेस के लिए मुसीबत बन सकते हैं। साथ ही कांग्रेस की मदद से मुख्यमंत्री बने कुमारस्वामी उसी का सिरदर्द बढ़ाते रहेंगे। उधर, केरल में महागठबंधन की उम्मीद नहीं है, लेकिन भाजपा वहां अभी नुकसान पहुंचाने की स्थिति में नहीं है। उसे एक से पांच सीटें मिल जाए तो बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। तमिलनाडु में पहली बार जयललिता और करुणानिधि की गैर मौजूदगी में चुनाव होंगे, जबकि कमल हासन और रजनीकांत पहली बार चुनाव मैदान में होंगे। वहां के चुनाव परिणाम इस बार दिलचश्प होंगे। सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक और द्रमुक अभी अंतर्द्वंद्व से जूझ रहे हैं।
महाराष्ट्र की बात करें तो तमाम नानुकुर के बाद भी भाजपा और शिवसेना साथ चुनाव लड़ सकते हैं। तभी दोनों को फायदा भी होगा। हालांकि शिवसेना मोदी सरकार की मुसीबतें बढ़ती रही है। उधर, कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस का भी साथ चुनाव लड़ना तय है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में समझौता हो या न हो, बसपा कांग्रेस की मुसीबत बढ़ाती रहेगी। इन राज्यों में विधानसभा चुनाव को लेकर मायावती के तेवर से यह साफ हो गया है। पंजाब में यूपीए तो हरियाणा में भाजपा बढ़त जारी रख सकते हैं। वहीं, दिल्ली में भाजपा को थोड़ा बहुत यानी एक या दो सीटों का नुकसान हो सकता है। यहां भी महागठबंधन की चर्चाएं तो हैं पर अजय माकन और शीला दीक्षित दोनों खेमे इसके विरोध में हैं। यहां अरविंद केजरीवाल का रवैया भी महागठबंधन को खटाई में डाल सकता है। पहाड़ी राज्य उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में भाजपा का जादू अभी कायम राह सकता है। उधर जम्मू कश्मीर में महागठबंधन बनने की सूरत उभर सकती है, बशर्ते पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस एक दूसरे के प्रति अपना रुख नरम करें। पूर्वोत्तर के राज्यों में एनआरसी के मुद्दे को लेकर भाजपा और उसके सहयोगी दल हावी राह सकते हैं।
कुल मिलाकर महागठबंधन के होने में कोई संशय नही है। संशय है तो उसके आकर और प्रकार को लेकर है। अभी सहयोगी कांग्रेस को जितना झुकायेंगे, वह झुकेगी। और जितना अधिक वह झुकेगी, उसके कार्यकर्ताओं का मनोबल भी उतना ही डाउन होगा। इसका सीधा असर चुनाव पर पड़ना लाजिमी है।
तेलंगाना, ओडिसा, केरल आदि राज्यों में महागठबंधन नहीं होगा पर, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, प. बंगाल, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, असम और जम्मू कश्मीर आदि राज्यों में महागठबंधन अपना असर दिखा सकता है। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में महागठबंधन का व्यापक असर दिख सकता है। इसकी बानगी विगत चुनावों में देखी जा चुकी है। अब सवाल है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को लड़ने के लिए कितनी सीटें मिलेंगी। सपा और बसपा अभी से आंख दिखा रहे हैं। शायद ये दोनों पार्टियां आपस में 35-35 सीटें बांटेंगी। रालोद भी पांच सीटों पर चुनाव लड़ना चाहेगा। बची सात सीटों से कांग्रेस को संतोष करना होगा। दूसरी ओर, बिहार में राजद 40 में से कम से कम 20 सीटों पर चुनाव लड़ेगा और बाकी 20 सीटें आठ दलों को बांटी जाएंगी। इसमें भी कांग्रेस का हिस्सा 7-10 के बीच का होगा। जाहिर है इन दो महत्वपूर्ण राज्यों से कांग्रेस की सीटें मुश्किल से दहाई का आंकड़ा छुएगी, जबकि दोनों राज्यों को मिलाकर 120 से अधिक सीटें हैं। देखना दिलचश्प होगा कि प. बंगाल में कांग्रेस तृणमूल और वाम मोर्चा को गठबंधन के लिए राजी कर पाती है या नहीं। हालांकि तृणमूल महागठबंधन के पक्ष में बोलती रही है, लेकिन वाम मोर्चा अभी आनाकानी करता रहा है। दूसरी ओर, माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी भी इसके पक्ष में हैं, लेकिन वे पार्टी में प्रकाश करात वाले धड़े को नहीं समझा पा रहे हैं। झारखंड में मामला 50-50 का लग रहा है। में कांग्रेस बदरुद्दीन अजमल की पार्टी के साथ जा सकती है। वहां पिछले विधानसभा चुनाव में ही दोनों साथ चुनाव लड़ने वाले थे, लेकिन किसी कारणवश ऐसा नहीं हो पाया , जिसका दोष दोनों पार्टियां एक दूसरे को देती रही हैं।
ओडिसा में त्रिशंकु लड़ाई होगी , जिसमें या तो भाजपा या फिर नवीन पटनायक की पार्टी जीतेगी। कांग्रेस वहां सभी सीटों पर चुनाव लड़ ले, यहीं बहुत है। आंध्र प्रदेश में समीकरण इस बार बदले हुए हैं। पिछले चुनाव में भाजपा की साथी रही तेलुगुदेशम इस बार कांग्रेस के साथ होगी तो वाईएसआर कांग्रेस भाजपा के साथ होगी। देखना होगा कि भाजपा के खिलाफ जहर उगलने वाले असद्दुदीन ओवैसी महागठबंधन में जाते हैं या नहीं। हालांकि कांग्रेस उनपर भाजपा को मदद देने का आरोप लगाती रही है। तेलंगाना में चंद्रशेखर या तो एनडीए में जाएंगे या कही नहीं जाएंगे, यूपीए में तो कदापि नहीं जाएंगे। आंध्र और तेलंगाना में कांग्रेस विभाजन का श्रेय लूटने में भी नाकामयाब रही है। कर्नाटक में सिद्धरमैया कांग्रेस के लिए मुसीबत बन सकते हैं। साथ ही कांग्रेस की मदद से मुख्यमंत्री बने कुमारस्वामी उसी का सिरदर्द बढ़ाते रहेंगे। उधर, केरल में महागठबंधन की उम्मीद नहीं है, लेकिन भाजपा वहां अभी नुकसान पहुंचाने की स्थिति में नहीं है। उसे एक से पांच सीटें मिल जाए तो बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। तमिलनाडु में पहली बार जयललिता और करुणानिधि की गैर मौजूदगी में चुनाव होंगे, जबकि कमल हासन और रजनीकांत पहली बार चुनाव मैदान में होंगे। वहां के चुनाव परिणाम इस बार दिलचश्प होंगे। सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक और द्रमुक अभी अंतर्द्वंद्व से जूझ रहे हैं।
महाराष्ट्र की बात करें तो तमाम नानुकुर के बाद भी भाजपा और शिवसेना साथ चुनाव लड़ सकते हैं। तभी दोनों को फायदा भी होगा। हालांकि शिवसेना मोदी सरकार की मुसीबतें बढ़ती रही है। उधर, कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस का भी साथ चुनाव लड़ना तय है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में समझौता हो या न हो, बसपा कांग्रेस की मुसीबत बढ़ाती रहेगी। इन राज्यों में विधानसभा चुनाव को लेकर मायावती के तेवर से यह साफ हो गया है। पंजाब में यूपीए तो हरियाणा में भाजपा बढ़त जारी रख सकते हैं। वहीं, दिल्ली में भाजपा को थोड़ा बहुत यानी एक या दो सीटों का नुकसान हो सकता है। यहां भी महागठबंधन की चर्चाएं तो हैं पर अजय माकन और शीला दीक्षित दोनों खेमे इसके विरोध में हैं। यहां अरविंद केजरीवाल का रवैया भी महागठबंधन को खटाई में डाल सकता है। पहाड़ी राज्य उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में भाजपा का जादू अभी कायम राह सकता है। उधर जम्मू कश्मीर में महागठबंधन बनने की सूरत उभर सकती है, बशर्ते पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस एक दूसरे के प्रति अपना रुख नरम करें। पूर्वोत्तर के राज्यों में एनआरसी के मुद्दे को लेकर भाजपा और उसके सहयोगी दल हावी राह सकते हैं।
कुल मिलाकर महागठबंधन के होने में कोई संशय नही है। संशय है तो उसके आकर और प्रकार को लेकर है। अभी सहयोगी कांग्रेस को जितना झुकायेंगे, वह झुकेगी। और जितना अधिक वह झुकेगी, उसके कार्यकर्ताओं का मनोबल भी उतना ही डाउन होगा। इसका सीधा असर चुनाव पर पड़ना लाजिमी है।

चुनाव पर बेहतर विचार
जवाब देंहटाएं